
विक्रम साराभाई का जन्म 12 अगस्त 1919 को गुजरात, भारत के अहमदाबाद शहर में हुआ था। साराभाई के परिवार का उनके जीवन में बहुत महत्त्व था और वे एक अमीर व्यापारी परिवार से सम्बन्ध रखते थे। उनके पिता अम्बालाल साराभाई एक समृद्ध उद्योगपति थे जिन्होंने गुजरात में कई मिल्स अपने नाम कर रखी थी। विक्रम साराभाई, अम्बालाल और सरला देवी की 8 संतानो में से एक थे। अपने 8 बच्चों को पढाने के लिए सरला देवी ने मोंटेसरी प्रथाओ के अनुसार एक प्राइवेट स्कूल की स्थापना की, जिसे मारिया मोंटेसरी ने प्रतिपादित किया था, उनकी इस स्कूल ने बाद में काफी ख्याति प्राप्त की थी। साराभाई का परिवार भारतीय स्वतंत्रता अभियान में शामिल होने के कारण बहोत से स्वतंत्रता सेनानी जैसे महात्मा गांधी,मोतीलाल नेहरू, रबीन्द्रनाथ टैगोर और जवाहरलाल नेहरू अक्सर साराभाई के घर आते-जाते रहते थे। इन सभी सेनानियो का उस समय युवा विक्रम साराभाई के जीवन पर काफी प्रभाव पडा और उन्होंने साराभाई के व्यक्तिगत जीवन के विकास में काफी सहायता भी की.सितम्बर 1942 को विक्रम साराभाई का विवाह प्रसिद्ध क्लासिकल डांसर मृणालिनी साराभाई से हुआ। उनका वैवाहिक समारोह चेन्नई में आयोजित किया गया था जिसमे विक्रम के परीवार से कोई उपस्थित नही था,क्योकि उस समय महात्मा गांधी का भारत छोड़ो आंदोलन चरम पर था,जिसमे विक्रम का परीवार भी शामिल था। विक्रम और मृणालिनी को दो बच्चे हुवे- कार्तिकेय साराभाई और मल्लिका साराभाई. मल्लिका साराभाई अपनेआप में ही एक प्रसिद्ध डांसर है जिन्हें पालमे डी’ओरे पुरस्कार से सम्मानित किया गया उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि वे एक ऐसे उच्च कोटि के इन्सान थे जिसके मन में दूसरों के प्रति असाधारण सहानुभूति थी। वह एक ऐसे व्यक्ति थे कि जो भी उनके संपर्क में आता, उनसे प्रभावित हुए बिना न रहता। वे जिनके साथ भी बातचीत करते, उनके साथ फौरी तौर पर व्यक्तिगत सौहार्द स्थापित कर लेते थे। ऐसा इसलिए संभव हो पाता था क्योंकि वे लोगों के हृदय में अपने लिए आदर और विश्वास की जगह बना लेते थे और उन पर अपनी ईमानदारी की छाप छोड़ जाते थे। विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र इसरो का सबसे बड़ा एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण केंद्र है। यह तिरुवनंतपुरम में स्थित है। यहाँ पर रॉकेट, प्रक्षेपण यान एवं कृत्रिम उपग्रहों का निर्माण एवं उनसे सम्बंधित तकनीकी का विकास किया जाता है। केंद्र की शुरुआत थम्बा भूमध्यरेखीय रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र के तौर पर 1962 में हुई थी। केंद्र का पुनः नामकरण भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ॰ विक्रम साराभाई के सम्मान में किया गया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की स्थापना उनकी महान उपलब्धियों में एक थी। रूसी स्पुतनिक के प्रमोचन के बाद उन्होंने भारत जैसे विकासशील देश के लिए अंतरिक्ष कार्यक्रम के महत्व के बारे में सरकार को राज़ी किया। डॉ. साराभाई ने अपने उद्धरण में अंतरिक्ष कार्यक्रम के महत्व पर ज़ोर दिया. ऐसे कुछ लोग हैं जो विकासशील राष्ट्रों में अंतरिक्ष गतिविधियों की