


- समिति आपकी,फैसला हमारा! श्यामलाल सिंह के ‘दखल’ से सहकारिता में नियम बेबस?
- बैंक संभालें या समितियां? श्यामलाल सिंह के बढ़ते दखल पर उठे गंभीर सवाल
- एक तरफ करोड़ों के लेन-देन पर सवाल, दूसरी तरफ विवादित नियुक्ति की पैरवी!
- समिति में किसे रखना है, किसे हटाना है…क्या अब यह भी तय करेंगे शाखा प्रबंधक?
- शिवप्रसादनगर से सोनपुर तक श्यामलाल सिंह की ‘मेहरबानी’ पर सवाल…
- खाते का पैसा हो या कर्मचारी की कुर्सी, श्यामलाल सिंह का हर जगह दखल?
- सात महीने पुराने आदेश पर अचानक अमल, विवेक की वापसी में किसकी भूमिका?
- एक दिन का कार्यवाहक सचिव,नया रजिस्टर और विवादित बहाली-सोनपुर में क्या खेल?
- ‘कुर्सी’ भी हमारी,फैसला भी हमारा? सोनपुर में बहाली पर बवाल बैंक की निगरानी से समिति
- की नियुक्ति तक…श्यामलाल सिंह पर क्यों उठ रहे सवाल?
- विवेक की बहाली से शिवप्रसादनगर के भुगतान तक…श्यामलाल सिंह की भूमिका जांच के घेरे में…
-ओंकार पाण्डेय-
भैयाथान/सूरजपुर,10 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। जिला सहकारी केंद्रीय बैंक की भैयाथान शाखा के शाखा प्रबंधक श्यामलाल सिंह इन दिनों बैंकिंग कामकाज से अधिक समितियों से जुड़े विवादों को लेकर चर्चा में हैं,उनके अधीन आने वाली समितियों में वित्तीय लेनदेन,बचत खातों से भुगतान,कर्मचारियों की नियुक्ति और हटाए गए कर्मचारियों को दोबारा काम पर रखने की प्रक्रिया को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं, आरोप है कि शाखा प्रबंधक की भूमिका केवल बैंकिंग निगरानी तक सीमित रहने के बजाय समितियों के प्रशासनिक निर्णयों तक पहुंचती दिखाई दे रही है। मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि एक ओर शिवप्रसादनगर समिति के बचत खाते से बड़ी राशि के भुगतान और खर्च को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं,वहीं दूसरी ओर सोनपुर समिति में विवेक कुमार चौरसिया को पुनः कार्य पर रखने की प्रक्रिया पर बेरोजगार युवाओं और शिकायतकर्ताओं ने आपत्ति दर्ज कराई है। उपलब्ध शिकायत पत्र में नियुक्ति के विज्ञापन,आवेदन,चयन प्रक्रिया, पूर्व नियुक्ति संबंधी दस्तावेज और सक्षम निकाय की स्वीकृति सहित कई बिंदुओं की जांच की मांग की गई है,इन दोनों घटनाओं को एक साथ देखने पर सवाल यह उठता है कि क्या शाखा प्रबंधक का काम समितियों के बैंक खाते की वित्तीय निगरानी तक है,या फिर समिति में कौन रहेगा,किसे कार्य पर रखा जाएगा और किसे भुगतान किया जाएगा…इन फैसलों में भी उनकी निर्णायक भूमिका है?
