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सोनपुर/भैयाथान@सोनपुर समिति में ‘वैकल्पिक’ लिपिक की वापसी का रहस्य! नियुक्ति आदेश गायब, पुराने आदेश पर महीनों बाद कार्रवाई-प्राधिकृत अधिकारी बदलते ही क्यों बदली तस्वीर?

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  • नियुक्ति आदेश नहीं,फिर बहाली कैसी? सोनपुर समिति में विवेक चौरसिया की वापसी ने खोली ‘कागजी व्यवस्था’ की पोल
  • सोनपुर समिति में ‘वैकल्पिक’
  • लिपिक की वापसी पर सवाल, नियुक्ति आदेश गायब तो 7 माह पुराने आदेश पर अब क्यों कार्रवाई?
  • 9 जुलाई 2025 को सेवा से पृथक, जनवरी 2026 में प्रकरण नस्तीबद्ध और फिर प्राधिकृत अधिकारी बदलते ही पुनः कार्य पर वापसी,रिकॉर्ड में ‘काट-छांट’ के आरोप ने बढ़ाए सवाल…
  • सात महीने पुराना आदेश अचानक जिंदा! प्राधिकृत अधिकारी बदले तो ‘वैकल्पिक’ लिपिक की कुर्सी भी वापस
  • पहले पृथक किया,फिर नस्तीबद्ध किया…अब बहाली! सोनपुर समिति में विवेक चौरसिया की वापसी पर उठे गंभीर सवाल वैकल्पिक व्यवस्था’ का कर्मचारी बना स्थायी सवाल—विवेक चौरसिया की वापसी में नियुक्ति आदेश आखिर कहां है?
  • कुर्सी बदली, फाइल चली और सात महीने पुराना आदेश जाग उठा! सोनपुर समिति में चौरसिया की वापसी पर सवाल


-ओंकार पाण्डेय-
सोनपुर/भैयाथान,12 अगस्त 2026 (घटती-घटना)।
सहकारिता विभाग में नियम-कायदे किसके लिए हैं यह सवाल अब सोनपुर आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित के एक मामले ने फिर खड़ा कर दिया है,यहां मामला इतना सीधा होता तो शायद खबर ही नहीं बनती,लेकिन फाइलों में तारीखें आगे बढ़ती हैं,अधिकारी बदलते हैं,आदेश आते हैं,पुराने आदेशों की व्याख्या बदलती दिखाई देती है और अंत में वही व्यक्ति फिर समिति की व्यवस्था में दिखाई देने लगता है, जिसे कभी समिति के काम से पृथक कर दिया गया था उसे मूल पद पर यथावत रखने का आदेश हो गया,वैसे सहकारिता विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल कोई नई बात नहीं है,लेकिन आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित सोनपुर,पंजीयन क्रमांक 580 से जुड़े विवेक कुमार चौरसिया के मामले ने व्यवस्था के भीतर चलने वाली प्रक्रिया पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं,उपलब्ध दस्तावेजों में चौरसिया को एक ओर वैकल्पिक व्यवस्था के तहत अस्थायी लिपिक बताया गया है,जबकि बाद के विभागीय पत्राचार में उन्हें मूल पद पर यथावत रखने की कार्रवाई का उल्लेख मिलता है,यही विरोधाभास पूरे मामले का केंद्र बन गया है।
बता दे की सबसे अहम प्रश्न यह है कि जब समिति स्वयं कहती है कि चौरसिया की नियुक्ति नहीं हुई और उन्हें कोई नियुक्ति आदेश जारी नहीं किया गया,तो उनका मूल पद क्या था? यदि नियुक्ति हुई थी तो उसका आदेश कहां है? और यदि नियुक्ति नहीं हुई तो बाद में उन्हें वापस कार्य पर रखने की प्रक्रिया किस वैधानिक आधार पर आगे बढ़ी? मामला सिर्फ इतना नहीं है,तारीखों को क्रम में रखने पर घटनाक्रम और ज्यादा गंभीर दिखाई देता है, 9 जुलाई 2025 को उन्हें समिति के कार्य से अलग किया गया,3 नवंबर को जिला सहकारिता कार्यालय से उन्हें यथावत रखने की कार्रवाई का निर्देश आया, 2 जनवरी 2026 को संबंधित प्रकरण नस्तीबद्ध किए जाने का पत्र सामने आया,इसके बाद 27 जनवरी को संयुक्त आयुक्त सहकारिता एवं संयुक्त पंजीयक, सरगुजा संभाग ने फिर उपस्थिति सुनिश्चित कराने और समिति की कार्यवाही पुस्तिका को लेकर स्पष्टीकरण मांगा, बाद में नए प्राधिकृत अधिकारी के कार्यभार संभालने के बाद संचालक मंडल की बैठक के माध्यम से उन्हें दोबारा कार्य में रखने की प्रक्रिया सामने आई, अब सवाल यह नहीं कि चौरसिया समिति में काम करते थे या नहीं, सवाल यह है कि उनकी वास्तविक सेवा स्थिति क्या थी और दोबारा कार्य पर आने का आधार कौन-सा दस्तावेज था?
वैकल्पिक व्यवस्था में रखा गया था, नियमित कर्मचारी नहीं सोनपुर समिति के 17 फरवरी 2026 के जवाब में चौरसिया के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है,समिति के अनुसार संस्था में कुछ कर्मचारियों की अनुपस्थिति के कारण काम प्रभावित हो रहा था, ऐसी स्थिति में कामकाज चलाने के लिए विवेक कुमार चौरसिया को वैकल्पिक व्यवस्था के तहत अस्थायी लिपिक के रूप में कार्य में रखा गया,समिति ने यह भी स्पष्ट किया कि प्राथमिक कृषि साख सहकारी सोसायटियों के सेवायुक्तों के सेवा नियम 2018 के तहत उनकी नियुक्ति संस्था द्वारा नहीं की गई और नियुक्ति आदेश भी जारी नहीं किया गया,यदि समिति का यह रिकॉर्ड सही है तो चौरसिया की स्थिति नियमित कर्मचारी की नहीं थी। वह एक अस्थायी वैकल्पिक व्यवस्था थी,जिसका उद्देश्य केवल उस समय की कार्यगत आवश्यकता को पूरा करना था, यहीं से पहला बड़ा सवाल निकलता है—जब नियुक्ति ही नहीं हुई तो नियुक्ति आदेश किस बात का? और यदि नियुक्ति आदेश मौजूद है तो उसे सामने क्यों नहीं रखा गया?
नवंबर के आदेश के बाद वास्तविक जॉइनिंग कब हुई?– 3 नवंबर 2025 के निर्देश के बाद चौरसिया ने कब कार्यभार संभाला,यह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है, यदि उन्होंने तत्काल ज्वाइन किया तो उसकी जॉइनिंग रिपोर्ट कहां है? यदि उन्होंने ज्वाइन नहीं किया तो किस कारण से? क्या समिति ने उन्हें कार्यभार ग्रहण करने से रोका? क्या उन्होंने ज्वाइनिंग के लिए आवेदन दिया? क्या विभाग ने अनुपालन रिपोर्ट मांगी? क्या आदेश के पालन पर कोई रोक थी? इन सवालों का स्पष्ट उत्तर उपलब्ध दस्तावेजों से सामने नहीं आता, इसलिए इस मामले में यह कहना अधिक उचित होगा कि 3 नवंबर के आदेश और वास्तविक कार्यग्रहण के बीच की अवधि की स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
2 जनवरी 2026 को प्रकरण नस्तीबद्ध, फिर मामला आगे कैसे बढ़ा?– मामले में 2 जनवरी 2026 का जिला सहकारिता कार्यालय का पत्र भी महत्वपूर्ण है, इसमें विवेक कुमार चौरसिया से जुड़े प्रकरण को नस्तीबद्ध किए जाने का उल्लेख है,यदि 2 जनवरी को मामला समाप्त मान लिया गया था, तो उसके बाद फिर उसी विषय पर उच्च स्तर पर कार्रवाई किस आधार पर हुई? क्या कोई नया आवेदन आया? क्या किसी पक्ष ने आदेश के खिलाफ अपील की? क्या कोई नया तथ्य सामने आया? क्या नस्तीबद्ध आदेश की समीक्षा हुई? इन प्रश्नों का जवाब सामने आना चाहिए,विशेष रूप से यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि 2 जनवरी 2026 का पत्र विवेक कुमार चौरसिया द्वारा संयुक्त आयुक्त के समक्ष प्रस्तुत किया गया था या नहीं,यदि प्रस्तुत किया गया था तो संयुक्त आयुक्त कार्यालय ने उसे किस रूप में देखा? और यदि प्रस्तुत नहीं किया गया था तो क्यों?