प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हैं। हमारे सामने उद्देश्य की कोई अस्पष्टता नहीं है। हम चंद्रमा या ग्रहों की गवेषणा या मानव सहित अंतरिक्ष-उड़ानों में आर्थिक रूप से उन्नत राष्ट्रों के साथ प्रतिस्पर्धा की कोई कल्पना नहीं कर रहें हैं लेकिन हम आश्वस्त हैं कि अगर हमें राष्ट्रीय स्तर पर, और राष्ट्रों के समुदाय में कोई सार्थक भूमिका निभानी है, तो हमें मानव और समाज की वास्तविक समस्याओं के लिए उन्नत प्रौद्योगिकियों को लागू करने में किसी से पीछे नहीं रहना चाहिए। विज्ञान के क्षेत्र में उनकी उपलब्धियों को देखते हुए 1962 में उन्हें ‘शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया 7 भारत सरकार ने उन्हें 1966 में ‘पद्मभूषण’ से अलंकृत किया 7 इन सबके अतिरिक्त इंडियन अकादमी ऑफ साइंसेज, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंसेस ऑफ इंडिया, फिजिकल सोसाइटी, लन्दन और कैम्बि्रज फिलोसाफिकल सोसाइटी ने उन्हें अपना ‘फैलो’ बनाकर सम्मानित किया। डॉ. साराभाई जब वापस अपने स्वतंत्र भारत में आए तो उन्होंने उन सुविधो को लाने या उसकी पूर्ति करना चाहा था जो अभी लोगो के बीच नहीं था, इसके लिए उन्होंने अपने परिवार द्वारा चलाए जा रहे समाजसेवी संस्थानों को चलाना आरम्भ कर दिया। इस महान वैज्ञानिक के सम्मान में तिरूवनंतपुरम में स्थापित थुम्बा इम्ेटोरियल रॉकेट लाँचिंग स्टेशन और सम्बध्द अंतरिक्ष संस्थाओं का नाम बदल कर विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केन्द्र रख दिया गया , उनके पिता अंबालाल साराभाई एक संपन्न उद्योगपति थे भारत में इंटरमीडिएट विज्ञान की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद विक्रम साराभाई इंग्लैंड चले गये और केम्बि्रज विश्वविद्यालय के सेंट जॉन कॉलेज में भर्ती हुए अहमदाबाद में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला की स्थापना में उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की स्थापना विक्रम साराभाई की महान उपलब्धियों में एक थी विक्रम साराभाई को विज्ञान एवं अभि यांत्रिकी के क्षेत्र में सन 1966 में भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था. विक्रम साराभाई को सन 1966 में पद्म श्री एवं 1972 में पद्म विभूषण से नवाजा गया था7 डॉ. साराभाई द्वारा स्थापित संस्थान में भौतिक अनुसंधान प्रयोग शाला (पी आर एल), अहमदाबाद, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट (आई आई एम), अहमदाबाद, कम्यूनिटी साइंस सेंटर,अहमदाबाद, दर्पण अकाडेमी फ़ॉर परफ़ार्मिंग आर्ट्स, अहमदाबाद,विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र, तिरुवनंतपुरम, स्पेस अप्लीकेशन्स सेंटर, अहमदाबाद (यह संस्थान साराभाई द्वारा स्थापित छह संस्थानों/केंद्रों के विलय के बाद अस्तित्व में आया), फ़ास्टर ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (एफ़ बी टी आर), कल्पकम, वेरिएबल एनर्जी साइक्लोट्रॉन प्रॉजेक्ट, कोलकाता, इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (ई सी आई एल), हैदराबाद, यूरेनियम कार्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड (यू सी आई एल),जादूगुडा,बिहार आदि प्रमुख हैं। विक्रम साराभाई ने कास्मिक किरणों के समय परिवर्तन पर अनुसंधान किया और निष्कर्ष किया कि मौसम विज्ञान परिणाम कास्मिक किरण के दैनिक परिवर्तन प्रेक्षण पर पूर्ण रुप से प्रभावित नहीं होगा। आगे, बताया कि अवशिष्ट परिवर्तन विस्तृत तथा विश्वव्यापी है तथा यह सौर क्रियाकलापों के परिवर्तन से संबंधित है। विक्रम साराभाई ने सौर तथा अंतरग्रहीय भौतिकी में अनुसंधान के नए क्षेत्रों के सुअवसरों की कल्पना की थी।
