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कोरिया/सोनहत@ शिविरों के आयोजन में ‘पक्षपात’ या ‘सुस्ती’?

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चुनिंदा गांवों पर मेहरबानी,दूरस्थ अंचलों में शिविरों का टोटा
कोरिया/सोनहत,16 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)।
सोनहत विकासखण्ड के 42 ग्राम पंचायतों और 104 गांवों के लिए सरकारी योजनाओं का लाभ पहुँचाने के उद्देश्य से लगने वाले ‘जनसमस्या निवारण शिविर’ अब महज एक औपचारिकता बनकर रह गए हैं। विडंबना यह है कि विकासखण्ड के विशाल भूगोल को समझने के बजाय प्रशासन ने कुछ खास गांवों को ही ‘शिविरों का केंद्र’ मान लिया है। पिछले कई आयोजनों पर गौर करें तो सोनहत,कटगोड़ी, रामगढ़, घुघरा और बोडार-भैंसवार जैसे सुगम स्थानों पर ही बार-बार शिविर लगाए जा रहे हैं, जबकि वास्तव में जरूरत वाले क्षेत्र आज भी अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।
दूरी बनी बाधा : रामगढ़ सिंघोर पर फोकस,आनंदपुर-अमृतपुर हाशिए पर…
प्रशासनिक अमला बार-बार रामगढ़ जैसे क्षेत्रों में शिविर लगा रहा है, जबकि भौगोलिक स्थिति देखी जाए तो रामगढ़ से कई गांवों की दूरी बहुत अधिक है, यदि यही शिविर आनंदपुर और अमृतपुर जैसे क्षेत्रों में लगाए जाएं, तो लगभग 16 गांवों के ग्रामीणों को सीधे तौर पर लाभ मिल सकता है। लेकिन शिविर चयन स्थल पर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर क्यों बार-बार एक ही परिधि में चक्कर काटा जा रहा है?
कछाड़ी – दमुज में लगे शिविर- दामुज में शिविर लगने से तर्रा बसेर, लब्जी दुधनिया केराझरिया आदि ग्राम के लोगो को लाभ मिलेगा, ऐसे लोग जिनके पास आवागमन की सुविधा नही है वो भी शिविर का लाभ ले सकेंगे, वही कछाड़ी में शिविर लगाने से दूरस्थ ग्राम मझगवां, जोगिया भगवतपुर लोलकी के लोगो को अपनी मांग व शिकायत रखने में बहुत ही आसानी होगी, लेकिन इन ग्रामो के। शिविर मेण्ड्रा में आयोजित किये जाने से बुजुर्ग और बिना वाहन वाले गरीब तबके के लोग नही पहुच पाते हैं।
इन गांवों में ‘मुद्दतों’ से है शिविर की दरकार
विकासखण्ड के केशगवां,चकडंड,पोड़ी,दमुज,कुशहा,किशोरी और मझारटोला ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ की जनता वर्षों से एक अदद सरकारी शिविर की राह देख रही है, ग्रामीणों का आरोप है कि मुख्यालय के करीबी गांवों में शिविर लगाकर कोरम पूरा कर लिया जाता है, जबकि सुदूर पहाड़ी और वानांचल क्षेत्रों में रहने वाले लोग सरकारी योजनाओं की जानकारी से भी वंचित हैं।
मझारटोला और रजौली में शिविर लगा तो होगा बड़ा लाभ
क्षेत्रीय जानकारों और ग्रामीणों की मांग तर्कसंगत है मझारटोल में यदि शिविर लगे तो सोनारी, बसवाहि, रावतसरई, पत्थरगवां और बेलार्ड जैसे दूरस्थ गांवों के हजारों लोगों को राहत मिलेगी।
रजौली या पोड़ी का विकल्प
यदि यहाँ शिविर का आयोजन होता है तो परिहत, आमहर, कर्री और रजपुरी जैसे बड़े गांवों के ग्रामीणों को मिलों दूर सोनहत या कटगोड़ी नहीं भटकना पड़ेगा।
अधिकारी मौन,जनता परेशान
एक ही स्थान पर बार-बार शिविर लगाने की इस परंपरा ने अब जनता के बीच रोष पैदा कर दिया है, सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन दुर्गम क्षेत्रों में जाने से कतरा रहा है? या फिर कुछ क्षेत्रों को ही लाभ पहुँचाना प्राथमिकता बन गया है? अब देखना यह होगा कि आगामी शिविरों के लिए प्रशासन अपनी सूची में बदलाव कर उन क्षेत्रों को जगह देता है या ‘परंपरा’ के नाम पर वही पुराना ढर्रा चलता रहेगा।
जन सहयोग समिति ने उठाई मांग…
कागजी आंकलन नहीं, भौगोलिक हकीकत भी देखें- इसी कड़ी में कोरिया जन सहयोग समिति के कार्यकारी अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता जयचन्द सोनपाकर ने प्रशासन से पुरजोर मांग की है कि सुशासन तिहार के अंतर्गत आयोजित होने वाले इन शिविरों का निर्धारण केवल फाइलों तक सीमित न रहे, उन्होंने कहा कि शिविरों के आयोजन से पूर्व क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थिति और दूरी का सटीक आंकलन किया जाना अनिवार्य है, श्री सोनपाकर ने जोर देते हुए कहा कि जब तक शिविर वंचित और दूरस्थ ग्रामों के बीच नहीं लगाए जाएंगे, तब तक शासन की मंशा के अनुरूप अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुँचना असंभव है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल सुगम स्थानों पर शिविर लगाने से उन ग्रामीणों के साथ अन्याय हो रहा है जो दुर्गम रास्तों के कारण इन आयोजनों तक नहीं पहुँच पाते।
इनका कहना है…


प्रशासनिक सुविधा के नाम पर केवल सड़क किनारे के गांवों में शिविर लगाना उन ग्रामीणों के साथ अन्याय है जो जंगल और ऊबड़-खाबड़ रास्तों को पार कर मुख्यालय तक नहीं पहुँच सकते। शिविर का असली उद्देश्य अंतिम व्यक्ति तक पहुँचना है,न कि केवल कागजी खानापूर्ति करना।
ज्योत्स्ना राजवाड़े पूर्व जिलापंचायत सदस्य


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