शिवप्रसादनगर : खाते में पैसा आया तो खर्च का रास्ता भी खुल गया?- शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र के खाते से बड़ी राशि खर्च किए जाने का मामला पहले से सवालों में है,उपलब्ध जानकारी के अनुसार नवंबर 2025 से खाते के स्टेटमेंट में लगातार ऐसे लेन-देन दिखाई देने की बात कही जा रही है, जिनका कुल खर्च लगभग 70 लाख रुपये से अधिक बताया जा रहा है,वहीं पूर्व में यह सवाल उठाया गया था कि यदि धान खरीदी की कुल मात्रा लगभग एक लाख क्विंटल रही और हमाली की राशि किसानों को मिलने वाली थी, तो समिति के खाते से इतनी बड़ी राशि आखिर किस मद में खर्च हुई? यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि खाते से राशि निकलना अपने आप में भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं है,लेकिन यदि निकासी बड़ी है और उसके सामने वास्तविक खर्च,बिल,वाउचर,स्वीकृति,मजदूरी भुगतान अथवा अन्य वैध मद स्पष्ट नहीं हैं,तो उसका ऑडिट और जांच होना जरूरी है,सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि बैंक खाते से राशि निकलते समय क्या बैंक ने भुगतान के दस्तावेजों की वैधता और सक्षम स्वीकृति की जांच की? यदि भुगतान नियमों के अनुरूप था तो संबंधित बिल-वाउचर और स्वीकृति रिकॉर्ड सामने आने चाहिए,यदि भुगतान नियमों के विरुद्ध था तो बैंक स्तर पर उसे रोकने अथवा आपत्ति दर्ज करने की प्रक्रिया क्या अपनाई गई…यह भी जांच का विषय है।
हमाली का पैसा किसान दे रहा,फिर समिति के खाते में खर्च किस बात का?- धान खरीदी केंद्रों पर हमाली और श्रम से जुड़े भुगतान को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं,आरोप है कि किसानों से धान की हमाली का भुगतान स्वयं कराया जाता रहा है,जबकि दूसरी ओर समितियों के खाते में हमाली अथवा अन्य मदों के नाम पर राशि आती और खर्च दिखाई जाती है,यदि वास्तव में मजदूरों को भुगतान किसान स्वयं कर रहे थे,तो समिति के खाते से संबंधित मद में निकाली गई राशि का वास्तविक उपयोग क्या हुआ? क्या मजदूरों को दोहरा भुगतान हुआ? क्या भुगतान उन्हीं मजदूरों को किया गया जिनका नाम रजिस्टर में दर्ज है? क्या मजदूरों की संख्या और धान की मात्रा के अनुपात में भुगतान उचित है? क्या भुगतान की रसीदें और हस्ताक्षर उपलब्ध हैं? और सबसे अहम…क्या बैंक ने इन दस्तावेजों का परीक्षण किया? इन सवालों के जवाब केवल बैंक स्टेटमेंट से नहीं मिलेंगे,इसके लिए समिति का कैशबुक,लेजर, वाउचर,मजदूरी रजिस्टर,धान खरीदी का रिकॉर्ड और बैंक स्टेटमेंट एक साथ मिलाना होगा।
‘पैसा समिति का,नजर बैंक की’…फिर जवाबदेही किसकी?-सहकारी समितियों के बचत खाते में बड़ी रकम का लेन-देन होता है,ऐसे में बैंक शाखा के पास खातों की गतिविधियों की जानकारी रहती है,समिति कितनी राशि निकाल रही है,किस प्रकार के भुगतान हो रहे हैं और किन दस्तावेजों के आधार पर भुगतान हो रहा है…यह सब बैंकिंग प्रक्रिया का हिस्सा है,यही वजह है कि यदि किसी समिति के खाते से असामान्य रूप से बड़ी रकम निकलती है तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि क्या बैंक शाखा ने उसे सामान्य लेन-देन माना या कोई विशेष आपत्ति दर्ज की? यदि भुगतान नियमों के अनुसार थे तो शाखा प्रबंधक को दस्तावेज दिखाने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए,लेकिन यदि दस्तावेजों में कमी थी और फिर भी भुगतान होते रहे, तो वित्तीय निगरानी की जिम्मेदारी पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सोनपुर में विवेक चौरसिया की वापसी…यहां मामला और पेचीदा-सोनपुर समिति में विवेक कुमार चौरसिया को पुनः कार्य पर रखने की प्रक्रिया ने विवाद को और गंभीर बना दिया है, 17 अगस्त 2026 को कलेक्टर के समक्ष प्रस्तुत शिकायत में कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं,शिकायत में कहा गया है कि समिति से संबंधित उच्च कार्यालय द्वारा लिपिक सह कंप्यूटर ऑपरेटर पद पर नियुक्ति का विज्ञापन जारी नहीं किया गया,समिति कार्यक्षेत्र के किसी अभ्यर्थी से आवेदन नहीं लिया गया और बाहरी व्यक्ति को नियुक्त किए जाने पर आपत्ति है, शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि समिति के अधिकृत अधिकारी/शाखा प्रबंधक श्यामलाल सिंह द्वारा विवेक कुमार चौरसिया को लेकर सात माह पुराने आदेश का हवाला देते हुए 7 अगस्त 2026 को संचालक मंडल की बैठक कर उन्हें पुनः कार्य में रखने की कार्रवाई की गई, यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है…यदि सात माह पुराने आदेश पर कार्रवाई करनी थी तो सात महीने तक वह आदेश लागू क्यों नहीं हुआ? और यदि आदेश का पालन नहीं हुआ था तो उस अवधि में उच्च कार्यालय से नया निर्देश क्यों नहीं लिया गया?
