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कोरिया/एमसीबी@ कोरिया से सरगुजा तक सड़कों पर मौत का सायाः आवारा मवेशियों का तांडव,व्यवस्था बेबस और जिम्मेदार खामोश

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हर कुछ दूरी पर सड़क घेरकर बैठे मवेशी,रात में बढ़ जाता है हादसों का खतरा,किसान खेत बचाए या सड़क पर जान?
-राजन पाण्डेय-
कोरिया/एमसीबी,29 अगस्त 2026 (घटती-घटना)।
कोरिया से लेकर एमसीबी, सूरजपुर और सरगुजा संभाग के विभिन्न हिस्सों को जोड़ने वाली सड़कों पर इन दिनों एक ऐसी समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है,जिसे लंबे समय से नजरअंदाज किया जा रहा है, राष्ट्रीय राजमार्ग हो या प्रमुख जिला मार्ग,कस्बों को जोड़ने वाली सड़कें हों या ग्रामीण संपर्क मार्ग—कई स्थानों पर आवारा मवेशियों के झुंड सड़क पर बैठे, चलते अथवा अचानक सड़क पार करते दिखाई देते हैं, वाहन चालकों के लिए यह स्थिति लगातार दुर्घटना के खतरे को बढ़ा रही है। सोनहत, घुघरा,कैलाशपुर,कटगोड़ी,नौगई,शिवघाट से लेकर पटना,जमगहना,डुमरिया,कलुवा, सूरजपुर, विश्रामपुर और सिलफिली सहित अनेक मार्गों पर स्थानीय लोगों द्वारा सड़क पर मवेशियों की मौजूदगी की समस्या उठाई जाती रही है। कई जगहों पर सड़क किनारे सुरक्षित पशु-आश्रय अथवा व्यवस्थित रोकथाम की व्यवस्था नहीं होने से मवेशी दिनभर सड़कों और रात में सड़क के बीचोंबीच बैठे नजर आते हैं।
दिन में खतरा,रात में स्थिति और गंभीर
दिन के समय वाहन चालक किसी तरह सड़क पर बैठे मवेशियों को देखकर वाहन नियंत्रित कर लेते हैं,लेकिन रात में यही समस्या बेहद खतरनाक रूप ले लेती है। अंधेरे में काले या गहरे रंग के मवेशी सड़क पर बैठे होने के कारण अचानक सामने दिखाई देते हैं,तेज रफ्तार वाहन चालक को प्रतिक्रिया देने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता,विशेषकर दोपहिया वाहन चालक, बाइक सवार,ऑटो और छोटे चारपहिया वाहन अधिक जोखिम में रहते हैं। मवेशी को बचाने के प्रयास में वाहन चालक अचानक ब्रेक लगाता है या दिशा बदलता है तो सामने से आने वाले वाहन से टक्कर की आशंका भी बढ़ जाती है,सवाल यह है कि जिस सड़क पर वाहन चालकों से यातायात नियमों का पालन करने और गति नियंत्रित रखने की अपेक्षा की जाती है,उसी सड़क को यदि मवेशियों के झुंड घेर लें तो उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी होगी?
एक मवेशी नहीं,पूरा झुंड बन रहा दुर्घटना का कारण
समस्या केवल एक-दो आवारा पशुओं तक सीमित नहीं है, कई स्थानों पर मवेशी झुंड के रूप में सड़क पर दिखाई देते हैं,एक मवेशी सड़क पार करता है तो उसके पीछे कई अन्य पशु भी अचानक सड़क पार करने लगते हैं, वाहन चालक एक पशु को बचाने की कोशिश करता है और उसी दौरान दूसरा पशु सामने आ जाता है। यही स्थिति रात के समय और अधिक भयावह हो जाती है,कई बार सड़क के बीच बैठे मवेशी वाहन की रोशनी पड़ने पर अचानक उठकर दौड़ने लगते हैं,जिससे दुर्घटना की संभावना और बढ़ जाती है।
कागजों में योजनाएं, जमीन पर सड़क ही बना पशुओं का ठिकाना
छत्तीसगढ़ में बेसहारा पशुओं के लिए समय-समय पर विभिन्न योजनाएं और व्यवस्थाएं बनाई गईं,पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में गौठान योजना को बड़े स्तर पर लागू किया गया। बाद में व्यवस्था में बदलाव के साथ पशुओं के लिए प्रभावी वैकल्पिक व्यवस्था और गौधाम जैसी अवधारणाओं की चर्चा भी सामने आई, लेकिन जमीनी सवाल आज भी वही है—सड़क पर घूम रहे इन मवेशियों के लिए वर्तमान में वास्तविक और स्थायी व्यवस्था आखिर कहां है? यदि गांवों और नगरीय क्षेत्रों में पर्याप्त पशु-आश्रय उपलब्ध हैं तो मवेशी सड़कों तक क्यों पहुंच रहे हैं? यदि व्यवस्था है तो उसका संचालन और निगरानी कौन कर रहा है? और यदि व्यवस्था नहीं है तो जिम्मेदार विभाग इस समस्या के समाधान के लिए क्या कर रहे हैं?