27 जनवरी को संयुक्त आयुक्त ने फिर मांगा स्पष्टीकरण– इसके बाद 27 जनवरी 2026 को संयुक्त आयुक्त सहकारिता एवं संयुक्त पंजीयक सहकारी संस्थाएं, सरगुजा संभाग की ओर से पत्र क्रमांक 57 जारी हुआ, इस पत्र में चौरसिया की शिकायत का उल्लेख करते हुए समिति की कार्यवाही पुस्तिका में काट-छांट कर दूसरा प्रस्ताव एवं निर्णय लिखे जाने की बात सामने आई,समिति से इस संबंध में स्पष्टीकरण मांगा गया तथा चौरसिया की उपस्थिति सुनिश्चित कराने के निर्देश दिए गए, इस बिंदु ने पूरे प्रकरण को और गंभीर बना दिया, क्योंकि अब विवाद केवल सेवा स्थिति का नहीं रहा बल्कि समिति की बैठक की कार्यवाही और रिकॉर्ड की विश्वसनीयता से भी जुड़ गया।
कार्यवाही पुस्तिका में क्या बदला गया था?-यदि किसी बैठक के प्रस्ताव में काट-छांट हुई और बाद में दूसरा प्रस्ताव लिखा गया,तो यह जानना जरूरी है कि मूल निर्णय क्या था, किसने बदलाव किया? किसके निर्देश पर किया? क्या संचालक मंडल की सहमति ली गई? क्या संशोधित प्रस्ताव पर सभी संबंधित सदस्यों के हस्ताक्षर हैं? क्या मूल पृष्ठ सुरक्षित है? क्या बैठक के एजेंडे में चौरसिया का मामला पहले से शामिल था? इन सवालों का उत्तर केवल मूल कार्यवाही पुस्तिका देखकर ही दिया जा सकता है, यदि बदलाव नियमसम्मत था तो पूरी प्रक्रिया सामने रखी जानी चाहिए, यदि नहीं था तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
प्राधिकृत अधिकारी बदले और फिर बोर्ड की बैठक क्यों?-इस मामले में प्राधिकृत अधिकारी का परिवर्तन भी महत्वपूर्ण है,पहले की कार्रवाई एक अलग प्राधिकृत अधिकारी के कार्यकाल से संबंधित थी। बाद में जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित भैयाथान शाखा के शाखा प्रबंधक श्यामलाल सिंह को प्राधिकृत अधिकारी का दायित्व मिला,इसके बाद संचालक मंडल की बैठक के माध्यम से चौरसिया को दोबारा कार्य पर रखने की प्रक्रिया सामने आई, यहीं सबसे बड़ा प्रशासनिक प्रश्न उठता है—यदि 3 नवंबर 2025 का आदेश पहले से प्रभावी था तो नए प्राधिकृत अधिकारी के आने के बाद बोर्ड की प्रक्रिया की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या नए अधिकारी ने पूरी फाइल का परीक्षण किया? क्या उन्होंने मूल नियुक्ति दस्तावेज मांगे? क्या 9 जुलाई का पृथक्करण आदेश देखा? क्या 3 नवंबर का निर्देश देखा? क्या 2 जनवरी का नस्तीबद्ध आदेश उनके संज्ञान में था? क्या 27 जनवरी के संयुक्त आयुक्त के पत्र का परीक्षण किया गया? यदि सब देखा गया तो इसकी नोटशीट कहां है?
सात महीने पुराने आदेश पर अचानक अमल का सवाल-मामले की सबसे दिलचस्प कड़ी यही है,एक ओर 3 नवंबर 2025 का आदेश है,दूसरी ओर बाद की प्रक्रिया है जिसमें महीनों बाद कार्य पर रखने की कार्रवाई सामने आती है,यदि आदेश पहले ही जारी हो गया था तो उसके तत्काल अनुपालन में क्या बाधा थी? यदि बाधा थी तो किस अधिकारी ने उसे दर्ज किया? यदि आदेश अधूरा था तो संशोधित आदेश क्यों नहीं निकला? और यदि परिस्थितियां बदल गई थीं तो पुराने आदेश को सीधे लागू करने के बजाय नई प्रशासनिक प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आदेश जारी होना और उसका वैधानिक अनुपालन होना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
नियुक्ति आदेश है तो सामने आए, नहीं है तो ‘मूल पद’ स्पष्ट हो- इस पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी अब भी वही है—विवेक कुमार चौरसिया की मूल नियुक्ति का दस्तावेज,यदि नियुक्ति आदेश उपलब्ध है तो उसे सामने रखकर यह स्पष्ट किया जा सकता है कि चौरसिया किस पद पर नियुक्त हुए थे, यदि आदेश नहीं है तो समिति का यह जवाब महत्वपूर्ण हो जाता है कि उन्हें केवल वैकल्पिक व्यवस्था में अस्थायी लिपिक के रूप में रखा गया था,फिर सवाल यह बनेगा कि उस अस्थायी व्यवस्था को समाप्त करने के बाद उन्हें दोबारा किस आधार पर कार्य दिया गया,एक तरफ ‘नियुक्ति नहीं हुई’ और दूसरी तरफ‘मूल पद पर यथावत’—दोनों बातों के बीच की दूरी कौन तय करेगा?
