हमारे सोचने का तरीका और संगत हमारी व्यक्तित्व व आदतों को तय करते हैं। संगत भावनाओं, विचारों, अभिप्रायों, और अनुभवों का परिणाम होता है। जब वृद्ध का संगत करते है तो गम्भीरता का भाव वही बच्चों के संगत करते है तो हममे भी बचपना का भाव आ जाता है।जाहिर है वृंदावन में राधे राधे तो अयोध्या में जयश्री राम कहेंगें।
बावजूद दिखावे का जिंदगी असली लगने लगा है इसी को आधुनिक होना समझ रहे है। आभासी भ्रम के पीछे अन्धाधुध भाग रहे है शायद उसी में जीवन का आनंद होना समझ रहे है पर आनंद तो अनुभूति है केवल महसूस किया जा सकता है।लोग ब्रांडेड जीन्स महंगे परिधान धारण करने एवं फर्राटेदर अंगेजी बोलने वाले को आधुनिक होना मान बैठे है मेरे ख्याल से इसे खोखलापन कहेंगे। आधुनिक तो हमे विचार से होना है न कि कपड़े से जैसे दक्षिण भारतीय लोग पारम्परिक लिबास में रहते है पर देश दुनिया मे अपने सोच और प्रतिभा का लोहा मनवाते है मेरे ख्याल से आधुनिक महात्मा गांधी को भी बोला जा सकता है जो आजादी के पूर्व छुआछूत जैसे कुरुतियों को मिटाने के लिए पहल किये जो आज सार्थक होते दिख रहा है सोचिए जो पहल आज देख रहे है गांधी जी ने आजादी के पूर्व सोच रखा था कितने एडवांस व आधुनिक थे।
आज तो आधुनिक बनने के उदाहरण बदल गए है प्रीवेडिंग का नया कल्चर को ही ले लो लड़की झील किनारे गीली कपडे में कभी लड़के के बाहों में हाथ डाल एक दूसरे के प्यार में डूबे हुए दिखाये जाते हैं तो कभी सुनसान कभी सार्वजनिक रूप में केवल आडम्बर के लिए अपना निजी पल शेयर करते है पहले लोग मंदिरों में आशीर्वाद लेते थे खैर अब तो प्रीवेडिंग की फ़ोटो देख पिता भी भगवान को शायद बोले हम नही देख पाएंगे उठा ले रे बाबा वही कई ऐसे भी है जिसे बेटे हैंडसम डोले वाले हीरो नजर आते हैं मानो बॉलीवुड में एंट्री मिलनेवाला हो खैर मंदिरों में आशीर्वाद लेने का दौर नही रहा अब तो बस पोस्ट वेडिंग का काम प्रीवेडिंग मे हो रहा है फिर ऐसे में रिश्ता टूट जाये तो लड़की के पास कुछ बचा? असल मे रिश्ते रील में नही रियल लाइफ में बनते है।आपका अपना सोच व नजरिया हो सकता हैं। सच कहू तो अनपढ़ों ने ही संस्कृति को बचाये रखा है।कभी कभी पढ़े लिखे होना, अनपढ़ होना होता है उदाहरण से समझियेगा बारिश के कारण गड्ढे वाली सड़को में कीचड था सिमरन को स्कूल बस का इंतजार थी। बारिश के कारण लेट होने पर पति से कहा बच्चे को स्कूल छोड़ दो। पति ने कहा नया कार हैं कीचड़ हो जाएगा। उधर शांताबाई भी बेटी के स्कूल के लिए रिक्शा का राह देख रही थी। शायद रिक्शावाला भी सड़क की हालत के कारण नहीं आया समय को भांपते हुए शांताबाई ने ज्यादा इंतजार नहीं किया। बच्चे को लेकर कीचड़ से होकर चलती बनी सिमरन अभी भी बच्चों के साथ वही खड़ी है। कुल मिलाकर सिमरन के बच्चे स्कूल नही जा पाये आज का पढ़ाई छूट गया जबकि सिमरन उच्च शिक्षित थी अब बताओ तथाकथित ऐसे सोच ऐसे पढ़े लिखे होने का क्या मतलब जो केवल दिखावा हो व्यवहारिक न हो। जीवन मे शांताबाई की जरूरत है जो पढ़ी लिखी नही है तो क्या पर बच्चों की भविष्य की फिक्र तो करती है।केवल पढे लिखे होना पर्याप्त नही है । सोच व नजीरिया भी सही होना चाहिए तभी नजारे बदलेंगे।
त्रिभुवन लाल साहू
बोड़सरा जाँजगीर छत्तीसगढ़
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