सिस्टम की गलती का बोझ कर्मचारियों पर
-न्यूज डेस्क-
बिलासपुर,05 फरवरी 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग की वर्ष 2011 की विवादित भर्ती पर बड़ा फैसला सुनाते हुए 67 सब-इंजीनियर (सिविल) की नियुक्तियों को अवैध करार देते हुए निरस्त कर दिया है, चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट कहा कि भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद नियमों और योग्यता मापदंडों में बदलाव करना कानून के खिलाफ है और ‘बैकडोर एंट्री’ किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं की जा सकती, कोर्ट ने माना कि विज्ञापन में तय अंतिम तिथि तक आवश्यक डिग्री या डिप्लोमा होना अनिवार्य है, चयन की तारीख को आधार नहीं बनाया जा सकता। जांच में सामने आया कि 2011 की भर्ती प्रक्रिया में 89 उम्मीदवार ऐसे थे जिनके पास आवेदन की अंतिम तिथि तक निर्धारित शैक्षणिक योग्यता नहीं थी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला एक कड़ा संदेश है कि भर्ती प्रक्रिया में नियमों से समझौता नहीं किया जा सकता। लेकिन यह मामला शासन की देरी, लापरवाही और जवाबदेही की कमी को भी उजागर करता है, कानून ने अपना काम कर दिया, अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या सिस्टम की गलती के असली जिम्मेदारों पर भी कभी कार्रवाई होगी या नहीं।
क्या था पूरा मामला?
ग्रामीण अभियांत्रिकी सेवा के तहत वर्ष 2011 में 275 सब-इंजीनियर पदों के लिए विज्ञापन जारी किया गया था, लेकिन आरोप है कि नियमों में बदलाव कर 275 की जगह 383 नियुक्तियां कर दी गईं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे अभ्यर्थियों की थी जिनकी योग्यता कट-ऑफ तिथि तक पूरी नहीं हुई थी, इस भर्ती को चुनौती देते हुए रवि तिवारी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। पहले सिंगल बेंच ने राहत देने से इनकार किया, लेकिन डिवीजन बेंच में अपील के बाद पूरी प्रक्रिया की वैधता पर सवाल खड़े हुए और अंततः नियुक्तियां रद्द कर दी गईं।
शासन का तर्क और कोर्ट की सख्ती
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने कहा कि अंतिम सेमेस्टर में पढ़ रहे अभ्यर्थियों को मौका देने का बाद में निर्णय लिया गया था और कई कर्मचारी 14 साल से सेवा दे रहे हैं, लेकिन कोर्ट ने दो टूक कहा कि लंबी सेवा अवधि किसी अवैध नियुक्ति को अवैध नहीं बना सकती।
दो को राहत, बाकी की नियुक्ति खत्म
डिवीजन बेंच ने प्रतिवादी क्रमांक 4 से 73 तक की नियुक्तियां निरस्त कर दीं। हालांकि वर्षा दूबे और अभिषेक भारद्वाज को राहत दी गई क्योंकि उन्होंने कट-ऑफ तिथि से पहले आवश्यक योग्यता पूरी कर ली थी, मानवीय आधार पर कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि अब तक दिए गए वेतन और भत्तों की वसूली नहीं की जाएगी।
सरकारी लापरवाही पर तीखी टिप्पणी
कोर्ट ने चयन प्रक्रिया में अनावश्यक देरी और नियमों के उल्लंघन को गंभीर चूक बताया,फैसले में कहा गया कि प्रशासनिक गलतियों के कारण कई अभ्यर्थी अब ऐसी उम्र में पहुंच गए हैं जहां दूसरी सरकारी नौकरियों के अवसर लगभग खत्म हो चुके हैं।
एफआईआर और जांच का लंबा इतिहास
भर्ती गड़बड़ी को लेकर 2022 में रायपुर के सिविल लाइंस थाने में एफआईआर भी दर्ज हुई थी,आरोप था कि निर्धारित पदों से ज्यादा नियुक्तियां की गईं और कई अभ्यर्थी कट-ऑफ तिथि के बाद योग्य घोषित किए गए, सरकार द्वारा गठित तीन समितियों ने भी 89 नियुक्तियों को अवैध माना था, लेकिन लंबे समय तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
व्यवस्था की भूल,युवाओं की धूल-आखिर जिम्मेदार कौन?
यह फैसला कानून की नजर में भले ही सही हो, लेकिन शासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल छोड़ गया है, 14 साल तक सेवा लेने के बाद अचानक नौकरी खत्म होना केवल कानूनी मसला नहीं,बल्कि सामाजिक और मानवीय संकट भी है।
14 साल का भरोसा या प्रशासनिक भ्रम?
इन सब-इंजीनियरों ने अपने जीवन का अहम दौर सरकारी सेवा में बिताया। यदि नियुक्तियां नियमों के खिलाफ थीं, तो शासन ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की? क्या यह लापरवाही थी या जिम्मेदारी से बचने की कोशिश?
नियम बदलने वाले सुरक्षित, नौकरी करने वाले बाहर
नियमों में फेरबदल और पदों की संख्या बढ़ाने का निर्णय उच्च स्तर पर लिया गया, लेकिन सजा उन अभ्यर्थियों को मिली जिन्होंने केवल आवेदन किया था। सवाल उठता है कि भर्ती प्रक्रिया को ‘अवैध’ बनाने वाले अधिकारी और निर्णयकर्ता कब जवाबदेह होंगे?
समितियों की रिपोर्ट पर चुप्पी क्यों?
तीन समितियों की नकारात्मक रिपोर्ट के बावजूद वर्षों तक कोई कार्रवाई नहीं होना बताता है कि सिस्टम में कहीं न कहीं राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव रहा। अब जब फैसला आया, तो इसकी कीमत 67 परिवारों को चुकानी पड़ रही है।
घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur