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कोरिया@ जंगल जलते रहे,पौधे गिनते रहे साहब!

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विश्व पर्यावरण दिवस पर 4 हजार पौधों का महाउत्सव,
लेकिन आग में झुलसे हजारों पेड़ों की गिनती कौन करेगा?
कोरिया वन विभाग की हरियाली वाली फोटो और धुएं से काली हुई हकीकत के बीच फंसा पर्यावरण
राजन पाण्डेय
कोरिया,09 जून 2026(घटती-घटना)।
विश्व पर्यावरण दिवस आया,सरकारी गाडि़यों के काफिले निकले,अधिकारियों ने दस्ताने पहने, फावड़े चले,पौधे लगाए गए,कैमरे चमके, सोशल मीडिया पर पोस्टें डाली गईं और फिर यह घोषणा कर दी गई कि कोरिया वन मंडल ने लगभग 4 हजार पौधों का रोपण कर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ा कदम उठाया है।
अब इस घोषणा को सुनकर कोई भोला-भाला नागरिक यह समझ सकता है कि कोरिया जिले में हरियाली का नया युग शुरू हो गया है, जंगल झूम उठे होंगे,पक्षियों ने स्वागत गीत गाए होंगे और प्रकृति ने वन विभाग को धन्यवाद पत्र भेज दिया होगा,लेकिन अगर कोई नागरिक घुघरा,मेण्ड्रा,रामगढ़ और उन जंगलों की तरफ निकल जाए जहां कुछ ही महीने पहले आग ने हजारों पौधों और सैकड़ों पेड़ों को निगल लिया था,तो उसे पता चलेगा कि पर्यावरण दिवस और पर्यावरण की वास्तविक स्थिति में उतना ही अंतर है जितना चुनावी वादों और धरातल की सच्चाई में होता है,वन विभाग ने 4 हजार पौधे लगाए हैं,यह अच्छी बात है,लेकिन जनता पूछ रही है कि इस साल गर्मी में जो हजारों पौधे और सैकड़ों बड़े पेड़ आग में जल गए,उनकी भरपाई का हिसाब किस खाते में दर्ज किया गया है? क्या उन पेड़ों की मृत्यु का शोक संदेश भी कभी जारी होगा या फिर सरकारी फाइलों में उनकी राख भी हरियाली घोषित कर दी जाएगी?
ठकोरिया जिले के सोनहत-बैकुंठपुर मुख्य मार्ग स्थित घुघरा जंगलों में इस वर्ष भीषण आग लगी थी,आग इतनी भयावह थी कि दूर-दूर तक धुआं दिखाई दे रहा था,बड़े-बड़े पेड़ जल गए,हजारों छोटे पौधे स्वाहा हो गए, वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो गया और जंगल कई किलोमीटर तक काला पड़ गया,लेकिन आश्चर्य देखिए,जंगल जल गया, पर जिम्मेदारी नहीं जली, पेड़ राख हो गए,लेकिन किसी अधिकारी की कुर्सी पर धूल तक नहीं जमी,वन विभाग के किसी परिक्षेत्राधिकारी,किसी डिप्टी रेंजर या किसी बीट गार्ड की जवाबदेही तय नहीं हुई,किसी के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की खबर नहीं आई,ऐसा लगा जैसे जंगल स्वयं जलने के लिए पैदा हुए थे और विभाग का उनसे कोई संबंध ही नहीं था, पर्यावरण दिवस पर पौधे लगाते हुए अधिकारी यह जरूर बता रहे हैं कि पेड़ जीवन हैं, लेकिन जनता पूछ रही है कि जब जीवन जल रहा था तब विभाग कहां था?
जनता पूछ रही है,जवाब कौन देगा?
आज कोरिया जिले की जनता कुछ सरल प्रश्न पूछ रही है, जब घुघरा जंगल जला तो जिम्मेदार कौन था? जब मेण्ड्रा के जंगल धधके तो कार्रवाई किस पर हुई? जब लकड़ी तस्करी के मामले सामने आए तो मुख्य आरोपी कौन थे? जब हजारों पौधे आग में जल गए तो उनकी भरपाई का आकलन किसने किया? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—जब पहले से खड़े लाखों पेड़ों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो पा रही है, तो नए लगाए गए 4 हजार पौधों का भविष्य क्या होगा?
