क्या यह चुनाव समीप आते ही ग्रामीणों की पुछ परख में लगे नेताओं के लिये है नेताजी का बयान?
क्या यह नेताजी है नेताओं के लिए ही एक कटाक्ष,क्या सच मे चुनाव नजदीक आते ही बदल जाता है नेताओं का व्यवहार?
क्या सच मे चुनाव नजदीक आते ही ग्रामीणों की पूछपरख में निकल पड़ते हैं राजनीतिक दलों के नेता?
वैसे नेताजी का यह भी कहना ठीक है कि क्यों नहीं हमेशा जनता की नेता करते हैं पूछ परख
बैकुण्ठपुर 12 दिसम्बर 2022 (घटती-घटना)। एक नेताजी का सोशल मीडिया पोस्ट आजकल चर्चा का विषय बना हुआ है जिसमे नेताजी ने लिखा है या यह कहें कटाक्ष किया है कि आजकल ग्रामीणों की पूछ परख बढ़ गई है और काश ऐसा हमेशा होता। नेताजी ने शायद इसलिए ऐसा लिखा है क्योंकि आजकल सही मायने में ग्रामीण क्षेत्रों में नेताओं का दौरा तेजी से जारी है और लगातार सभी दलों के नेता ग्रामीणों से उनका हाल चाल पूछने घर घर पहुंच रहें हैं और उनकी समस्याओं से अवगत होकर उसके निराकरण का भरोसा जता रहें हैं। जिन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट डाला है उनका कहने का आशय शायद यह है कि हमेशा यदि इसी तरह नेता सक्रिय रहें तो शायद ही किसी ग्रामीण के पास कोई शिकायत रहे या कोई समस्या उसकी बची रहे जिसके कारण वह परेशान रहें। वैसे नेताजी की यह पोस्ट चुनाव समीप आने पर नेताओं के ग्रामीण क्षेत्रों में दौरे से जोड़कर देखी जा रही है और चुनाव समीप आते ही अक्सर ऐसा देखा जाता है जो हर चुनाव से पहले देखा जाता है।
चुनाव जैसे जैसे नजदीक आते जाते हैं वैसे वैसे नेताओं का संभावित प्रत्याशियों का ग्रामीणों से मिलने का सिलसिला जारी हो जाता है जो लगातार जारी रहता है जब तक कि चुनाव लड़ने वालों का नाम राजनीतिक दल तय नहीं कर देते या जबतक की उनकी दावेदारी मजबूत दिखती है वैसे इसमें से ही किसी एक को राजनीतिक दल दावेदार बनाते हैं और इन्हीं में से एक चुनाव जीतकर क्षेत्र की जनता का जनप्रतिनिधी बन जाता है लेकिन विडंबना जैसे ही वह चुनाव जीत जाता है उसे चार साल तक जनता की सुध नहीं रहती और वह अपनी ही धुन में अपने लिए काम करता रहता है और जैसे ही पांचवां साल चुनावी साल सामने दिखाई देता है वह सक्रिय नजर आता है और जनता के बीच जाकर हिमायती बनने का दावा करने लगता है,यह सभी नेताओं के लिए तो नहीं कहा जा सकता लेकिन कुछ हैं या ऐसे नेता चुने जाते रहें हैं जिनके लिए ऐसा कहा जा सकता है।
स्वयं राजनीति से जुड़े एक नेताजी ने एक पोस्ट सोशल मीडिया पर डालकर अन्य नेताओं के सामने एक प्रश्न खड़ा कर दिया है
अब स्वयं राजनीति से जुड़े एक नेताजी ने ऐसा पोस्ट सोशल मीडिया पर डालकर अन्य उन नेताओं के सामने एक प्रश्न खड़ा कर दिया है जो अभी लगातार ग्रामीणों से मिल रहे हैं और उनके सामने अपनापन जता रहें हैं। नेताजी ने साफ कहा है कि काश यह मेल मिलाप हमेशा जारी रहे जिससे ग्रामीणों को समस्या हो ही न कि उनसे चुनाव के ऐन समय मिलकर उसके निराकरण का दावा करना पड़े। नेताजी की बातों का अन्य नेताओं पर कितना असर पड़ने वाला है यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन नेताजी ने सच कहा है ऐसा लगता है।
क्या अधिकांश जनप्रतिनिधी अपनी ही समस्याओं में घिरे हैं?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता द्वारा जनता के लिए ही सरकार चुनी जाती है और जनता मतदान करने तक सर्वेसर्वा होती है नेताओं की भाग्यविधाता होती है लेकिन जैसे ही चुनाव संपन्न हो जाते हैं और नेताओं में से जनता अपना जनप्रतिनिधी बड़े विश्वास के साथ चुन लेती है वही जनप्रतिनिधी जब जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरते जनता मायूस हो जाती है जो आज के वर्तमान राजनीति में लगातार देखा जा रहा है। आज जनता के लिए जनता द्वारा चुनी हुई सरकार है ऐसा लगता नहीं है और न ही अधिकांश जनप्रतिनिधियों की कार्यप्रणाली ही ऐसा साबित करती है आजकल अधिकांश जनप्रतिनिधी अपनी ही समस्याओं में घिरे नजर आते हैं यहां तक ही अब किसी भी राजनीतिक दल के लिए कोई राज्य का चुनाव उस राज्य के जनता की भलाई के लिए नही लड़ा जाता बल्कि अन्य राज्यों में भी राजनीतिक दल की सरकार बन सके इसके लिए राजनीतिक दल अपनी सरकार जहां स्थापित हो चुकी है उन राज्यों के संसाधनों नेताओं का उपयोग कर प्रयास करती नजर आती हैं प्रायः अभी यही देखने को मिल रहा है। अन्य राज्यों में चुनाव की जिम्मेदारी सम्हालते सम्हालते अपने ही राज्य अपने विधानसभा की जनता से जनप्रतिनिधी दूर होते चले जा रहें हैं और उन्हें मौका मिलता भी है तो तब जब चुनाव नजदीक आ चुका होता है तब। अब नेताजी ने शायद यही सबकुक देखकर सोशल मीडिया पर अपना बयान दिया है और अपनी इक्षा जाहिर की है।
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