हमारे समाज में बेटियों को लेकर एक कड़वा सच हमेशा से मौजूद रहा है। जब एक बेटी जन्म लेती है,तो कई घरों में उसे खुशी के बजाय बोझ समझा जाता है। पर क्या यही बेटी,जिसे जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाता है,वही नहीं है जो आगे चलकर किसी की माँ बनती है,बहन बनती है और किसी घर को अपने हाथ की रोटियों से संजोती है? आज भी कई क्षेत्रों में भ्रूण परीक्षण के बाद लड़कियों को जन्म लेने ही नहीं दिया जाता। बेटा चाहिए की चाहत में,एक बेटी को जीवन का पहला ही अधिकार—जन्म लेने का अधिकार—छीन लिया जाता है। लेकिन समाज यह क्यों भूल जाता है कि वही बेटी एक दिन किसी घर की नींव बनती है,रिश्तों में मिठास घोलती है और अपने त्याग व ममता से एक परिवार को जोड़कर रखती है? भारत में एक सर्वे के अनुसार,हर साल लाखों कन्याओं को जन्म से पहले ही मार दिया जाता है। यह आंकड़ा केवल संख्या नहीं है,यह हमारे समाज की मानसिकता को दर्शाता है। खुद से पूछिए—क्या आप एक बेटी के बिना जीवन की कल्पना कर सकते हैं? घर में माँ का स्नेह,बहन की शरारतें,पत्नी का साथ और बेटी की मुस्कान—क्या ये सभी भावनाएं जीवन को सुंदर नहीं बनातीं? बेटियां हर रिश्ते को सजाती हैं,उन्हें जीवंत बनाती हैं। सोचिए,अगर ये बेटियां ही नहीं होंगी,तो समाज का ताना-बाना कैसे बुन पाएंगे?
बेटी बचाओ केवल नारा नहीं,जिम्मेदारी है…
सरकार द्वारा शुरू की गई योजनाएँ जैसे बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ सराहनीय हैं,लेकिन केवल योजनाओं से बदलाव नहीं आएगा। बदलाव तब आएगा जब समाज अपनी सोच बदलेगा,जब एक माँ-बाप बेटी के जन्म पर उतनी ही खुशी मनाएंगे जितनी बेटे के जन्म पर मनाते हैं।
साक्षी कुशवाहा
अंबिकापुर,सरगुजा(छत्तीसगढ़)
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