क्या पुनः कार्य पर लेने से पहले पूरी फाइल देखी गई?- किसी ऐसे व्यक्ति को वापस कार्य पर लेने से पहले,जिसे पहले समिति से पृथक किया जा चुका हो,संबंधित अधिकारियों द्वारा उसका पूरा रिकॉर्ड देखना जरूरी है, इसमें वैकल्पिक व्यवस्था का आधार, संबंधित कार्यवाही, पृथक्करण आदेश, विभागीय पत्र,नस्तीबद्ध प्रकरण, उच्च कार्यालय के निर्देश और बोर्ड की बैठक—सभी शामिल होने चाहिए,यदि इन दस्तावेजों का परीक्षण किया गया था तो उसकी प्रशासनिक नोटशीट या जांच रिपोर्ट उपलब्ध होनी चाहिए,यदि नहीं किया गया तो सवाल यह होगा कि बिना मूल सेवा रिकॉर्ड देखे पुनः कार्य पर रखने की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई?
विवेक चौरसिया की ‘पहुंच’ से ज्यादा जरूरी है प्रक्रिया की पारदर्शिता- विवेक कुमार चौरसिया की किसी अधिकारी से विशेष नजदीकी या प्रभाव का दावा उपलब्ध दस्तावेजों से प्रमाणित नहीं होता,इसलिए इसे तथ्य की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा,लेकिन उनकी सेवा से जुड़ी प्रक्रिया में कई स्तरों पर बदलाव जरूर दर्ज हैं। यही कारण है कि उनकी कथित पहुंच से ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि उनके मामले में विभागीय प्रक्रिया इतनी लंबी और जटिल क्यों हुई? एक अस्थायी कर्मचारी को हटाया गया, फिर विभागीय स्तर पर आदेश आया,फिर मामला नस्तीबद्ध हुआ,फिर उच्च स्तर पर शिकायत और कार्यवाही हुई,फिर कार्यवाही पुस्तिका पर सवाल आया,और बाद में बोर्ड की बैठक के माध्यम से वापसी की प्रक्रिया सामने आई,यह पूरा क्रम सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया था या इसमें कहीं नियमों की अनदेखी हुई—यह जांच का विषय है।
सोनपुर की फाइल अब अधिकारियों से सीधा जवाब मांग रही है– अब सहकारिता विभाग को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि विवेक चौरसिया को कार्य पर क्यों रखा गया,उसे यह भी बताना होगा कि उनकी पहली एंट्री किस आधार पर हुई थी,यदि वह वैकल्पिक व्यवस्था थी तो उसका मूल आदेश कहां है? यदि नियमित नियुक्ति थी तो नियुक्ति पत्र कहां है? यदि 3 नवंबर का आदेश लागू था तो उसका अनुपालन कब हुआ? यदि 2 जनवरी को प्रकरण नस्तीबद्ध हो चुका था तो 27 जनवरी को फिर कार्रवाई क्यों हुई? यदि संयुक्त आयुक्त ने उपस्थिति सुनिश्चित करने को कहा तो वास्तविक जॉइनिंग की तारीख क्या है? और यदि बाद में बोर्ड ने कार्य पर रखा तो बोर्ड के सामने कौन-कौन से दस्तावेज प्रस्तुत किए गए?