पर्यावरण दिवस का असली अर्थ याद रखना होगा…
पर्यावरण दिवस मनाना बुरा नहीं है, पौधे लगाना भी आवश्यक है, लेकिन यदि जंगल जलते रहें और हम केवल पौधे गिनते रहें, तो यह पर्यावरण संरक्षण नहीं,पर्यावरण प्रबंधन का अभिनय कहलाएगा,सच्चाई यह है कि एक सौ साल पुराना पेड़ एक दिन में नहीं बनता। लेकिन वह कुछ घंटों की आग में खत्म हो सकता है,इसलिए पर्यावरण बचाने की शुरुआत नए पौधे लगाने से पहले पुराने जंगलों को बचाने से होती है, कोरिया जिले में आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि वन विभाग 4 हजार पौधों की सफलता का उत्सव मना रहा है,लेकिन आग में झुलसे जंगलों की असफलता की जिम्मेदारी आखिर कौन स्वीकार करेगा? जब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिलता, तब तक पर्यावरण दिवस की हर तस्वीर के पीछे धुएं से काला पड़ा जंगल खड़ा दिखाई देता रहेगा, मानो वह पूछ रहा हो— साहब, मुझे बचाने की बारी कब आएगी?
वन्यजीवों की पीड़ा पर कौन बोलेगा?
जब जंगल में आग लगती है तो केवल पेड़ नहीं जलते, घोंसले जलते हैं, अंडे जलते हैं,छोटे जीव जलते हैं,सांप,खरगोश,नेवले, सियार,पक्षी और अनगिनत वन्य प्राणी अपने घर खो देते हैं,लेकिन हर साल आग की घटनाओं के बाद चर्चा केवल पौधों और हेक्टेयर क्षेत्र की होती है,वन्यजीवों के नुकसान का वास्तविक आकलन शायद ही कभी सामने आता है, जंगल का दर्द सिर्फ पेड़ों का दर्द नहीं होता,वह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का दर्द होता है।
जंगलों में आग लगी थी, लेकिन विभाग ‘मार्च क्लोजिंग’ बचा रहा था…
इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प और दुखद अध्याय वह है जब जंगल धधक रहे थे और वन विभाग का बड़ा हिस्सा दफ्तरों में बैठकर मार्च क्लोजिंग के आंकड़ों को व्यवस्थित करने में लगा हुआ था, एक तरफ जंगलों में आग दौड़ रही थी, दूसरी तरफ फाइलों में आंकड़े दौड़ रहे थे,एक तरफ पक्षी अपने घोंसले छोड़ रहे थे, दूसरी तरफ अधिकारी बजट की अंतिम प्रविष्टियां पूरी कर रहे थे,ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जंगल बचाने से ज्यादा जरूरी हिसाब-किताब बचाना था,स्थानीय लोगों और मीडिया ने लगातार खबरें प्रकाशित कीं। धुएं से भरे जंगलों की तस्वीरें सामने आईं,लेकिन जिस तेजी से आग फैल रही थी, उस तेजी से विभागीय जिम्मेदारी कहीं दिखाई नहीं दी।
विश्व पर्यावरण दिवस का गणित, 4000 पौधे लगाए,लेकिन कितने पेड़ बनेंगे?
