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अम्बिकापुर@मैनपाट में बॉक्साइट खनन : विकास की चमक के पीछे जल-जंगल-जमीन का सवाल

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जनसुनवाई में 60 आपत्तियां,ग्रामीणों ने पूछा-क्या खनिज के लिए खत्म होगी प्राकृतिक विरासत?
-संवाददाता-
अम्बिकापुर,01 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। मैनपाट की पहचान केवल बॉक्साइट भंडार से नहीं,बल्कि उसकी पहाडि़यों,जंगलों, जलस्रोतों और प्राकृतिक सुंदरता से भी है। ऐसे क्षेत्र में प्रस्तावित बॉक्साइट खनन परियोजना को लेकर हुई जनसुनवाई ने एक बार फिर विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच खड़े पुराने सवालों को सामने ला दिया है। रोपाखार सहित आसपास के गांवों में प्रस्तावित करीब 147 हेक्टेयर क्षेत्र की खनन परियोजना को लेकर आयोजित जनसुनवाई में 60 आपत्तियां दर्ज होना यह संकेत देता है कि स्थानीय ग्रामीणों के मन में परियोजना को लेकर गंभीर आशंकाएं हैं। ग्रामीणों ने जलस्रोतों के प्रभावित होने,खेती पर असर, जैव विविधता को नुकसान और आजीविका संकट की चिंता जताई। ग्रामीणों का कहना है कि मैनपाट जैसे संवेदनशील क्षेत्र में खनन का असर केवल पहाड़ काटने तक सीमित नहीं रहेगा। पहाड़ों से जुड़े जलस्रोत,जंगल आधारित जीवन और स्थानीय पारिस्थितिकी पर इसका दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है। यही वजह है कि ग्रामीणों का सवाल है कि क्या आर्थिक लाभ के लिए प्राकृतिक संतुलन की कीमत चुकानी पड़ेगी।
पुराने अनुभवों से बढ़ी ग्रामीणों की चिंता : मैनपाट क्षेत्र में पहले भी बॉक्साइट खनन को लेकर स्थानीय स्तर पर सवाल उठते रहे हैं। पुराने खनन अनुभवों में भूमि, पर्यावरण और पुनर्वास से जुड़े मुद्दों को लेकर प्रभावित लोगों की चिंताएं सामने आई थीं। यही कारण है कि नई परियोजना को लेकर ग्रामीण केवल रोजगार और विकास के दावों को नहीं, बल्कि उसके वास्तविक प्रभावों को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं।
सवाल सिर्फ खनन का नहीं…भरोसे का भी…
प्रशासन का कहना है कि जनसुनवाई केवल प्रक्रिया का हिस्सा है और सभी आपत्तियों व सुझावों का परीक्षण किया जाएगा। सीएमडीसी की ओर से भी कहा गया कि परियोजना की पूरी जानकारी लोगों तक नहीं पहुंचने के कारण विरोध की स्थिति बनी। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यदि परियोजना ग्रामीणों के हित में है तो शुरुआत से ही स्थानीय लोगों के साथ संवाद और विश्वास निर्माण क्यों नहीं हो पाया? किसी भी खनन परियोजना की सफलता केवल मंजूरी और मशीनों से नहीं,बल्कि स्थानीय समुदाय के विश्वास से तय होती है।
क्या विकास का मॉडल बदलेगा?
छत्तीसगढ़ में खनन परियोजनाओं को लेकर कई क्षेत्रों में यही बहस सामने आती रही है कि खनिज संपदा का उपयोग जरूरी है,लेकिन पर्यावरण और स्थानीय अधिकारों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। मैनपाट में भी अब चुनौती यही है कि सरकार और परियोजना एजेंसी यह भरोसा कैसे कायम करती है कि खनन से मिलने वाला लाभ स्थानीय लोगों तक पहुंचेगा और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा भी बनी रहेगी। क्योंकि मैनपाट के ग्रामीणों का विरोध केवल एक खदान का विरोध नहीं दिखता,बल्कि यह उस विकास मॉडल पर सवाल है जिसमें पहाड़,जंगल और पानी की कीमत पर प्रगति तय की जाती है। अब नजर इस बात पर होगी कि जनसुनवाई में उठी आपत्तियां सिर्फ फाइलों तक सीमित रहती हैं या वास्तव में परियोजना के फैसले को प्रभावित करती हैं।


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