सियासत से ज्यादा अब सड़क की बात : जनता के आक्रोश के बीच स्वीकारोक्ति बनी चर्चा का विषय,सवाल…जब बदहाली मालूम थी तो सुधार कब शुरू हुआ?

-संवाददाता-
अम्बिकापुर,10 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। अंबिकापुर की बदहाल सड़कों को लेकर जनता का आक्रोश गुरुवार को मंत्री राजेश अग्रवाल के निवास तक पहुंच गया। सड़क की दुर्दशा से नाराज नागरिकों ने विधायक-मंत्री निवास का घेराव कर अपनी नाराजगी जाहिर की। इस दौरान मंत्री राजेश अग्रवाल की ओर से समस्या से मुंह मोड़ने के बजाय यह स्वीकार किया जाना कि ‘हां,सड़कें बेहद खराब हैं’,चर्चा का विषय बन गया। समर्थक इसे सरगुजिहापन और जनता से सीधे संवाद की मिसाल बता रहे हैं,लेकिन जनता के लिए असली सवाल इससे आगे का है…जब सड़कें खराब होने की बात स्वीकार है,तो उन्हें ठीक करने में इतनी देर क्यों हुई? घेराव में सुरेश राम बुनकर,अंकुर सिन्हा,संजय ठाकुर,अनीता साहनी,घनश्याम दास,राजेंद्र बहादुर सिंह,मनीष टोप्पो,सुजान बिन्द,सुल्ताना सिद्दीकी,धनराज साहनी,अनीता पैकरा,शाहनाज खान और जूही सहित अन्य नागरिक शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने शहर की बदहाल सड़कों को लेकर अपनी नाराजगी जताते हुए सड़क सुधार की ठोस और समयबद्ध कार्रवाई की मांग की।
घेराव ने सवाल उठाया, स्वीकारोक्ति ने जिम्मेदारी बढ़ाई : किसी जनप्रतिनिधि के निवास का घेराव होना अपने आप में जनता के असंतोष का गंभीर संकेत है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि सड़क की बदहाली को लेकर समस्या से बचने
या जिम्मेदारी दूसरे विभाग पर डालने के बजाय उसे स्वीकार किया गया। यही स्वीकारोक्ति अब सरकार और प्रशासन की जवाबदेही भी बढ़ाती है। यदि मंत्री स्वयं मान रहे हैं कि सड़कें बेहद खराब हैं तो जनता का यह सवाल भी स्वा भाविक है कि इन सड़कों की हालत यहां तक पहुंचने के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या संबंधित विभाग नियमित निरीक्षण नहीं कर रहा था? क्या बारिश से पहले मरम्मत की प्रभावी योजना नहीं बनाई गई? यदि योजना बनी थी तो उसका असर सड़कों पर क्यों नहीं दिखा?
गड्ढों से परेशान जनता अब जवाब चाहती है : बारिश के बाद अंबिकापुर शहर और आसपास के क्षेत्रों की कई सड़कों की हालत और खराब हो गई है। जगह-जगह गड्ढे, उखड़ी सड़कें और जलभराव वाहन चालकों के लिए परेशानी के साथ दुर्घटना का खतरा भी बढ़ा रहे हैं। जनता का कहना है कि सड़क केवल किसी विभाग की संपत्ति नहीं,बल्कि हर नागरिक के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा है। खराब सड़क का असर स्कूल जाने वाले बच्चों से लेकर मरीजों,बुजुर्गों, कर्मचारियों और व्यापारियों तक पर पड़ता है।
अब स्वीकारोक्ति से आगे बढ़कर कार्रवाई की जरूरत : मंत्री द्वारा जनता के बीच सड़क की बदहाली स्वीकार करना संवाद की दृष्टि से सकारात्मक कदम माना जा सकता है। समस्या को स्वीकार करना उससे मुंह मोड़ने से बेहतर है। लेकिन लोकतंत्र में स्वीकारोक्ति अंतिम उपलब्धि नहीं,समाधान की शुरुआत होती है। अब जनता यह देखना चाहती है कि जिन सड़कों की बदहाली स्वीकार की गई है,वहां काम कब शुरू होगा। कौन सी सड़क प्राथमिकता में है, कितना बजट स्वीकृत होगा और निर्माण की गुणवत्ता की जिम्मेदारी किसकी होगी…इन सवालों का जवाब भी जनता को चाहिए। क्योंकि गड्ढों में अस्थायी तौर पर मुरुम या गिट्टी डालकर समस्या को टाल देना स्थायी समाधान नहीं है। जनता ऐसी सड़क चाहती है जो अगली बारिश तक नहीं,बल्कि वर्षों तक सुरक्षित आवागमन दे।
अब जनता की नजर कार्रवाई पर…
आज का घेराव केवल विरोध का एक कार्यक्रम नहीं,बल्कि जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के सामने जनता की सीधी चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। प्रदर्शनकारियों ने अपनी बात रख दी,मंत्री ने समस्या स्वीकार कर ली। अब असली परीक्षा संबंधित विभाग और प्रशासन की है।
सवाल अब यह नहीं कि सड़क खराब है या नहीं…क्योंकि यह बात स्वयं स्वीकार की जा चुकी है। सवाल यह है कि सड़क कब सुधरेगी?
अंबिकापुर की जनता अब बयान नहीं, समयसीमा के साथ काम देखना चाहती है। यही इस स्वीकारोक्ति की अगली और सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur