



- मृत किसान के नाम पर कर्ज, शिकायतकर्ता परेशान…आखिर किसके संरक्षण में फाइल खामोश?
- मौत के बाद केसीसी ऋण का मामला! चार खबरों के बाद भी जांच और कार्रवाई पर सन्नाटा
- मृत किसान के नाम पर केसीसी ऋण का मामला,शिकायत के बाद दो बार रकम जमा—अब हस्ताक्षरों पर सवाल,कार्रवाई का इंतजार
- मृत किसान के नाम पर ऋण, दो बार रकम जमा—अब शिकायत वापसी के हस्ताक्षर पर संग्राम!
- चार खबरें बेअसर? मृत किसान के केसीसी ऋण मामले में कार्रवाई अब भी सवालों में!
- मृत्यु के बाद ऋण स्वीकृति, खाते से रकम निकासी और शिकायत के बाद दोबारा भुगतान का आरोप
- अब शिकायत वापसी के पत्र पर हस्ताक्षर को लेकर विवाद, आखिर जांच कहां अटकी?
- पहले ऋण का विवाद,फिर रकम जमा,चार खबरें छपीं,जिम्मेदारों की चुप्पी नहीं टूटी!
- ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर/ सोनपुर,31 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)। एक किसान की मृत्यु के बाद उसके नाम पर ्यष्टष्ट ऋण स्वीकृत होने का आरोप,बैंक खाते से रकम निकाले जाने के सवाल, शिकायत के बाद लाखों रुपये जमा होने का घटनाक्रम और फिर शिकायत वापस लेने के पत्र पर कथित हस्ताक्षर का विवाद—मामला एक नहीं,कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। हैरानी यह है कि दैनिक घटती-घटना में इस प्रकरण को लेकर चार बार खबर प्रकाशित होने के बावजूद अब तक जांच और कार्रवाई की स्थिति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं हो सकी है,आखिर सहकारिता विभाग किसका इंतजार कर रहा है? दस्तावेजों में दर्ज तारीखों और रकम का मिलान करने में इतना वक्त क्यों लग रहा है? और यदि शिकायत में लगाए गए आरोप गलत हैं,तो विभाग जांच के निष्कर्ष सामने क्यों नहीं रखता?
सोनपुर स्थित आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित, पंजीयन क्रमांक 580 से जुड़ा यह मामला केवल एक ऋण खाते का विवाद नहीं रह गया है, शिकायतकर्ता देवी प्रसाद ने अपने दिवंगत पिता हरिप्रसाद के नाम पर मृत्यु के बाद ्यष्टष्ट ऋण स्वीकृत किए जाने, खाते से राशि निकाले जाने तथा शिकायत के बाद जमा की गई रकम और शिकायत वापसी के पत्र पर हस्ताक्षर को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं,इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और संबंधित बैंक रिकॉर्ड का सत्यापन जरूरी है, अभी इन आरोपों को जांच में प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता,लेकिन उनकी गंभीरता ऐसी है कि जिम्मेदार विभागों की चुप्पी अपने आप में जवाबदेही का सवाल बन गई है।
10 मई 2021 को मृत्यु,फिर जून में ऋण स्वीकृति कैसे?
शिकायत में दर्ज विवरण के अनुसार हरिप्रसाद की मृत्यु 10 मई 2021 को हुई थी,इसके बाद भी उनके नाम पर ्यष्टष्ट ऋण स्वीकृत होने का आरोप लगाया गया है, उपलब्ध विवरण में 1 जून 2021 को 75,000 और 11 जून 2021 को 54,000 की ऋण स्वीकृति दर्ज होने की बात कही गई है, दोनों राशियों का कुल योग 1,29,000 है, यहीं से मामले का सबसे गंभीर सवाल सामने आता है—यदि खाताधारक की मृत्यु 10 मई को हो चुकी थी,तो जून में ऋण स्वीकृति की प्रक्रिया किस आधार पर पूरी हुई? आवेदन किसने दिया? आवश्यक दस्तावेज किसने प्रस्तुत किए? ऋण स्वीकृति के समय सत्यापन किस कर्मचारी या अधिकारी ने किया? क्या मृत्यु की जानकारी संबंधित समिति और बैंक को थी? और यदि थी,तो उसके बाद ऋण स्वीकृत करने की प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ी? ऋण आवेदन, स्वीकृति आदेश, संबंधित रजिस्टर, बैंक खाते का विवरण, भुगतान वाउचर और उपलब्ध हस्ताक्षरों की जांच से ही स्थिति स्पष्ट हो सकती है पर जाँच कब होगी?
