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लेख@ सरगुजिहा बोली का प्रथम महाकाव्य

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राम हनुमान गोठ,अर्थात सरगुजिहा छत्तीसगढ़ी रमायन
श्री बंशीधर लाल जो सामान्यतः बी0डी0लाल के में संबोधित किये जाते हैं वैसे तो हिन्दी के व्याख्याता के रूप में शासकीय विद्यालयों में सेवा किये और हिन्दी में अनेक पुस्तकों – का लेखन किये हैं और अभी भी कर रहे हैं परन्तु पुस्तक के रूप में उनकी प्रथम कृति सन् 2010 में सरगुजा की आतुर बोली में -राम हनुमान गोठ- के रूप में प्रकाश में आयी।
यह बड़े हर्ष की बात है कि उपेक्षित बोली को एक पहचान दिलाने का इस स्तर पर श्री लाल ने प्रयास किया है। इसमें राम की कथा जन्म से लेकर लंका विजय के पश्चात् अयोध्या वापस आना और राज्य का दायित्व स्वीकार करना अंकित है। पुस्तक में राम के जीवन की प्रमुख घटनाओं को उपशीर्षकों में उल्लेखित कर सरल-सुवोध बनाने प्रयास किया गया है जैसे-
रामजनम अड लरिकाई,राम बिहाव
राम वनवास,सीता कर खोज-राम हनुमान भेट आदि उनको भी अलग-अलग घटनाओं के आधार पर प्रस्तुत किया गया है जिसे सामान्य जन भी समझ सकते हैं। लेखक ने अपने परिचयात्मक आलेख-चिन्हारी वर-में स्पष्ट किया है कि-सरगुजा छत्तीसगढ़ में प्रचलित प्रतीकों के माध्यम से सब कुछ कहा गया है। यह इस तथ्य को उजागर करता है कि इस लोक बोली में भी ऐसी सामर्थ्य है जो गूढ़ विषय की अभिव्यक्ति सरसता के साथ कर सकती है।
भारतीय काव्य शास्त्र परम्परा में महाकाव्य के कुछ मानक स्वीकृत हैं, उसका निर्वाह कितना किया है उसका स्पष्टीकरण करते हुए कवि ने लिखा है कि –
अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि और राम कथा का सर्वमान्य ग्रंथ ‘‘मानस’’ का गहरा प्रभाव कलापक्ष पर है। बिन्दुवार यदि विवेचन किया जाय तो महाकाव्य के स्वरूप स्पष्ट उजागर होंगे।
(1) राम की पावन गाथा भारतीय समाज ही नहीं अविरल धरा पर सर्वमान्य है जो शुभ संदेश परक है।
2) इसके पात्र सर्वोच्च मानवीय गुण सम्पन्न है।
3) कथा का श्रीगणेश वन्दना-‘‘सुमिरनी’’ से होता है- ग गनेश का सुमिरन करिके गोठ राम कर गाऊँ
और हनुमान जी को सुमिरते हुए कवि कहता है
हनुमान तोर गोठ राम संग
सुर तो बहुत सोहाथे,
लकड़ा कर चटनी संग जइसे
बासी गजब मिठाथे।
इसमें सरगुजा अंचल में प्रसारित प्रतीकों का बड़ा ही मधुर समन्वय है।
(4) रचना का समापन सुखान्त है जैसा कि भारतीय बांगमय में अपेक्षा की जाती है।
(5) घटनाक्रम के आधार पर, जहाँ अलग- अलग वर्णन हुआ है वहाँ कथा क्रम में
कहीं टूटन नजर नही आती है। स्थान- स्थान पर छन्द विधान में परिवर्तन भी
दिखायी देता है।
(6) आपसी संवाद की रोचक बने हैं चाहे विषय वस्तु कैसी भी हो जैसे मंथरा- कैकेयी संवाद,महाराज – कैकेयी संवाद,
केक्ट-राम संवाद आदि।
(7) नगर वर्णन, याज्ञा वर्णन प्रकृति चित्रण आदमी स्थान स्थान पर किये गये हैं। इस क्रम में विभिन्न रसों का परिपाक विषया नुसार दिखायी देता है। सूक्ष्म मनोभाव का स्थान-स्थान पर चित्रण आकर्षक है। जब राम-लक्ष्मण विश्वामित्र जी के साथ जनकपुर हेतु प्रस्थान करते हैं तो राम का मनोभाव अद्भुत रूप में प्रस्तुत
किया गया है-
‘‘राम-लखन चले सिया कर गाँव,
हालू हालू उठतई पाँव
मन मा फुरहरी,
तन मा सुरहरी
शिव शंकर कर भजते नांव।’’
(8) तीन गुण हो यो तीन शब्द शक्तियाँ, शब्दालंकार हो या अर्थालंकार स्थान-स्थान पर स्वाभाविक रूप में मिलते हैं कहीं बोझ रूप में नहीं मिलते हैं। घायल हनुमान जब अयोध्या में भरत को अपना परिचय देते हैं तो इतना सरल- सटीक और रोचक है कि पाठक मुग्ध हो कर हनुमान के बुद्धिचातुर्य का कायल हो
जाता है।
(9) जिन गुणों के लिये रामचन्द्र जी का परिवार समाज में आदर्श रूप में स्वीकृत है उनका निर्वाह इस ग्रंथ में किया गया है ऐसा कहा जा सकता है। सीता जी,लक्ष्मण जी,मत-शत्रुध्नजी सबके चरित्र से रामराज्य की स्थापना में योगदान की
पुष्टि होती है।

यह एक लघुकाय महाकारण है। इसमें सर्गों के हुप में विभाजन नहीं किया है जैसा कि माना जाता है कि कम से कम आठ सर्ग होने चाहिए। वास्तव में सर्ग घटनाक्रम को समझते में सहायक होते हैं ऐसे में इस ग्रंथ में किये गये विभाजन उसका स्थान स्वतः, पाते हैं। छन्द विधान का भी एकं निर्धारित रूप में निर्वहण नहीं किया गया है लेकिन विषय वस्तु पर प्रकाश डालने में प्रत्येक छंद स्वाभाविकः प्रतीत होते हैं।
सरगुजा आदिवासी अंचल का प्रतिनिधित्व करता है। कवि ने आदिवासियों द्वारा गाये जाने वाली धुन पर भी एक छन्द रच दिया है जैसे
सोनकर लंका ले – सोनकर मिरगा
निकलिस रेंगिस – सोन कर मिरगा
पंचवटी पहुँचिस – सोन कर मिरगा
सिया ला लुभाइस – लोन कर मिरगा ।

यद्यपि घोषित रूप में छन्द विधान और राग-रागिनियाँ नहीं मिलती हैं परन्तु संपूर्ण रचना गेय है। सामान्य पाठक भी अपनी धुन में इसे पिरो सकता है और काव्यानन्द का अनुभव कर सकता है।‘‘स्वान्तः सुखाय रघुनाथ गाथा’’ का यह काव्य जीता-जागता प्रमाण है। पाठक कही भी बोझिल मन नहीं होगा ऐसा कहा जा सकता है।
श्री लाल वर्षों से रचना कर रहे हैं, प्रसारण और स्फुट प्रकाशन होता रहता है लेकिन पुस्तक के (रूप में पहली रचना महाकाव्य के रूप में प्रकाशित होना बड़ी ही प्रशंसा का आधार है। जैसा कि श्री लाल ने ‘‘चिन्हारी वर’’आलेख में अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि बतायी है उसमें इस प्रकार की अभिव्यक्ति स्वाभाविक लगती है और प्रशंसनीय है। साथ ही इस पुस्तक में स्थानीय परम्पराओं और प्रतीकों का राजसी वैभव के साथ अद्भुत समन्वय मिलता है। जैसे बच्चों के जन्मोत्सव में स्थानीय परम्पराओं का पालन करते हुए दिखाया गया है,छठी का आयोजन, उसमें महिलाओं को नाखून काटना, केश सँगरना, महावर-आलत्मक लगाना,काँके पीना सभी स्थानीय परम्पराओं की ओर इंगित करते हैं। इसी प्रकार विवाह के आयोजन हेतु मंडव निर्माण में
स्थानीय सामग्री का उपयोग करते हुए राजसी वैभव का प्रदर्शन जैेसे :-
सरई झाडू कर हरियर डहुरा
सुग्घर मड़वा बनावे
हीरा मोती लाल जगहर
गुहि कर सान बढ़ाये।

इसी प्रकार स्थानीय व्यंजनों का भी यथा स्थान उल्लेख मिलता है। जब सीता जी की विदायी हो जाती है तो उनके साथ जो भेट सामग्री चलती है उसके प्रति कवि स्वर बहुत ही मधुर निकलता है- दृष्टया है-
भार उठाये दाइज कर
कमिया, भरिहा आगू-आगू
चारो वहिनिन सेवा खांतिर
रोताइन बरगाहिन पीहूं।
और- ख्वाजा खड़पुडिया, खुरमा
सतरंगी मेरे अनरसा
झॉपी झॉपा दौरी कुण्डा
लेडुआ अउर बतासा
बुनिया माठ ठोकआ ठुरिया
देखि के टपके लार

इस तरह कवि ने अपने इस काव्य में लोक रीतियों और परम्पराओं का उल्लेख कर आम जनों को आकृष्ट करने का सफल प्रयास किया है। पाठक इसमें अपनत्व पाता है।.
जैसा लोक प्रचलित है कि महाराज दशरथ ने एक यज्ञ कराया जिसमें अग्रेदेव ने स्वयं प्रगट हो प्रसाद रूप में हवि (खीर) उपलब्ध कराया जिसके सेवन के पश्चात रामलक्ष्मण चारो भाई का जन्म हुआ। वास्तव
में वह एक वैज्ञानिक प्रयोग दवा निर्माण के लिये था जिससे गर्भ सुरक्षित रहे। हमारे यहाँ के
सारे कृत्य जो आज विज्ञान की कसौटी पर खरे उतर रहे हैं उनकी सफलता निर्विध्न बनाये रखने के लिये पूजन-यापन से जोड़ दिया गया था। शादी-विवाह में मंत्रोच्चार आदि ईश्वर को साक्षी मानकर उच्चरित होते हैं और इस ग्रंथ में भी उसका विवरण मिलता है जो इस काव्य को लोकरूचि के अनुरूप है।
कवि श्री लाल ने जनकपुर की वाटिका, अशोक वाटिका = की भूमिका से पर्यावरण की महत्ता पुष्ट कर दिया है जहाँ सीता जी का प्रेम भाव जन्म लिया और परीक्षा देने में भी सफल हुआ। इसी प्रकार भगवान राम ने शबरी और अहल्या के प्रति जो आत्मीयता दिखायी वह इस बात का संकेत करता है कि जीवन में निकट से निकट जुड़ने में ही सफलता है आनंद है।
ऐसी घटनायें इस काव्य को मानवीय भावनाओ को पुष्ट करने वाली सिद्ध होती हैं जो एक आदर्श रचना का उद्देश्य होता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि तुलसीदास जी का कथन-
‘‘ मासा मनिति मृति भक्ति सोई:
सुरसरि सम सब कर हित होई।’’

इस लघुकायूँ महाकाय को भी जन रंजक की कसौटी पर खरा उतरता है।
इति शुभम्
समीक्षक
डॉ. सुदामा मिश्र
सेवानिवृत्त-सहायक प्राध्यापक
अम्बिकापुर,सरगुजा(छ0ग0)

रचयिता-वंशीधर लाल
सेवानिवृत्त प्राचार्य
अम्बिकापुर,छत्तीसगढ़


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