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कोरिया@33 साल बाद दोस्ती का पुनर्जागरण, बैच 1994-95 का कोरिया में ऐतिहासिक रीयूनियन

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तीन दिनों तक यादों,सम्मान और अपनत्व का अद्भुत संगम
कोरिया,13 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)।
समय बीतता है, लोग बदलते हैं,शहर दूर हो जाते हैं लेकिन कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो दशकों बाद भी उसी गर्माहट के साथ लौट आते हैं, कोरिया जिले में बैच 1994-95 के साथियों का 33 वर्षों बाद आयोजित रीयूनियन इसी सच्चाई का जीवंत उदाहरण बनकर सामने आया, 10 से 12 अप्रैल तक चला यह तीन दिवसीय आयोजन सिर्फ एक मुलाकात नहीं था,बल्कि यह एक भावनात्मक यात्रा थी, जहां हर चेहरा अपने अतीत से संवाद करता नजर आया, हर हंसी में बचपन की झलक थी और हर आंख में बीते समय की नमी।
महिला नेतृत्व ने रचा अनुकरणीय उदाहरण- इस रीयूनियन की सबसे उल्लेखनीय बात रही
महिला साथियों की सक्रिय और प्रभावी भूमिका, पूरे आयोजन की रूपरेखा, मेहमानों के ठहरने की व्यवस्था, कार्यक्रमों की योजना और क्रियान्वयन हर पहलू को बेहद व्यवस्थित और संवेदनशील ढंग से संभाला गया, रामसेतु होटल में सभी साथियों के ठहरने की व्यवस्था की गई,जहां वातावरण को इस तरह तैयार किया गया कि हर व्यक्ति खुद को ‘मेहमान’ नहीं, बल्कि ‘परिवार’ का हिस्सा महसूस करे।
रिश्तों में परिवार का विस्तार
इस रीयूनियन ने यह भी दिखाया कि दोस्ती सिर्फ व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहती वह परिवारों तक फैलती है, गुलाब गुप्ता, शांति बड़ेरिया, आलोक, आशीष, अनूप, मोनू, रुचि बड़ेरिया और उनके परिवारों ने सभी साथियों का आत्मीय स्वागत किया, उपहारों का आदान-प्रदान सिर्फ औपचारिकता नहीं था, यह उस अपनत्व का प्रतीक था, जो वर्षों बाद भी कायम रहा।
सामाजिक परिप्रेक्ष्यः क्यों महत्वपूर्ण है ऐसा आयोजन?
यह रीयूनियन सिर्फ एक निजी आयोजन नहीं था—यह सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण संकेत देता हैः
डिजिटल युग बनाम वास्तविक रिश्ते
आज जहां संबंध सोशल मीडिया तक सीमित होते जा रहे हैं, वहां इस तरह के आयोजन यह बताते हैं कि वास्तविक मुलाकातों का कोई विकल्प नहीं।
गुरु-शिष्य परंपरा की निरंतरता
गुरुजनों का सम्मान इस बात का प्रमाण है कि आधुनिकता के बावजूद पारंपरिक मूल्यों की जड़ें अभी भी मजबूत हैं।
भावनात्मक स्वास्थ्य और सामाजिक जुड़ाव
ऐसे आयोजन मानसिक संतुलन और सामाजिक जुड़ाव को मजबूत करते हैं—जो आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में बेहद जरूरी है।
प्रमुख सहभागी
इस आयोजन में मोना जायसवाल, अपर्णा मित्रा, प्रीती गुप्ता, जितेंद्र जैन, ज्योति सिंह, प्रदीप नामदेव, अनुराधा मंडल, सुरेश गुप्ता, मनोरमा शुक्ला, रेनू, आरती सिंह, आशा पटवा, रेखा यादव, गीता सिंह, शालिनी गुप्ता, अमूदा कृष्णनन, रुहिली दास, रंजीता गुप्ता, कृपा पांडे, अंजू जैन, सुमन दुबे, शोभा सोनी, अभय बड़ेरिया, आलोक यादव, भूपेंद्र सिंह, भूपेंद्र पाल, विजय सिंह ठाकुर, आशीष गुप्ता, धीरेन्द्र दीक्षित, अजीत लकड़ा, डिम्मी गुप्ता, जय प्रकाश गुप्ता, कामिनी दुबे एवं अजीत पटेल सहित अनेक साथी शामिल रहे।
समय हार गया, दोस्ती जीत गई
तीन दिनों का यह आयोजन समाप्त हुआ, लेकिन इसकी गूंज लंबे समय तक बनी रहेगी, यह रीयूनियन एक संदेश छोड़ गया रिश्ते अगर सच्चे हों, तो समय और दूरी उन्हें खत्म नहीं कर सकते, 33 साल बाद मिले इन दोस्तों ने साबित कर दिया कि दोस्ती सिर्फ एक याद नहीं, बल्कि जीवन का स्थायी अध्याय है।
पहला दिनः गुरु वंदन, भावनाओं का उफान और मस्ती की शुरुआत
रीयूनियन का पहला दिन उस परंपरा को समर्पित रहा, जिसने इन साथियों को जीवन की दिशा दी गुरुजनों का सम्मान, जैसे ही वर्षों बाद छात्र अपने शिक्षकों के सामने पहुंचे, औपचारिकता की जगह भावनाओं ने ले ली, चरण स्पर्श, आशीर्वाद और पुराने किस्सों की चर्चा ने माहौल को गहराई तक छू लिया, इसके बाद साथियों ने कोरिया पैलेस और झुमका डैम का भ्रमण किया, यह सिर्फ पर्यटन नहीं था यह वह मंच था जहां हर कोई अपने ‘पुराने रूप’ में लौट आया, 90 के दशक के गीतों पर डांस, खुलकर हंसी-मजाक, अनगिनत सेल्फी और ग्रुप फोटो शाम होते-होते यह स्पष्ट हो गया कि यह रीयूनियन ‘औपचारिक कार्यक्रम’ की सीमाओं से बहुत आगे जा चुका है।
दूसरा दिनः अतीत की गलियों में वापसी,जहां से सफर शुरू हुआ
दूसरे दिन का केंद्र रहा—पुराने शिक्षण संस्थानों का पुनः दर्शन, सभी साथी रामानुज प्रताप सिंह कॉलेज पहुंचे, जहां हर कोना जैसे उन्हें पहचान रहा था, कक्षाओं की दीवारें, मैदान की मिट्टी और गलियारों की हवा सब कुछ जैसे बीते वर्षों की कहानियां सुना रहा था, इसके बाद गर्ल्स स्कूल और अभ्यास शाला प्राइमरी स्कूल का दौरा किया गया, यहां पहुंचकर माहौल और भी भावुक हो गया बचपन की शरारतें याद आईं, पुराने मित्रों के साथ बिताए पल फिर जीवंत हुए, प्रार्थना स्थल पर सभी ने एक साथ ‘जन-गण-मन’ गाया—यह क्षण आयोजन का सबसे संवेदनशील और गौरवपूर्ण पल बन गया, स्थानीय प्राचार्य की उपस्थिति ने इस अवसर को औपचारिक सम्मान भी प्रदान किया।
तीसरा दिन : प्रकृति के बीच सुकून और यादों का समापन
तीसरे दिन का आयोजन प्रकृति की गोद में किया गया, सोनहत स्थित घुनघुट्टा डैम और आनंदपुर नर्सरी सुंदर वन में साथियों ने सुकून के पल बिताए, हरियाली और पहाड़ों के बीच फोटोशूट, गीत-संगीत और खुली बातचीत, बीते वर्षों के अनुभवों का साझा करना, यह दिन एक शांत लेकिन गहरे प्रभाव वाला समापन साबित हुआ।


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