अम्बिकापुर,09 सितम्बर 2022(घटती-घटना)। विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस, 10 सितंबर को लेकर स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग सरगुजा के द्वारा बीते छह सितंबर से विविध आयोजन किए जा रहे हैं। इसी परिपेक्ष्य में प्रेस क्लब में पत्रकारों से चर्चा करते हुए चिकित्सा मनोविज्ञानी डॉ.सुमन कुमार ने बताया आत्महत्या की प्रवृत्ति में पाबंदी कैसे लगे इसकी जानकारी जगह-जगह कार्यक्रम आयोजन कर दी जा रही है। उन्होंने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक 90 प्रतिशत लोग अवसाद या डिप्रेशन के कारण आत्महत्या करते हैं। बिना डिप्रेशन के भी आत्महत्या की स्थिति बनती है। ऐसी परिस्थिति के कारक से लोगों को परिचित कराने का प्रयास किया जा रहा है। हेल्पलाइन नंबर की जानकारी दी जा रही है, जिस पर फोन करके आवश्यक प्रिकॉशन मानसिक अवसाद से ग्रसिहत लोग ले सकें। डॉ.सुमन ने ऐसे पीडि़तों की पहचान के लक्षण से भी अवगत कराया। उन्होंने बताया कि आत्महत्या की मंशा मन में लेकर चलने वाला गुमसुम रहता है। अपने परिवार, परिचित लोगों से मेल-मिलाप कम कर देता है। अंदर ही अंदर ऐसे लोग तनाव से घिरे रहते हैं। ऐसे लोगों को एकांकी नहीं छोडऩा चाहिए बल्कि इनके मन में बनी आत्मघाती प्रवृत्ति में बदलाव आए इसके लिए मनोरोग चिकित्सक के संपर्क में आना चाहिए। उन्होंने बताया कि अंबिकापुर के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में मनोरोग चिकित्सक से संपर्क कर लोग निश्शुल्क काउंसलिंग, इलाज की सुविधा का लाभ ले सकते हैं। ऐसे लोगों को साइकोथेरेपी की जरूरत होगी तो वह सुविधा भी दी जाएगी। मनोचिकित्सक डॉ.रितेश कुमार सिंह ने बताया कि डिप्रेशन से पीडि़त की शुरूआती दौर में ही पहचान हो जाए और उसे काउंसलिंग व इलाज का लाभ मिले तो उसे डिप्रेशन से उबारना आसान है। ऐसे व्यक्ति की जान बच सकती है। ऐसे लोग जिनके हाव-भाव, व्यवहार में बदलाव महसूस हो उन्हें उस स्थिति से उबारने का हर कोई प्रयास करे, मनोरोग चिकित्सक के संपर्क में आए तो आत्महत्या के दर में निश्चित रूप से गिरावट आएगी। ऐसे लोग धीरे-धीरे सीवियर डिप्रेशन की ओर बढ़ जाते हैं और मरने के तरीके सोचने के बाद खुद-ब-खुद आत्महत्या के कगार पर पहुंच जाते हैं। अगर कोई जहर सेवन करता है और इलाज के बाद स्वस्थ होकर घर चले जाता है, तो वह पूरी तरह स्वस्थ नहीं माना जा सकता। आगे चलकर उसके मन में ऐसी प्रवृत्ति नहीं आएगी, यह सोचना गलत है। शारीरिक रूप से स्वस्थ होने के बाद ऐसे लोगों का मानसिक रूप से स्वस्थ होना जरूरी है, नहीं तो उसमें दिमागी बदलाव आना संभव नहीं है। शासकीय शहरी स्वास्थ्य केंद्र नवापारा में सेवा दे रहे डॉ.रितेश कुमार सिंह ने बताया कि उनके पास ओपीडी में रोजाना 20 से 25 ऐसे मामले सरगुजा संभाग से सामने आते हैं, जो अधिकतर मानसिक अवसाद से घिरे रहते हैं। चाहकर भी वे खुशी का अनुभव नहीं कर पाते, मन में तरह-तरह के विकार लेकर ये पहुंचते हैं। इन्हें काउंसलिंग के साथ उपचार सुविधा दी जाती है, इसके बाद वे खुशहाल जीवन जी रहे हैं। मोबाइल में तरह-तरह के गेम का बच्चों में नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। डिप्रेशन का कारण अधिकांश बायोलॉजिकल, सोशल, परिवार होता है। माता-पिता के बीच के झगड़े बच्चों के मन-मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं।
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