वर्ष 1957-1958 को अंतर्राष्ट्रीय भू-भौतिकी वर्ष के रुप में देखा जाता है। साराभाई द्वारा अंतर्राष्ट्रीय भू-भौतिकी वर्ष के लिए भारतीय कार्यक्रम एक अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा। 1957 में स्पुटनिक-1 के प्रमोचन ने उनको अंतरिक्ष विज्ञान के नये परिदृश्यों से अवगत कराया। तदनंतर, उनकी अध्यक्षता में अंतरिक्ष अनुसंधान हेतु भारतीय राष्ट्रीय समिति का गठन किया गया। थुम्बा का विशेष नक्शा कि वह भू-चुबंकीय मध्यरेखा के निकट है को देखते हुए विक्रम साराभाई ने तिरुअनंतपुरम के पास अरबी तट पर स्थित एक मछुवाही गॉव थुम्बा में देश के प्रथम राकेट प्रमोचन स्टेशन, थुम्बा भू-मध्य रेखीय राकेट प्रमोचन स्टेशन की स्थापना का चयन किया। इस साहस में, उनको होमी भाभा जो उस समय परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष थे से सक्रिय सहयोग मिला था। नवंबर 21, 1963 को सोडियम वाष्प नीतभार के साथ प्रथम राकेट का प्रमोचन किया गया।भारत में अंतरिक्ष कार्यक्रमों के जनक इस महान वैज्ञानिक की 30 दिसंबर 1971 को मृत्यु हो गई, किन्तु उनके बताए रास्तों पर चलते हुए भारतीय वैज्ञानिक 1975 ई. में स्वदेश में निर्मित प्रथम उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ को अंतरिक्ष में भेजने में कामयाब रहे 7 अंतरिक्ष उपग्रहों के कारण ही ग्रामीण क्षेत्रों में टेलीविजन प्रसारण द्वारा शिक्षा, कृषि एवं ग्रामीण विकास में मदद मिल रही है तथा मौसम पूर्वानुमान से देश के गरीब किसानों को लाभ हो रहा है 7 डॉ. साराभाई के व्यक्तित्व का सर्वाधिक उल्लेखनीय पहलू उनकी रुचि की सीमा और विस्तार तथा ऐसे तौर-तरीके थे, जिनके बल पर वे अपने विचारों को संस्थाओं में परिवर्तित करने में कामयाब हुए 7 उन्हें सृजनशील वैज्ञानिक के अतिरिक्त यदि सफल और दूरदर्शी उद्योगपति, उच्च कोटि का प्रवर्तक, महान संस्था निर्माता, शिक्षाविद,कला मर्मज्ञ, अग्रणी प्रबंध आचार्य जैसे विशेषणों से सुशोभित किया जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी 7 वे आज सशरीर हमारे बीच भले ही न हों, परंतु अंतरिक्ष विज्ञान , परमाणु ऊर्जा, औषधि निर्माण,भौतिक विज्ञान इत्यादि के क्षेत्र में उनके योगदान को भारत कभी नहीं भुला सकता है । डॉ. साराभाई का जीवन विश्व भर के युवा-वैज्ञानिकों के लिए प्रेरणा का अनमोल स्रोत है या। अपने जीवनकाल में साराभाई ने 38 संस्थान स्थापित किए जो आज अंतरिक्ष अनुसंधान, भौतिकी, प्रबंधन और प्रदर्शन कला के क्षेत्र में अग्रणी हैं। उनके बाद आने वाले भारत के लगभग सभी अंतरिक्ष वैज्ञानिक ज्ञान, नेतृत्व और कृतज्ञता में उनके ऋणी हैं।
संजय गोस्वामी
अणुशक्तिनगर मुंबई,महाराष्ट्र
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