वन विभाग ने लगभग 4 हजार पौधे लगाने का दावा किया है, अब असली सवाल शुरू होता है, इन 4 हजार पौधों में से कितने जीवित रहेंगे? 4000? 1000? 400? या फिर 40? कोरिया जिले की जनता इस गणित को समझती है,वह जानती है कि पौधे लगाना आसान है,उन्हें बचाना कठिन है,पौधारोपण कार्यक्रम के दिन पानी की बोतल लेकर पौधे के पास खड़ा होना आसान है,लेकिन अगले तीन वर्षों तक उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना सबसे कठिन काम है,हर साल पौधे लगाए जाते हैं, हर साल रिपोर्ट बनती है,हर साल आंकड़े भेजे जाते हैं, लेकिन कितने पौधे पेड़ बने,इसकी सार्वजनिक समीक्षा शायद ही कभी होती है,कई बार तो पौधे इस तरह लगाए जाते हैं जैसे किसी कार्यक्रम की सजावट का हिस्सा हों, कार्यक्रम खत्म,फोटो खत्म,पौधे खत्म,लेकिन बजट हमेशा जीवित रहता है।
रामगढ़ पाकर्: : भाषणों की हरियाली और जमीन की कालिख…
गुरु घासीदास राष्ट्र्रीय उद्यान के पार्क परिक्षेत्र रामगढ़ में भी पर्यावरण दिवस मनाया गया,पौधे लगाए गए, ग्रामीणों को संदेश दिए गए,रेंजर राजा राम ने कहा कि जीवन और पेड़ दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं,बात बिल्कुल सही है,लेकिन समस्या यह है कि मंच से बोले गए शब्द और जंगल की वास्तविक स्थिति एक-दूसरे से मेल नहीं खाते,इसी वर्ष मेण्ड्रा बैरियर के पास मुख्य सड़क किनारे भीषण आग लगी थी,जंगल के बड़े हिस्से को नुकसान हुआ, हजारों छोटे पौधे और अनेक बड़े पेड़ जल गए,लेकिन उस घटना के बाद भी कोई बड़ी जवाबदेही तय नहीं हुई, दौरे हुए, निरीक्षण हुए, रिपोर्टें बनीं,फोटो खिंचीं,और फिर मामला ठंडा पड़ गया,यह वही पुरानी सरकारी परंपरा है जिसमें घटना बड़ी होती है,बयान उससे भी बड़ा होता है और कार्रवाई सबसे छोटी होती है।
लकड़ी तस्करी: जंगलों का दूसरा दुश्मन
अगर आग जंगलों की एक समस्या है तो अवैध कटाई दूसरी बड़ी समस्या है,सूत्र बताते हैं कि कुछ समय पहले वन विभाग ने अवैध लकडि़यों से भरा एक ट्रक पकड़ा था,मामला काफी चर्चित रहा। विवाद हुआ, चर्चाएं हुईं, लेकिन बाद में आरोप लगे कि कार्रवाई सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई,जनता का सवाल सीधा है,यदि लकड़ी तस्कर इतने कमजोर हैं तो फिर जंगल कट क्यों रहे हैं? और यदि वे इतने ताकतवर हैं कि कार्रवाई उन तक नहीं पहुंचती,तो फिर वन सुरक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति क्या है? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जंगल केवल आग से नहीं खत्म होते,वे कुल्हाडि़यों,ट्रकों और संरक्षण के नाम पर चल रही चुप्पियों से भी खत्म होते हैं।
पर्यावरण संरक्षण या फोटो संरक्षण?
आजकल सरकारी कार्यक्रमों में एक नई परंपरा विकसित हो चुकी है, पहले पौधा लगाया जाता है,फिर उसके साथ फोटो खिंचवाई जाती है, फिर फोटो सोशल मीडिया पर डाली जाती है, फिर उसे पर्यावरण संरक्षण घोषित कर दिया जाता है, लेकिन पर्यावरण संरक्षण कैमरे से नहीं होता,यदि ऐसा होता तो देश के सभी जंगल अब तक सुरक्षित हो चुके होते,असल संरक्षण तब होता है जब जंगल में लगी आग को समय रहते बुझाया जाए, जब अवैध कटाई रोकी जाए, जब फायर वाचर अपनी जिम्मेदारी निभाएं, जब अधिकारी फाइलों से निकलकर जंगलों तक पहुंचें, जब पौधे सिर्फ लगाए न जाएं बल्कि पेड़ बनने तक संरक्षित किए जाएं।
घटिया निर्माण और हरा भ्रष्टाचार
वन विभाग के निर्माण कार्यों को लेकर भी लगातार सवाल उठ रहे हैं,तालाब,स्टॉप डैम,रपटा,कूप निर्माण, बैरियर और अन्य विकास कार्यों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं,लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि कई निर्माण पहली बारिश में ही अपनी असलियत दिखाने लगते हैं,स्थिति ऐसी है कि कुछ निर्माण कार्यों को देखकर लगता है कि उनका निर्माण वर्षों के लिए नहीं,भुगतान निकलने तक के लिए किया गया था,यदि पर्यावरण संरक्षण के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं,तो उनकी गुणवत्ता की निष्पक्ष जांच भी उतनी ही आवश्यक है, अन्यथा पर्यावरण भी कागजों में सुरक्षित रहेगा और निर्माण भी।


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