एक दिन का कार्यवाहक सचिव और फिर बड़ा फैसला!- शिकायतकर्ता का आरोप है कि विवेक चौरसिया को पुनः कार्य पर रखने की कार्रवाई के लिए एक ऐसे व्यक्ति को एक दिन के लिए कार्यवाहक सचिव बनाया गया, जिसकी अपनी नियुक्ति और भूमिका को लेकर भी विवाद बताया जा रहा है,यदि यह तथ्य रिकॉर्ड से प्रमाणित होता है तो यह जांच का अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु होगा कि कार्यवाहक सचिव की नियुक्ति कब हुई,कितने समय के लिए हुई,उसे किस आदेश से अधिकार मिला और क्या उसी अधिकार के आधार पर विवेक चौरसिया की पुनर्नियुक्ति संबंधी कार्यवाही की गई? क्योंकि किसी व्यक्ति को सिर्फ एक दिन के लिए कार्यवाहक सचिव बनाकर उसी दिन संवेदनशील प्रशासनिक फैसला करा देना सामान्य प्रक्रिया है या विशेष परिस्थिति—इसका जवाब समिति के रिकॉर्ड से ही मिलना चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल…पुराना रजिस्टर कहां गया?- शिकायत में एक और महत्वपूर्ण आरोप कार्यवाही रजिस्टर को लेकर है, आरोप है कि समिति के पास पहले से कार्यवाही रजिस्टर मौजूद होने के बावजूद नई कार्यवाही के लिए नया रजिस्टर तैयार किया गया,यदि ऐसा हुआ है तो सवाल सीधा है…पुराना रजिस्टर किसके पास था? उसमें क्या दर्ज था? नई कार्यवाही पुराने रजिस्टर में क्यों नहीं की गई? नया रजिस्टर किसके आदेश से खोला गया? किसी समिति के संचालक मंडल की कार्यवाही रजिस्टर महज सामान्य कॉपी नहीं होती,उसमें समिति के महत्वपूर्ण निर्णय दर्ज होते हैं, इसलिए किसी पुराने रजिस्टर को छोड़कर नया रजिस्टर खोलने की स्थिति में उसका कारण और अनुमति रिकॉर्ड में होना चाहिए,यही वह बिंदु है जहां ‘जल्दी में हुई कार्रवाई’ और ‘जानबूझकर की गई प्रक्रिया’ के बीच अंतर जांच से ही सामने आएगा।
नियुक्ति का मूल दस्तावेज कहां है?- विवेक चौरसिया की नियुक्ति को लेकर शिकायत में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि यदि उनकी मूल नियुक्ति वैधानिक थी तो…नियुक्ति आदेश कहां है? विज्ञापन कहां है? आवेदन कहां हैं? चयन प्रक्रिया कहां है? चयन समिति की कार्यवाही कहां है? समिति के सक्षम निकाय की स्वीकृति कहां है? और यदि ये दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं तो फिर उन्हें कर्मचारी मानकर पुनः कार्य पर रखने का आधार क्या था? शिकायत पत्र में इन्हीं दस्तावेजों के परीक्षण और सत्यापन की मांग की गई है।
सात महीने पुराना आदेश अचानक ‘जिंदा’ कैसे हो गया?-पूरे मामले का सबसे दिलचस्प पहलू सात महीने पुराने आदेश को लेकर है,शिकायतकर्ता का कहना है कि उच्च कार्यालय का आदेश पहले ही जारी हो चुका था, लेकिन उस पर तत्काल कार्रवाई नहीं हुई, बाद में जब श्यामलाल सिंह को शाखा प्रबंधक के साथ प्राधिकृत अधिकारी का प्रभार मिला,तब उसी पुराने आदेश के आधार पर विवेक चौरसिया को पुनः कार्य पर रखने की कार्रवाई हुई,यदि यह क्रम सही है तो जांच का सवाल केवल यह नहीं है कि आदेश क्या था,बल्कि यह भी है कि उस आदेश का पालन सात महीने तक क्यों नहीं हुआ और फिर प्राधिकृत अधिकारी बदलने के बाद उसी आदेश को अचानक क्यों लागू किया गया? क्या इस बीच किसी अधिकारी ने आदेश पर अमल रोक रखा था? क्या कोई जवाब/ स्पष्टी करण मांगा गया था? क्या उच्च कार्यालय को इसकी जानकारी दी गई? क्या बाद में नई परिस्थिति में आदेश लागू करने की अनुमति ली गई? इन सवालों के जवाब बिना पूरी फाइल देखे नहीं दिए जा सकते।
अपने ही हाथ में चाबी,अपने ही हाथ में ताला’ वाली स्थिति?-शिकायतों और सामने आए घटनाक्रम को लेकर सबसे बड़ा संस्थागत सवाल यही है कि यदि शाखा प्रबंधक ही बैंकिंग निगरानी से जुड़े अधिकारी हैं और किसी परिस्थिति में वही समिति के प्राधिकृत अधिकारी का दायित्व भी संभाल रहे हैं,तो हितों के टकराव की स्थिति पैदा होती है या नहीं? यह कानूनी निष्कर्ष नहीं,बल्कि जांच का प्रश्न है, क्योंकि यदि एक ही व्यक्ति समिति के प्रशासनिक निर्णय में भूमिका निभाए,फिर उसी समिति के बैंक खाते से होने वाले वित्तीय लेन-देन की बैंकिंग प्रक्रिया भी उसी शाखा के अधीन हो, तो पारदर्शिता बनाए रखने के लिए अतिरिक्त निगरानी की जरूरत महसूस होना स्वाभाविक है।
विवेक से ‘हमदर्दी’ या नियमों की अनदेखी?-विवेक चौरसिया की वापसी को लेकर सबसे तीखा सवाल यही है कि यदि समिति के पास उनकी नियुक्ति का स्पष्ट मूल दस्तावेज मौजूद है और उनकी सेवा वैधानिक रूप से समाप्त नहीं हुई थी,तो उसे सार्वजनिक करने में क्या परेशानी है?और यदि मूल नियुक्ति का दस्तावेज ही उपलब्ध नहीं है,तो फिर उन्हें पुनः कार्य पर रखने की इतनी जल्दी क्यों? शिकायतकर्ता इसी आधार पर आरोप लगा रहे हैं कि नियमों और पूर्व नियुक्ति संबंधी दस्तावेजों का परीक्षण किए बिना कार्रवाई की गई,आरोप सही है या नहीं, यह जांच का विषय है,लेकिन नियुक्ति से संबंधित मूल रिकॉर्ड सामने आ जाए तो आधे सवाल अपने आप खत्म हो जाएंगे।
अब सवाल शाखा प्रबंधक से नहीं,पूरी व्यवस्था से है-यह मामला केवल श्यामलाल सिंह और विवेक चौरसिया तक सीमित नहीं है,सवाल सहकारी संस्थाओं की उस प्रशासनिक व्यवस्था का है जिसमें किसान का पैसा, समिति का खाता और कर्मचारियों की नियुक्ति—तीनों एक-दूसरे से जुड़े हैं,यदि शिवप्रसादनगर समिति के खाते से बड़ी राशि का भुगतान हुआ है तो उसका पूरा हिसाब सामने आना चाहिए,यदि किसानों से हमाली का भुगतान कराया गया और फिर समिति के खाते से उसी मद में राशि निकाली गई तो उसका सत्यापन होना चाहिए,यदि सोनपुर में हटाए गए कर्मचारी को फिर कार्य पर रखा गया तो उसकी मूल नियुक्ति फाइल सामने आनी चाहिए,यदि सात महीने पुराने आदेश पर कार्रवाई की गई तो सात महीने की देरी का कारण स्पष्ट होना चाहिए,यदि नया कार्यवाही रजिस्टर बनाया गया तो पुराने रजिस्टर की स्थिति सामने आनी चाहिए,और यदि एक दिन के कार्यवाहक सचिव के माध्यम से महत्वपूर्ण निर्णय कराया गया तो उसके अधिकार और वैधानिकता की जांच होनी चाहिए।
अब जांच हो तो बैंक स्टेटमेंट से लेकर कार्यवाही रजिस्टर तक सब खुले-
पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए शिवप्रसादनगर और सोनपुर समितियों के बैंक स्टेटमेंट,कैशबुक,लेजर,भुगतान वाउचर, समिति कार्यवाही रजिस्टर,नियुक्ति एवं सेवा संबंधी फाइल,धान खरीदी रिकॉर्ड,मजदूरी भुगतान रिकॉर्ड तथा संबंधित अधिकारियों के आदेश का मिलान जरूरी है,इसके साथ यह भी जांचना होगा कि किस अधिकारी ने कौन सा आदेश जारी किया,किस अधिकारी ने उसका पालन कराया और किस स्तर पर वित्तीय अथवा प्रशासनिक स्वीकृति दी गई,क्योंकि यदि आरोप गलत हैं तो दस्तावेज उन्हें खारिज कर देंगे,और यदि दस्तावेज सवालों की पुष्टि करते हैं तो फिर जवाबदेही तय करने में देर नहीं होनी चाहिए।
आखिर शाखा प्रबंधक की भूमिका कितनी?-श्यामलाल सिंह पर लगाए जा रहे आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जांच के बिना नहीं की जा सकती,इसलिए उनसे और संबंधित समिति प्रबंधन से यह पूछना भी जरूरी है कि विवेक चौरसिया की मूल नियुक्ति का आदेश क्या है,सात महीने पुराने आदेश पर तत्काल कार्रवाई क्यों नहीं हुई,प्राधिकृत अधिकारी बदलने के बाद उसी आदेश पर पुनः कार्रवाई क्यों की गई,नया कार्यवाही रजिस्टर क्यों बनाया गया और शिवप्रसादनगर समिति के खाते से हुई बड़ी निकासी किन-किन वैध मदों में खर्च हुई,इन सवालों के जवाब मिलना जरूरी है,क्योंकि सहकारी समिति में किसान का पैसा और संस्था की संपत्ति किसी व्यक्ति की निजी सुविधा नहीं हो सकती,अब असली परीक्षा यह है कि जांच कागजों पर होगी या कागजों को ही जांच से बचाया जाएगा।
बैंक की शाखा संभालना या समितियों का संचालन?
सहकारी बैंक की शाखा के स्तर पर शाखा प्रबंधक की भूमिका वित्तीय अनुशासन,बैंकिंग लेन-देन की निगरानी और नियमों के अनुरूप भुगतान सुनिश्चित करने से जुड़ी होती है,लेकिन सोनपुर और शिवप्रसादनगर से जुड़े घटनाक्रमों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या श्यामलाल सिंह समितियों के आंतरिक प्रशासन में जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो रहे हैं? आरोप यह भी है कि समिति में कर्मचारियों की व्यवस्था से लेकर कार्यवाहक सचिव बनाए जाने और बैंक खाते से राशि के भुगतान तक उनकी भूमिका सामान्य बैंकिंग निगरानी से आगे जाती दिखाई देती है,यदि किसी समिति में कर्मचारी रखना या हटाना समिति के सक्षम निकाय का विषय है,तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि शाखा प्रबंधक किस अधिकार के तहत ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करते हैं,इसी तरह समिति के बचत खाते से भुगतान की स्थिति में बैंक की भूमिका यह सुनिश्चित करने की होनी चाहिए कि भुगतान वैध दस्तावेजों और सक्षम स्वीकृति के आधार पर हो,यहीं से असली सवाल निकलता है—नियमों की निगरानी करने वाला ही यदि निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बन जाए तो निगरानी किसकी होगी?
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