मृत्यु के बाद खाते से निकासी का भी सवाल
शिकायत में प्रस्तुत विवरण में 25 मई 2021 को 17,000 की निकासी का उल्लेख है, इसके बाद 3 जून को 49,000, 4 जून को 26,000, 17 जून को 49,000,21 जून को 5,000 और 23 अगस्त 2021 को 18,500 निकाले जाने की प्रविष्टियां भी बताई गई हैं, इन प्रविष्टियों को बैंक के मूल रिकॉर्ड से सत्यापित किया जाना आवश्यक है,यह भी जांच का विषय है कि प्रत्येक निकासी किस माध्यम से हुई,भुगतान किसे किया गया, संबंधित वाउचर पर किसके हस्ताक्षर हैं और रकम निकालने वाले व्यक्ति की पहचान कैसे दर्ज की गई? लेकिन खाताधारक की मृत्यु और बाद की वित्तीय गतिविधियों के बीच संबंध की जांच किए बिना मामले को सामान्य ऋण विवाद मानकर छोड़ना भी उचित नहीं होगा।
2024 में बकाया नोटिस, शिकायत के बाद 1.29 लाख जमा
शिकायतकर्ता के अनुसार वर्ष 2024 में उन्हें 1,72,860 के बकाया ऋण का नोटिस मिला, उनका कहना है कि इसी दौरान उन्हें अपने दिवंगत पिता के नाम पर ऋण होने की जानकारी मिली और उन्होंने 22 जुलाई 2024 को जनदर्शन में शिकायत की, शिकायत में आगे आरोप है कि 26 जुलाई 2024 को समिति के कर्मचारी जितवेश श्रीवास्तव उन्हें बैंक ले गए,जहां 1,29,000 जमा किए गए, इस घटनाक्रम के बाद शिकायत वापस लिए जाने की बात भी सामने आई, अब सवाल यह है कि यदि ऋण की स्वीकृति और निकासी पूरी तरह नियमानुसार हुई थी, तो शिकायत के बाद इतनी बड़ी राशि जमा करने की परिस्थितियां क्या थीं? यह भुगतान किस मद में दर्ज किया गया? किसने जमा किया और किसके निर्देश पर? क्या राशि जमा होने के बाद ऋण खाते का विधिवत मिलान हुआ? रकम जमा होना अपने आप में किसी आरोप की पुष्टि नहीं है लेकिन शिकायत,भुगतान और कथित शिकायत-वापसी के घटनाक्रम का आपसी संबंध जांच के दायरे में आना चाहिए।
2026 में फिर बकाया नोटिस फिर 69,175 जमा
मामला यहीं समाप्त नहीं हुआ, शिकायतकर्ता के अनुसार 7 अक्टूबर 2026 को समिति की ओर से 64,512 बकाया होने का नोटिस दिया गया,उनका आरोप है कि अक्टूबर में दोबारा शिकायत करने के बाद 17 अक्टूबर 2026 को 69,175 जमा कराए गए,शिकायतकर्ता का कहना है कि यह राशि उनकी जानकारी और सहमति के बिना जमा की गई, इस घटनाक्रम से एक और महत्वपूर्ण प्रश्न पैदा होता है—यदि 2024 में 1,29,000 जमा हो चुके थे, तो 2026 में फिर 64,512 का बकाया किस गणना के आधार पर निकाला गया? जमा हुई राशि का समायोजन किस खाते में किया गया? ब्याज और अन्य मदों का हिसाब किस नियम के तहत तैयार हुआ? और 17 अक्टूबर 2026 को ?69,175 जमा करने का निर्णय किसने लिया? इन सवालों का जवाब ऋण खाते के पूर्ण विवरण, लेजर, बैंक स्टेटमेंट और जमा वाउचर से मिलना चाहिए, विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि रकम जमा होने के बाद बकाया राशि का निर्धारण कैसे किया गया और संबंधित भुगतान के लिए किसकी सहमति या अनुमति दर्ज है।
शिकायत वापसी के पत्र पर हस्ताक्षर का विवाद
शिकायतकर्ता देवी प्रसाद ने 26 अक्टूबर 2026 को कलेक्टर सूरजपुर को दिए आवेदन में आरोप लगाया कि 21 अक्टूबर 2026 को उनकी ओर से शिकायत वापसी का पत्र भेजा गया, जबकि उस पर किए गए हस्ताक्षर उनके नहीं हैं, उन्होंने जमा वाउचर और शिकायत वापसी के पत्र पर हस्ताक्षर की प्रामाणिकता पर भी सवाल उठाए हैं, शिकायतकर्ता का आरोप है कि उनके हस्ताक्षर का इस्तेमाल उनकी सहमति के बिना किया गया,यह आरोप गंभीर है, लेकिन इसका निष्कर्ष केवल देखने भर से नहीं निकाला जा सकता,मूल शिकायत,जमा वाउचर और कथित शिकायत-वापसी पत्र को सुरक्षित रखकर स्वतंत्र हस्तलेखन परीक्षण कराया जाना चाहिए, संबंधित बैंक और समिति के रिकॉर्ड से यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि दस्तावेज किसने प्रस्तुत किए,किसने स्वीकार किए और शिकायत वापस लेने की प्रक्रिया किसके सामने पूरी हुई,यदि हस्ताक्षर वास्तविक पाए जाते हैं, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि शिकायतकर्ता ने किस परिस्थिति में पत्र दिया, यदि हस्ताक्षर उनके नहीं पाए जाते, तो यह जांचना आवश्यक होगा कि दस्तावेज किसने तैयार किया और उसे कार्यालयी रिकॉर्ड में किस आधार पर स्वीकार किया गया, दोनों स्थितियों में दस्तावेजी सत्यापन जरूरी है।
शिकायतकर्ता ने उत्पीड़न का भी लगाया आरोप
शिकायतकर्ता का आरोप है कि मामले को लेकर उन पर दबाव बनाया गया और उन्हें इस कदर परेशान किया गया कि उन्हें घर छोड़कर जाना पड़ा,इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है,संबंधित शिकायतों,पुलिस रिकॉर्ड, उपलब्ध गवाहों और अन्य साक्ष्यों के आधार पर इसकी जांच होनी चाहिए, यदि किसी शिकायतकर्ता को अपनी शिकायत पर कार्रवाई कराने के बजाय दबाव या भय का सामना करना पड़ रहा है, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है,वहीं,आरोपों की निष्पक्ष जांच और संबंधित पक्षों का जवाब लेना भी उतना ही जरूरी है, प्रशासन को शिकायतकर्ता की सुरक्षा संबंधी चिंता हो तो उसे भी गंभीरता से देखना चाहिए।
चार खबरें प्रकाशित,फि र भी कार्रवाई का स्पष्ट विवरण कहां?
इस प्रकरण को लेकर दैनिक घटती-घटना में 17 अक्टूबर, 19 अक्टूबर, 26 अक्टूबर और 31 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित समाचारों में अलग-अलग पहलुओं को सामने लाया गया,खबरों में मृत्यु के बाद ऋ ण स्वीकृति,खाते से निकासी, बकाया राशि, शिकायत के बाद भुगतान और शिकायत वापसी के कथित दस्तावेज पर सवाल उठाए गए, इसके बावजूद अब तक उपलब्ध जानकारी में ऐसी कोई स्पष्ट कार्रवाई रिपोर्ट सामने नहीं आई है,जिससे पता चले कि विभाग ने शिकायत पर क्या जांच की,किन दस्तावेजों का परीक्षण किया और क्या निष्कर्ष निकाला,यदि जांच शुरू हो चुकी है, तो उसकी वर्तमान स्थिति बताई जानी चाहिए, यदि जांच शुरू नहीं हुई, तो इसकी वजह स्पष्ट होनी चाहिए,और यदि शिकायत निराधार पाई गई है,तो जांच के निष्कर्ष और आधार सार्वजनिक किए जाने चाहिए,समाचार प्रकाशित होने मात्र से आरोप साबित नहीं होते है,लेकिन बार-बार सामने आ रहे दस्तावेजी सवालों की अनदेखी भी नहीं की जा सकती,विभाग का दायित्व है कि वह आरोपों की निष्पक्ष जांच कर तथ्य सामने रखे—न किसी को पहले से दोषी ठहराए,न शिकायत को बिना परीक्षण के खारिज करे।
कलेक्टर और उप पंजीयक से सीधे सवाल, कलेक्टर सूरजपुर और उप पंजीयक सहकारी संस्थाएं के सामने अब कुछ सीधे सवाल हैं…
- क्या 26 अक्टूबर 2026 के शिकायत आवेदन पर विधिवत जांच दर्ज की गई है? यदि हां, तो जांच अधिकारी कौन है?
