शिक्षा नहीं,ब्रांड बिक रहे हैं…
भारत में शिक्षा को सदियों से ज्ञान, संस्कार और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम माना गया है। शिक्षक को समाज में विशेष सम्मान प्राप्त रहा है क्योंकि वह केवल विषय ज्ञान ही नहीं देता,बल्कि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व और चरित्र का निर्माण भी करता है। किंतु पिछले कुछ दशकों में शिक्षा के क्षेत्र में जो परिवर्तन हुए हैं,उन्होंने इस आदर्शवादी अवधारणा को काफी हद तक प्रभावित किया है। विशेष रूप से प्रतियोगी परीक्षाओं की बढ़ती संख्या,सरकारी नौकरियों के प्रति आकर्षण और बेहतर करियर की दौड़ ने कोचिंग उद्योग को एक विशाल आर्थिक क्षेत्र में बदल दिया है। आज देश के अनेक शहरों में कोचिंग संस्थान शिक्षा व्यवस्था के समानांतर एक ऐसी व्यवस्था खड़ी कर चुके हैं,जिसका प्रभाव विद्यालयों, विद्यार्थियों, अभिभावकों और यहां तक कि नीतिनिर्माताओं तक पर दिखाई देता है।हाल के वर्षों में सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के विस्तार ने इस प्रवृत्ति को और अधिक तीव्र बना दिया है। अनेक शिक्षक और कोचिंग संचालक यूट्यूब,इंस्टाग्राम तथा अन्य माध्यमों के जरिए लाखों विद्यार्थियों तक पहुँच रहे हैं। यह अपने आप में बुरा नहीं है। तकनीक ने शिक्षा को अधिक सुलभ बनाया है और दूरदराज़ के क्षेत्रों के विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण सामग्री उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन से हटकर व्यक्तिगत ब्रांड निर्माण,प्रचार और व्यावसायिक विस्तार तक सीमित हो जाता है।
हाल ही में एक चर्चित टीवी बहस में वरिष्ठ पत्रकार अंजना ओम कश्यप द्वारा एक यूट्यूबर शिक्षक पर किया गया तंज सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा का विषय बना। इस घटना को लेकर लोगों की राय अलग-अलग हो सकती है। कुछ लोग
इसे पत्रकारिता की तीखी टिप्पणी मानते हैं तो कुछ इसे शिक्षकों के प्रति अनादर के रूप में देखते हैं। किंतु इस विवाद ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न अवश्य खड़ा किया है—क्या शिक्षा का क्षेत्र अब अत्यधिक प्रचार और व्यवसायीकरण की ओर बढ़ चुका है? क्या विद्यार्थियों और अभिभावकों को प्रभावित करने के लिए एक ऐसा माहौल तैयार किया जा रहा है जिसमें कोचिंग को सफलता की अनिवार्य शर्त के रूप में प्रस्तुत किया जाता है?
वास्तविकता यह है कि आज अनेक अभिभावक यह मानने लगे हैं कि बिना कोचिंग के उनका बच्चा किसी प्रतियोगी परीक्षा में सफल नहीं हो सकता। यह धारणा धीरे-धीरे इतनी गहरी हो गई है कि विद्यालयी शिक्षा की उपयोगिता पर भी प्रश्नचिह्न लगने लगा है। कई परिवार अपनी आर्थिक स्थिति पर भारी बोझ डालकर बच्चों को महंगी कोचिंग में भेजते हैं। छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों से हजारों विद्यार्थी कोचिंग हब माने जाने वाले शहरों की ओर पलायन करते हैं। इस प्रक्रिया में परिवार की बचत, बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक जीवन सभी प्रभावित होते हैं। यह स्थिति केवल विद्यार्थियों की मानसिकता का परिणाम नहीं है। इसके पीछे शिक्षा व्यवस्था की कुछ वास्तविक चुनौतियाँ भी हैं। विद्यालयों में पढ़ाया जाने वाला पाठ्यक्रम और प्रतियोगी परीक्षाओं की आवश्यकताओं के बीच अक्सर अंतर दिखाई देता है। कई प्रतियोगी परीक्षाएँ ऐसी हैं जिनमें विद्यालयी पाठ्यक्रम से बाहर के विषय, विशेष प्रकार की तार्किक क्षमता या परीक्षा-विशिष्ट रणनीतियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। परिणामस्वरूप विद्यार्थियों और अभिभावकों को लगता है कि केवल स्कूल की पढ़ाई पर्याप्त नहीं है। इस धारणा का लाभ कोचिंग उद्योग उठाता है और स्वयं को सफलता की कुंजी के रूप में प्रस्तुत करता है। हालाँकि यह भी स्वीकार करना होगा कि सभी कोचिंग संस्थानों को एक ही दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। अनेक संस्थान और शिक्षक ईमानदारी से विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं। उन्होंने ऐसे विद्यार्थियों को अवसर दिए हैं जिन्हें अन्यथा बेहतर संसाधन उपलब्ध नहीं हो पाते। ऑनलाइन शिक्षा ने लाखों युवाओं तक कम लागत में अध्ययन सामग्री पहुँचाई है। इसलिए पूरे कोचिंग क्षेत्र को नकारात्मक रूप में चित्रित करना उचित नहीं होगा। समस्या उन प्रवृत्तियों से है जहाँ शिक्षा की जगह प्रचार, व्यक्तिपूजा और अवास्तविक दावे केंद्र में आ जाते हैं। सोशल मीडिया के दौर में कुछ शिक्षकों ने स्वयं को ब्रांड के रूप में स्थापित कर लिया है। उनके वीडियो, पोस्ट और विज्ञापन लगातार विद्यार्थियों के सामने आते रहते हैं। सफलता की कहानियों को प्रमुखता से दिखाया जाता है, जबकि असफल विद्यार्थियों की संख्या पर चर्चा कम होती है। कई बार यह आभास दिया जाता है कि किसी विशेष शिक्षक या कोचिंग से जुड़ना ही सफलता की गारंटी है। जबकि वास्तविकता यह है कि किसी भी परीक्षा में सफलता अनेक कारकों पर निर्भर करती है—विद्यार्थी की मेहनत, पारिवारिक सहयोग, मानसिक स्थिति, अध्ययन संसाधन और समय प्रबंधन उनमें प्रमुख हैं। एक अन्य चिंताजनक पहलू शिक्षा के क्षेत्र में व्यक्तिकेंद्रित संस्कृति का बढ़ना है। कुछ शिक्षक अपने विषय या संस्थान से अधिक स्वयं के प्रचार पर ध्यान देते दिखाई देते हैं। विशाल होर्डिंग,लगातार विज्ञापन,सोशल मीडिया अभियानों और व्यक्तिगत छवि निर्माण पर खर्च होने वाले संसाधन यह प्रश्न उठाते हैं कि शिक्षा का केंद्र विद्यार्थी है या शिक्षक का ब्रांड? शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान का प्रसार होना चाहिए,न कि व्यक्तित्व का अंधानुकरण। हिंदी माध्यम और अंग्रेज़ी माध्यम की कोचिंग संस्कृति की तुलना भी चर्चा का विषय बनती रही है। यह धारणा अक्सर व्यक्त की जाती है कि हिंदी माध्यम में कुछ शिक्षक अत्यधिक प्रचार पर निर्भर रहते हैं, जबकि अंग्रेज़ी माध्यम में संस्थान अपेक्षाकृत संस्थागत पहचान को महत्व देते हैं। यद्यपि यह विभाजन पूर्णतः सही नहीं कहा जा सकता, फिर भी यह स्पष्ट है कि सोशल मीडिया के माध्यम से व्यक्तिगत ब्रांडिंग की प्रवृत्ति कुछ क्षेत्रों में अधिक दिखाई देती है। इसका प्रभाव विद्यार्थियों पर भी पड़ता है,जो विषयवस्तु की गुणवत्ता से अधिक लोकप्रियता और फॉलोअर्स की संख्या से प्रभावित होने लगते हैं। इस पूरे परिदृश्य में सरकार और शिक्षा नियामकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।
डॉ. प्रियंका सौरभ
हिसार हरियाणा
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