Breaking News

लेख@फर्जी डिग्रियां और टूटता भरोसा

Share



भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। यद्ध ही युवा शक्ति ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी मानी जाती है। देश के लाखों विद्यार्थी हर वर्ष कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं,विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रमों और व्यावसायिक प्रशिक्षणों से गुजरते हैं। वे अपने सपनों को पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं। परिवार अपनी बचत,समय और उम्मीदें उनकी शिक्षा पर खर्च करते हैं। लेकिन जब फर्जी डिग्रियों,पेपर लीक,नकल माफिया और शैक्षणिक भ्रष्टाचार की खबरें सामने आती हैं,तब केवल कुछ संस्थानों या व्यक्तियों की साख नहीं गिरती,बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था पर से भरोसा डगमगाने लगता है। यही कारण है कि शिक्षा में पारदर्शिता और गुणवत्ता का प्रश्न आज केवल अकादमिक बहस का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुका है। हाल के वर्षों में भारत में अनेक ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें विश्वविद्यालयों,कॉलेजों और प्रशिक्षण संस्थानों पर अनियमितताओं के आरोप लगे। कहीं फर्जी अंकपत्र जारी किए गए, कहीं बिना पर्याप्त पढ़ाई और मूल्यांकन के डिग्रियां बांटने की शिकायतें मिलीं, तो कहीं भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं में धांधली के आरोप लगे। इन घटनाओं ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था वास्तव में योग्यता आधारित है या फिर उसमें ऐसे छेद पैदा हो चुके हैं जिनका लाभ उठाकर कुछ लोग अनुचित तरीके से आगे बढ़ रहे हैं।
शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल प्रमाण-पत्र देना नहीं होता। शिक्षा व्यक्ति को ज्ञान, कौशल,विवेक और जिम्मेदारी प्रदान करती है। एक डॉक्टर की डिग्री केवल एक कागज नहीं होती, बल्कि यह प्रमाण होती है कि उसने मानव जीवन की रक्षा करने योग्य ज्ञान और प्रशिक्षण प्राप्त किया है। एक इंजीनियर की डिग्री यह भरोसा देती है कि वह सुरक्षित भवन, पुल और तकनीकी संरचनाएं तैयार करने की क्षमता रखता है। एक शिक्षक की डिग्री इस बात की गारंटी मानी जाती है कि वह नई पीढ़ी को सही दिशा देने में सक्षम है। यदि इन डिग्रियों की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगें तो समाज का पूरा विश्वास तंत्र कमजोर पड़ने लगता है।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि फर्जी डिग्रियों का नुकसान केवल उन लोगों तक सीमित नहीं रहता जो इन्हें हासिल करते हैं। इसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। यदि कोई अयोग्य व्यक्ति डॉक्टर बन जाए तो मरीजों का जीवन खतरे में पड़ सकता है। यदि किसी तकनीकी पद पर अयोग्य इंजीनियर पहुंच जाए तो सार्वजनिक परियोजनाओं की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। यदि शिक्षा संस्थानों में अयोग्य शिक्षक नियुक्त हो जाएं तो आने वाली पीढि़यों की बौद्धिक क्षमता पर असर पड़ सकता है। इसलिए यह केवल धोखाधड़ी का मामला नहीं,बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा और सामाजिक विश्वास का भी प्रश्न है।
भारत में उच्च शिक्षा का तेजी से विस्तार हुआ है। यह आवश्यक भी था क्योंकि करोड़ों युवाओं को शिक्षा उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती थी। लेकिन कई बार विस्तार की गति गुणवत्ता नियंत्रण से अधिक तेज रही। परिणामस्वरूप कुछ संस्थान केवल डिग्री वितरण केंद्र बनकर रह गए। शिक्षण,शोध,प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों और प्रशिक्षित शिक्षकों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। जब शिक्षा को सेवा के बजाय व्यवसाय के रूप में देखा जाने लगता है,तब ऐसे संकट पैदा होना स्वाभाविक है।
पेपर लीक की घटनाओं ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। देश के विभिन्न राज्यों में समय-समय पर भर्ती परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने की खबरें आती रही हैं। लाखों छात्र वर्षों तक तैयारी करते हैं, लेकिन कुछ लोग पैसे और प्रभाव के बल पर प्रश्नपत्र हासिल कर लेते हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान उन प्रतिभाशाली युवाओं को होता है जो ईमानदारी से मेहनत कर रहे होते हैं। उनकी मेहनत का मूल्य कम हो जाता है और उनके मन में व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा होता है। युवा पीढ़ी के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपनी योग्यता साबित करे, लेकिन यदि व्यवस्था निष्पक्ष न हो तो प्रतिभा हतोत्साहित होती है। जब किसी मेहनती छात्र को यह महसूस होने लगे कि सफलता योग्यता से नहीं बल्कि संपर्क,भ्रष्टाचार या जालसाजी से मिल सकती है, तब उसकी प्रेरणा कमजोर पड़ती है। यही स्थिति धीरे-धीरे सामाजिक असंतोष को जन्म देती है। कई प्रतिभाशाली युवा देश छोड़ने का निर्णय लेते हैं या फिर व्यवस्था से निराश होकर अपने सपनों से समझौता कर लेते हैं। भारत की वैश्विक पहचान लंबे समय से उसके ज्ञान और प्रतिभा पर आधारित रही है। भारतीय मूल के हजारों वैज्ञानिक, इंजीनियर,चिकित्सक और तकनीकी विशेषज्ञ विश्व की अग्रणी संस्थाओं में कार्यरत हैं। वे केवल अपने व्यक्तिगत करियर का निर्माण नहीं कर रहे, बल्कि भारत की प्रतिष्ठा भी बढ़ा रहे हैं। विदेशों में कार्यरत भारतीय हर वर्ष बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भारत भेजते हैं,जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।
यदि भारतीय डिग्रियों और प्रमाणपत्रों की विश्वसनीयता पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संदेह बढ़ता है, तो इसका प्रभाव रोजगार, वीजा और वैश्विक अवसरों पर पड़ सकता है।

डॉ. सत्यवान सौरभ भिवानी,हरियाणा


Share

Check Also

लेख@बेगुनाह जिंदगियों से खेलता भ्रष्ट तंत्र और दिल्ली के अंतहीन अग्निकांड

Share हर अग्निकांड के बाद एक ही सवाल : जिम्मेदार कौन? पिछले दिनों दिल्ली के …

Leave a Reply