अब‘फाइल चलेगी’ नहीं,‘फाइल खुलेगी’जरूरी है– सोनपुर समिति का यह प्रकरण किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने से पहले दस्तावेजों की पूरी जांच की मांग करता है, उपलब्ध रिकॉर्ड में चौरसिया को वैकल्पिक व्यवस्था के तहत अस्थायी लिपिक बताया गया है और नियुक्ति आदेश जारी न होने की बात समिति के जवाब में सामने आती है,दूसरी ओर विभागीय पत्राचार में उन्हें मूल पद पर रखने की कार्रवाई का उल्लेख है,यही विरोधाभास अब जांच का आधार है,नियुक्ति आदेश है तो सामने आए,नहीं है तो मूल पद का आधार बताया जाए, 3 नवंबर के आदेश पर तत्काल कार्रवाई नहीं हुई तो कारण बताया जाए,2 जनवरी का नस्तीबद्ध आदेश बाद की कार्रवाई में किस स्थिति में था,यह स्पष्ट किया जाए,27 जनवरी के संयुक्त आयुक्त के निर्देश के बाद जॉइनिंग कब हुई, यह रिकॉर्ड में दिखाया जाए, और बोर्ड ने यदि पुनः कार्य पर रखा तो पूरी फाइल उसके सामने रखी गई थी या नहीं,यह बताया जाए, क्योंकि सोनपुर समिति का असली सवाल विवेक कुमार चौरसिया की कुर्सी नहीं है, असली सवाल यह है कि उस कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता नियमों ने बनाया था या बदलते अधिकारियों और बदलती कार्यवाहियों ने, अब इस मामले में जवाब बयान से नहीं, मूल नियुक्ति आदेश,कार्यवाही पुस्तिका, नोटशीट और अनुपालन रिपोर्ट से चाहिए।
कार्यवाही पुस्तिका में काट-छांट, नियुक्ति प्रक्रिया पर भी सवाल- यदि विवेक कुमार चौरसिया की नियुक्ति से संबंधित कार्यवाही पुस्तिका में काट-छांट कर दूसरा प्रस्ताव लिखे जाने का आरोप है,तो जांच केवल कार्यवाही पुस्तिका तक सीमित क्यों रहे? तत्कालीन प्राधिकृत अधिकारी ने उन्हें कार्य पर रखने से पहले क्या उच्च कार्यालय से अनुमति ली थी? क्या नियुक्ति के लिए विवेक चौरसिया से बाकायदा आवेदन प्राप्त किया गया था? क्या संबंधित पद के लिए विज्ञापन जारी किया गया था और अन्य अभ्यर्थियों से आवेदन आमंत्रित किए गए थे? यदि ये प्रक्रियाएं अपनाई गई थीं तो उनके दस्तावेज कहां हैं? और यदि न अनुमति ली गई,न आवेदन लिया गया, न विज्ञापन जारी हुआ तथा नियुक्ति आदेश भी नहीं था, तो फिर किस नियम और अधिकार के तहत उन्हें समिति में कार्य करने दिया गया? अब इन मूल दस्तावेजों की जांच ही पूरी प्रक्रिया की वास्तविकता सामने ला सकती है।
9 जुलाई 2025 को व्यवस्था खत्म हुई और चौरसिया को हटाया गया– उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार विवेक कुमार चौरसिया को 9 जुलाई 2025 से समिति एवं समिति के समस्त कार्यों से पृथक कर दिया गया,समिति के बाद के पत्राचार में बताया गया कि संस्था में पर्याप्त कर्मचारी उपलब्ध थे और अतिरिक्त कर्मचारी की आवश्यकता नहीं रह गई थी, साथ ही चौरसिया के मई 2025 से बिना पूर्व सूचना लगातार अनुपस्थित रहने का भी उल्लेख किया गया,इस आधार पर वैकल्पिक व्यवस्था समाप्त कर उन्हें समिति के कार्यों से अलग किया गया, यदि मामला यहीं रुकता तो प्रक्रिया अपेक्षाकृत सरल होती,लेकिन कुछ ही समय बाद विभागीय स्तर पर इसी निर्णय को लेकर नया मोड़ आया।
3 नवंबर 2025 का आदेश—पृथक्करण निरस्त करने का निर्देश– उप आयुक्त सहकारिता एवं उप पंजीयक सहकारी संस्थाएं, जिला सूरजपुर की ओर से 3 नवंबर 2025 को पत्र क्रमांक 636 जारी किया गया,इसमें चौरसिया द्वारा की गई शिकायत तथा संबंधित जांच का उल्लेख है,पत्र में उनकी सेवा से पृथक करने की कार्रवाई पर आपत्ति दर्ज करते हुए 9 जुलाई 2025 के आदेश को निरस्त कर उन्हें यथावत उनके मूल पद पर रखने की कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया,लेकिन इस आदेश के बाद एक और प्रश्न सामने आता है जब समिति के अनुसार कोई नियमित नियुक्ति हुई ही नहीं थी,तब‘मूल पद’किस आधार पर तय किया गया? यदि चौरसिया की नियुक्ति का कोई आदेश था तो उसकी प्रति सामने आनी चाहिए,यदि कोई नियुक्ति आदेश नहीं था तो विभागीय पत्र में इस्तेमाल किए गए‘मूल पद’की व्याख्या आवश्यक है, यही वह बिंदु है जिसे स्पष्ट किए बिना आगे की पूरी प्रक्रिया पर सवाल बना रहेगा।


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