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अम्बिकापुर@ सरगुजा के बाद अब बस्तर की बारी?

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अंचल ओझा का उद्योग और खनन विस्तार पर बड़ा सवाल
विकास के नाम पर प्रकृति,संस्कृति और आदिवासी अस्तित्व खत्म किया जा रहा’,निजी कंपनियों की भूमिका पर उठाए गंभीर प्रश्न
अम्बिकापुर,07 मई 2026 (घटती-घटना)।
सरगुजा और बस्तर क्षेत्र में बढ़ते औद्योगिक और खनन विस्तार को लेकर सामाजिक एवं क्षेत्रीय मुद्दों पर मुखर रहने वाले अंचल ओझा ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने आरोप लगाया है कि विकास के नाम पर सरगुजा की प्रकृति, पर्यावरण और आदिवासी संस्कृति को लगातार नुकसान पहुंचाया गया और अब यही मॉडल बस्तर क्षेत्र में भी लागू करने की तैयारी चल रही है। अंचल ओझा ने कहा कि एक समय सरगुजा नक्सलवाद की समस्या से जूझ रहा था। जब वर्ष 2007-08 के आसपास क्षेत्र में नक्सल गतिविधियां कम हुईं, तब यह कहा गया कि अब इलाके का विकास होगा। उन्होंने माना कि कुछ विकास कार्य हुए भी, लेकिन धीरे-धीरे उसी विकास को आधार बनाकर बड़े पैमाने पर प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और निजी कंपनियों के विस्तार का रास्ता तैयार किया गया।
‘SECL के दौर और अब की स्थिति में बड़ा फर्क : उन्होंने कहा कि पहले क्षेत्र में SECL जैसी सरकारी कंपनियां काम करती थीं,जो कोयला खनन के साथ प्रभावित परिवारों को मुआवजा और रोजगार भी उपलब्ध कराती थीं। लेकिन समय के साथ सरकारी कंपनियों की भूमिका कम हुई और निजी कंपनियां क्षेत्र में सक्रिय हो गईं। ओझा का आरोप है कि निजी कंपनियां जमीन अधिग्रहण के बदले अधिक मुआवजा तो देती हैं, लेकिन पुनर्वास, स्थायी रोजगार और सामाजिक जिम्मेदारी के मामलों में बेहद कमजोर साबित हुई हैं। उन्होंने कहा कि जिन लोगों की जमीन, खेत और घर गए, उनमें से कई आज भी स्थायी रोजगार और पुनर्वास के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
लाखों पेड़ कटे,अभी और कटने की तैयारी : उन्होंने दावा किया कि खनन और औद्योगिक परियोजनाओं के कारण सरगुजा क्षेत्र में लाखों पेड़ों की कटाई हो चुकी है और आने वाले समय में भी बड़ी संख्या में पेड़ काटे जाने की योजनाएं हैं। अंचल ओझा ने कहा कि राजस्थान जैसे राज्यों को बिजली उपलब्ध कराने के नाम पर सरगुजा की हरियाली और पर्यावरण को लगातार नुकसान पहुंचाया जा रहा है। उनके अनुसार निजी कंपनियां सरकार की नीतियों और संरक्षण के सहारे क्षेत्र को ‘गर्म और सपाट मैदान’ में बदलने की दिशा में काम कर रही हैं।
अब बस्तर में भी वही मॉडल लागू होने का खतरा : उन्होंने कहा कि अब जब सरकार बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद समाप्त होने का दावा कर रही है, उसी के साथ वहां लौह अयस्क और अन्य खनिजों के बड़े पैमाने पर दोहन की योजनाएं भी शुरू हो चुकी हैं। ओझा ने आशंका जताई कि जिस तरह सरगुजा में विकास और उद्योग के नाम पर प्राकृतिक और सांस्कृतिक नुकसान हुआ, वैसी ही स्थिति अब बस्तर में भी देखने को मिल सकती है। उन्होंने कहा, ‘कभी-कभी लगता है कि नक्सलवाद से निपटना शायद आसान है, लेकिन सत्ता और शासन के संरक्षण में काम करने वाली बड़ी निजी कंपनियों से संघर्ष करना कहीं ज्यादा मुश्किल है। ‘
‘उद्योगों का विरोध नहीं,लेकिन अस्तित्व खत्म नहीं होना चाहिए ‘ः अंचल ओझा ने स्पष्ट किया कि वे उद्योग, निजी निवेश या विकास के विरोध में नहीं हैं। उनका कहना है कि समस्या तब शुरू होती है जब विकास की कीमत आदिवासी समाज, स्थानीय संस्कृति,जंगल,जल और पर्यावरण को चुकानी पड़े। उन्होंने कहा कि यदि विकास के नाम पर आदिवासी पहचान,लोकसंस्कृति,वन्यजीव और पर्यावरण को खत्म किया जाएगा, तो स्वाभाविक रूप से विरोध और संघर्ष भी सामने आएंगे।
आदिवासी नेतृत्व और सरकार की नीतियों पर सवाल : ओझा ने प्रदेश की वर्तमान सरकार और आदिवासी नेतृत्व पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि प्रदेश में आदिवासी मुख्यमंत्री होने के बावजूद हसदेव क्षेत्र, रायगढ़ और अब बस्तर में बड़ी कंपनियों के विस्तार से यह सवाल उठता है कि सरकार आदिवासी संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण को लेकर कितनी गंभीर है। उन्होंने कहा कि प्रदेश की औद्योगिक नीति से प्रभावित होकर देश और राज्य की कई बड़ी कंपनियां सरगुजा और बस्तर क्षेत्र में निवेश की तैयारी कर रही हैं। अंचल ओझा की यह टिप्पणी क्षेत्र में चल रही खनन परियोजनाओं, औद्योगिक विस्तार और पर्यावरणीय मुद्दों पर जारी बहस को एक बार फिर केंद्र में ले आई है।


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