- जनप्रतिनिधि बैठक में…अधिकारी नदारद! कोरिया जिला पंचायत में निंदा प्रस्ताव से प्रशासनिक जवाबदेही कठघरे में…
- क्या जिला पंचायत की सामान्य सभा अब अधिकारियों के लिए महज औपचारिकता? दर्जनभर अधिकारियों की गैरमौजूदगी पर निंदा प्रस्ताव
- सत्ता पक्ष के जिला पंचायत अध्यक्ष ने भी जताई नाराजगी,अधिकारियों की अनुपस्थिति पर निंदा प्रस्ताव
- गांवों के सवालों का जवाब कौन देगा? जिला पंचायत की सामान्य सभा में अधिकारी नदारद,जनप्रतिनिधियों का विरोध
- सूचना के बावजूद दर्जनभर जिला स्तरीय अधिकारी बैठक से रहे नदारद,निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने जताई नाराजगी
- सवाल—जब सामान्य सभा में ही अधिकारी नहीं पहुंचेंगे तो ग्रामीण विकास और जनसमस्याओं की समीक्षा कैसे होगी?
-रवि सिंह-
बैकुंठपुर,31 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिले में त्रिस्तरीय पंचायत राज व्यवस्था के तहत निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के बीच समन्वय को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं, जिला पंचायत की सामान्य सभा जैसी महत्वपूर्ण बैठक में जिला स्तरीय अधिकारियों की अनुपस्थिति ने पंचायत व्यवस्था की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक जवाबदेही को चर्चा के केंद्र में ला दिया है, 29 अक्टूबर 2026 को आयोजित सामान्य सभा की बैठक में अधिकांश विभागों के जिला प्रमुखों के उपस्थित नहीं होने पर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने कड़ी नाराजगी जताई और अनुपस्थित अधिकारियों के विरुद्ध निंदा प्रस्ताव पारित किया। यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जिला पंचायत की सामान्य सभा महज एक औपचारिक बैठक नहीं,बल्कि जिले के ग्रामीण विकास, शासकीय योजनाओं के क्रियान्वयन,विभागीय कामकाज की समीक्षा और आम जनता से जुड़ी समस्याओं को प्रशासन के सामने रखने का महत्वपूर्ण संस्थागत मंच है, ऐसे मंच पर यदि संबंधित विभागों के जिम्मेदार अधिकारी ही उपस्थित नहीं होंगे तो जनप्रतिनिधियों के सवालों का जवाब कौन देगा? योजनाओं की प्रगति की जानकारी कौन देगा? ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़ी शिकायतों और समस्याओं पर निर्णय की प्रक्रिया आगे कैसे बढ़ेगी? सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अधिकारियों के लिए जिला पंचायत की सामान्य सभा अब प्राथमिकता में नहीं रह गई है? क्या निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों की बैठक को प्रशासनिक स्तर पर सामान्य औपचारिकता मान लिया गया है? यदि ऐसा नहीं है तो सूचना और निर्धारित कार्यक्रम के बावजूद बड़ी संख्या में अधिकारियों की गैरमौजूदगी की वजह क्या रही? इन सवालों का जवाब जिला प्रशासन और संबंधित विभागों को देना चाहिए।
सत्ता पक्ष के अध्यक्ष और सदस्यों ने भी दर्ज कराया विरोध- इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जिला पंचायत में अध्यक्ष और कई सदस्य भाजपा समर्थित हैं, जिला पंचायत अध्यक्ष मोहित राम पैकरा, उपाध्यक्ष वंदना राजवाड़े तथा सदस्य राजेश साहू, गीता राजवाड़े, सुरेश सिंह और स्नेहलता उदय सहित निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की ओर से बैठक में अधिकारियों की अनुपस्थिति पर विरोध दर्ज कराया गया, सामान्य सभा में निंदा प्रस्ताव पारित होना इस बात का संकेत है कि अधिकारियों की गैरमौजूदगी को जनप्रतिनिधियों ने सामान्य घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया, यहां सवाल केवल किसी एक दल, सत्ता पक्ष या विपक्ष का नहीं है, पंचायत प्रतिनिधि चाहे जिस राजनीतिक विचारधारा से जुड़े हों,उनका निर्वाचन ग्रामीण जनता के बीच से होता है और उनकी जवाबदेही भी जनता के प्रति होती है, जब वे गांवों की समस्याएं लेकर जिला पंचायत की सामान्य सभा में पहुंचते हैं, तब उनसे यह अपेक्षा रहती है कि संबंधित विभाग के अधिकारी भी उपस्थित रहेंगे और समस्याओं पर तथ्यात्मक जानकारी देंगे, ऐसे में अधिकारियों की अनुपस्थिति जनप्रतिनिधियों के साथ-साथ उन ग्रामीणों की अपेक्षाओं को भी प्रभावित करती है,जिनकी समस्याएं बैठक में उठाई जानी थीं।
दर्जनभर अधिकारियों की गैरमौजूदगी,जवाबदेही किसकी?-29 अक्टूबर की बैठक में जिले के दर्जनभर जिला स्तरीय अधिकारियों सहित अधिकांश विभाग प्रमुखों के अनुपस्थित रहने की बात सामने आई है, यदि किसी अधिकारी को अपरिहार्य कारणों से बैठक में शामिल होना संभव नहीं था तो विभाग की ओर से अधिकृत प्रतिनिधि की उपस्थिति और आवश्यक विभागीय जानकारी उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा सकती थी, लेकिन जब बैठक में संबंधित विभागों की पर्याप्त भागीदारी ही नहीं होगी, तब जनप्रतिनिधियों की ओर से उठाए गए सवालों का समाधान कैसे होगा? यह भी महत्वपूर्ण है कि अधिकारियों की अनुपस्थिति के पीछे क्या कारण थे? क्या अधिकारियों को बैठक की सूचना समय पर नहीं मिली थी? क्या किसी विभागीय कार्यक्रम या प्रशासनिक व्यस्तता के कारण वे उपस्थित नहीं हो सके? क्या अनुपस्थित अधिकारियों ने पूर्व में इसकी सूचना दी थी या किसी प्रतिनिधि को भेजा था? इन तथ्यों का आधिकारिक पक्ष सामने आना जरूरी है, हालांकि, कारण चाहे जो भी रहे हों, जिला पंचायत की सामान्य सभा की उपयोगिता और उसमें विभागीय अधिकारियों की भागीदारी को लेकर उठे सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सत्ता पक्ष के कार्यकाल में ही विरोध की स्थिति,प्रशासन के लिए भी संकेत– इस घटनाक्रम का राजनीतिक और प्रशासनिक पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है, जिला पंचायत में भाजपा समर्थित अध्यक्ष और सदस्य होने के बावजूद अधिकारियों की अनुपस्थिति को लेकर निंदा प्रस्ताव पारित होना बताता है कि यह मामला केवल राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं है, निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की नाराजगी का केंद्र प्रशासनिक बैठकों में अधिकारियों की भागीदारी और पंचायत व्यवस्था के प्रति जवाबदेही है, जब सत्ता पक्ष से जुड़े जनप्रतिनिधि भी सामान्य सभा में अधिकारियों की गैरमौजूदगी पर विरोध दर्ज कराने को मजबूर हों, तो प्रशासन के लिए यह एक संस्थागत संकेत है कि पंचायत प्रतिनिधियों की बैठक को नियमित औपचारिकता समझकर नहीं लिया जा सकता, हालांकि, इस घटना के आधार पर अधिकारियों की मंशा या जानबूझकर उपेक्षा का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, लेकिन अनुपस्थिति के कारणों और उसके प्रभावों पर प्रशासनिक स्तर पर स्पष्टता आवश्यक है।
जनप्रतिनिधियों के सवालों का जवाब देना प्रशासनिक जिम्मेदारी का हिस्सा- लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिकाएं अलग-अलग जरूर हैं, लेकिन ग्रामीण विकास के लिए दोनों के बीच समन्वय अनिवार्य है, जनप्रतिनिधि जनता की समस्याएं और स्थानीय जरूरतें सामने रखते हैं,जबकि अधिकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और प्रशासनिक कार्रवाई के लिए जिम्मेदार होते हैं, दोनों में से किसी एक की भागीदारी कमजोर पड़ने पर विकास और जनसमस्याओं के निराकरण की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, जिला पंचायत की सामान्य सभा में अधिकारियों की उपस्थिति केवल जनप्रतिनिधियों को सम्मान देने का विषय नहीं है,बल्कि यह विभागीय जवाबदेही,पारदर्शिता और ग्रामीण जनता के हितों से जुड़ा प्रश्न है,बैठक में उठने वाले मुद्दे किसी व्यक्ति विशेष के नहीं, बल्कि उन गांवों और परिवारों के होते हैं जो बुनियादी सुविधाओं और सरकारी योजनाओं के लाभ के लिए प्रशासन की ओर देखते हैं, अब जिला प्रशासन के सामने चुनौती है कि वह इस निंदा प्रस्ताव को महज एक बैठक की कार्यवाही तक सीमित न रहने दे, अनुपस्थित अधिकारियों से कारण स्पष्ट कराए जाएं,विभागीय प्रतिनिधियों की जिम्मेदारी तय हो और सामान्य सभा के लिए ऐसी व्यवस्था बनाई जाए जिससे प्रत्येक विभाग की ओर से सक्षम अधिकारी अथवा अधिकृत प्रतिनिधि आवश्यक जानकारी के साथ उपस्थित रहें, कोरिया जिला पंचायत की 29 अक्टूबर की सामान्य सभा में पारित निंदा प्रस्ताव ने एक बुनियादी सवाल फिर सामने रख दिया है—जब ग्रामीण स्वशासन की सर्वोच्च जिला स्तरीय संस्था की बैठक में ही विभागीय अधिकारी उपस्थित नहीं होंगे,तो गांवों की समस्याओं पर जवाबदेही और समाधान की प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ेगी? अब देखना यह है कि प्रशासन इस विरोध को केवल कार्यवाही पुस्तिका में दर्ज करता है या पंचायत राज व्यवस्था की गरिमा और प्रभावशीलता बनाए रखने के लिए ठोस कदम भी उठाता है।
सामान्य सभा कोई औपचारिकता नहीं,ग्रामीण शासन का महत्वपूर्ण मंच-
त्रिस्तरीय पंचायत राज व्यवस्था का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण को मजबूत करना और स्थानीय जरूरतों के अनुसार विकास कार्यों की योजना तथा निगरानी में निर्वाचित प्रतिनिधियों की भागीदारी सुनिश्चित करना है,ग्राम पंचायत,जनपद पंचायत और जिला पंचायत इसी व्यवस्था की तीन महत्वपूर्ण इकाइयां हैं,जिला पंचायत इन इकाइयों के बीच समन्वय और जिले के ग्रामीण विकास से जुड़े विषयों पर चर्चा का महत्वपूर्ण मंच है,जिला पंचायत की सामान्य सभा में शिक्षा,स्वास्थ्य,कृषि,पेयजल,महिला एवं बाल विकास,पंचायत एवं ग्रामीण विकास,लोक निर्माण और अन्य विभागों से जुड़े विषयों पर समीक्षा की जाती है, ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों की स्थिति,स्वास्थ्य केंद्रों में सुविधाएं,पेयजल संकट,सड़क निर्माण, आवास योजनाओं का क्रियान्वयन,कृषि से जुड़ी समस्याएं और अन्य जनहित के मुद्दे इसी तरह की बैठकों में उठाए जा सकते हैं,इस बैठक में जिला पंचायत अध्यक्ष,उपाध्यक्ष और सदस्य अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याएं रखते हैं,संबंधित विभागों से योजनाओं की प्रगति, बजट के उपयोग, लंबित कार्यों और शिकायतों के निराकरण की जानकारी मांगी जाती है,इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य केवल चर्चा करना नहीं,बल्कि प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही और कार्यवाही की दिशा तय करना भी है,ऐसे में सामान्य सभा में अधिकारियों की अनुपस्थिति का सीधा असर बैठक की उपयोगिता पर पड़ सकता है,जनप्रतिनिधि सवाल उठाएं और जवाब देने के लिए संबंधित अधिकारी ही मौजूद न हों, तो समीक्षा की प्रक्रिया अधूरी रह जाती है,फिर बैठक में उठाए गए मुद्दों का समाधान किस स्तर पर और किस समय होगा,यह भी स्पष्ट नहीं हो पाता।
निंदा प्रस्ताव के बाद क्या होगा? कागज पर विरोध या व्यवस्था में बदलाव?
जनप्रतिनिधियों ने निंदा प्रस्ताव पारित कर अपनी नाराजगी दर्ज करा दी है,लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल इसके आगे की कार्रवाई को लेकर है,क्या यह प्रस्ताव केवल बैठक की कार्यवाही में दर्ज होकर रह जाएगा या जिला प्रशासन इस पर गंभीरता से संज्ञान लेकर भविष्य के लिए कोई ठोस व्यवस्था बनाएगा? निंदा प्रस्ताव अपने आप में अधिकारियों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई नहीं है,लेकिन यह निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की औपचारिक असहमति और संस्थागत नाराजगी को सामने लाता है,इसकी वास्तविक उपयोगिता तभी होगी जब अनुपस्थिति के कारणों की समीक्षा हो, संबंधित अधिकारियों से स्पष्टीकरण लिया जाए और आगामी बैठकों में उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए,यदि हर बार सामान्य सभा में अधिकारियों की अनुपस्थिति पर केवल नाराजगी दर्ज होती रहे और उसके बाद कोई सुधारात्मक कदम नहीं उठे,तो ऐसी बैठकों की गंभीरता और प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है, निंदा प्रस्ताव को केवल एक कागजी कार्रवाई मानकर छोड़ देना उस मूल समस्या का समाधान नहीं होगा,जिसके कारण यह प्रस्ताव पारित करने की नौबत आई।
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