- क्या हरिप्रसाद की मृत्यु प्रमाणित करने वाले दस्तावेज का ऋण स्वीकृति की तारीखों से मिलान किया गया?
- क्या जून और अगस्त 2021 की बताई गई बैंक निकासी का मूल रिकॉर्ड मंगाया गया?
- वर्ष 2024 में ?1.29 लाख जमा होने और अक्टूबर 2026 में ?69,175 जमा होने के कारणों की जांच हुई?
- शिकायत वापसी के पत्र और जमा वाउचर पर हस्ताक्षरों का स्वतंत्र परीक्षण कराने का निर्णय लिया गया है या नहीं?
- क्या शिकायतकर्ता के उत्पीड़न और दबाव संबंधी आरोपों की भी जांच की जा रही है?
- अब तक की जांच में क्या तथ्य सामने आए हैं और अगली कार्रवाई की समय-सीमा क्या है?
इन सवालों का जवाब देना किसी अधिकारी पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन और सहकारी ऋण व्यवस्था से जुड़े मामले में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है।
सोनपुर सहकारी समिति से जुड़े इस मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकलेगा, लेकिन मृत्यु की तारीख, ऋण स्वीकृति की तारीखें, बैंक निकासी की प्रविष्टियां, बकाया नोटिस और शिकायत के बाद हुए भुगतान—इन सबका दस्तावेजी मिलान कराना प्रशासन की जिम्मेदारी है, अब जरूरत केवल एक और आवेदन प्राप्त कर फाइल में रख देने की नहीं, बल्कि यह बताने की है कि शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई। यदि आरोपों में दम नहीं है, तो जांच रिपोर्ट सामने आए, यदि रिकॉर्ड में अनियमितता मिलती है, तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय हो, और यदि हस्ताक्षर संबंधी विवाद है, तो उसका निष्पक्ष परीक्षण कराया जाए, तीन बार खबर प्रकाशित होने के बाद भी सवाल कायम हैं, अब देखना यह है कि सहकारिता विभाग इन सवालों का जवाब दस्तावेजों से देता है या मामला फिर नोटिस, आवेदन और आश्वासन के बीच उलझा रहता है।
अब कागजी औपचारिकता नहीं, तथ्यात्मक जवाब चाहिए…
सोनपुर सहकारी समिति से जुड़े इस मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकलेगा, लेकिन मृत्यु की तारीख,ऋ ण स्वीकृति की तारीखें, बैंक निकासी की प्रविष्टियां,बकाया नोटिस और शिकायत के बाद हुए भुगतान—इन सबका दस्तावेजी मिलान कराना प्रशासन की जिम्मेदारी है,अब जरूरत केवल एक और आवेदन प्राप्त कर फाइल में रख देने की नहीं,बल्कि यह बताने की है कि शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई। यदि आरोपों में दम नहीं है,तो जांच रिपोर्ट सामने आए,यदि रिकॉर्ड में अनियमितता मिलती है,तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय हो, और यदि हस्ताक्षर संबंधी विवाद है,तो उसका निष्पक्ष परीक्षण कराया जाए, तीन बार खबर प्रकाशित होने के बाद भी सवाल कायम हैं,अब देखना यह है कि सहकारिता विभाग इन सवालों का जवाब दस्तावेजों से देता है या मामला फिर नोटिस,आवेदन और आश्वासन के बीच उलझा रहता है।
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