पशु मालिकों की जवाबदेही भी तय हो
हर आवारा मवेशी बेसहारा है, ऐसा मान लेना भी समस्या का एक पक्ष छिपा देता है, ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में ऐसे पशु भी होते हैं जिन्हें उनके मालिक दूध देने अथवा उपयोगी रहने तक रखते हैं और बाद में खुले में छोड़ देते हैं, ऐसे पशुओं की पहचान, टैगिंग और मालिकों की जवाबदेही तय करने की व्यवस्था प्रभावी तरीके से लागू होनी चाहिए। यदि किसी पशु का मालिक निर्धारित किया जा सकता है तो उसे खुले में छोड़ने की स्थिति में जिम्मेदार ठहराने की व्यवस्था पर गंभीरता से अमल होना चाहिए।
पंचायत से लेकर नगरीय निकाय तक जवाबदेही जरूरी
यह समस्या किसी एक विभाग के भरोसे हल होने वाली नहीं है, ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत, जिला पंचायत, नगरीय निकाय, पशुपालन विभाग, राजस्व प्रशासन, पुलिस और सड़क से संबंधित विभागों के बीच समन्वित व्यवस्था की आवश्यकता है।
प्रत्येक प्रमुख मार्ग के लिए यह तय होना चाहिए कि—
सड़क पर घूमने वाले मवेशियों को कौन पकड़ेगा?
उन्हें कहां रखा जाएगा?
पशु-आश्रय की क्षमता कितनी है?
चारे और पानी की व्यवस्था कौन करेगा?
पशुओं की टैगिंग और रिकॉर्ड कौन रखेगा?
पशु मालिकों की पहचान कैसे होगी?
दुर्घटना संभावित स्थानों पर चेतावनी संकेत कौन लगाएगा?
रात में सड़क से मवेशियों को हटाने की निगरानी कौन करेगा? जब तक इन सवालों के स्पष्ट जवाब और जिम्मेदार अधिकारी तय नहीं होंगे,तब तक समस्या केवल बैठकों और कागजी आदेशों तक सीमित रहने की आशंका बनी रहेगी।

सड़क सुरक्षा अभियान केवल हेलमेट तक सीमित क्यों?
प्रशासन द्वारा सड़क सुरक्षा के नाम पर समय-समय पर हेलमेट, सीट बेल्ट और शराब पीकर वाहन चलाने के खिलाफ अभियान चलाए जाते हैं, यह आवश्यक भी है, लेकिन सड़क पर बैठे मवेशियों से होने वाले जोखिम को भी सड़क सुरक्षा की गंभीर श्रेणी में शामिल करने की जरूरत है, प्रमुख मार्गों पर ब्लैक स्पॉट की तरह कैटल-हॉटस्पॉट चिन्हित किए जा सकते हैं। जहां लगातार मवेशियों के झुंड मिलते हैं, वहां चेतावनी संकेत,पर्याप्त स्ट्रीट लाइट,रिफ्लेक्टिव मार्किंग और आवश्यकता अनुसार बैरियर जैसी व्यवस्थाएं की जा सकती हैं।
रात में विशेष निगरानी की जरूरत
कई ग्रामीण और अंतर-जिला मार्गों पर रात के समय यातायात काफी बढ़ जाता है, ऐसे मार्गों पर शाम से देर रात तक विशेष निगरानी दल अथवा संबंधित स्थानीय निकायों की टीम सक्रिय रखी जा सकती है, सड़क पर बैठे मवेशियों को तत्काल हटाने के लिए हेल्पलाइन नंबर और त्वरित रिस्पांस टीम की व्यवस्था भी उपयोगी हो सकती है। यदि कोई वाहन चालक सड़क पर मवेशियों का झुंड देखता है तो वह तत्काल सूचना दे सके और संबंधित टीम मौके पर पहुंचकर रास्ता सुरक्षित कर सके।
दुर्घटना के बाद मुआवजा नहीं, दुर्घटना से पहले रोकथाम जरूरी- हर हादसे के बाद प्रशासन संवेदना व्यक्त करता है, घायल को अस्पताल पहुंचाया जाता है और मृतक के परिजनों को सहायता दिए जाने की प्रक्रिया शुरू होती है। लेकिन सवाल यह है कि दुर्घटना होने के बाद की व्यवस्था से ज्यादा जरूरी दुर्घटना को पहले ही रोकना नहीं है? यदि किसी मार्ग पर लगातार मवेशियों के कारण दुर्घटनाएं हो रही हैं तो उस मार्ग को चिन्हित कर स्थायी समाधान क्यों नहीं किया जाता?
क्या प्रशासन को किसी बड़े हादसे का इंतजार है?
मवेशियों की भी जान जा रही है, यह समस्या केवल इंसानों की सुरक्षा से जुड़ी नहीं है, सड़क पर बैठे मवेशी भी तेज रफ्तार वाहनों की चपेट में आकर घायल या मृत हो जाते हैं, कई बार दुर्घटना में वाहन चालक और पशु दोनों को नुकसान होता है,इसलिए यह मुद्दा मानवीय सुरक्षा,पशु संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था—तीनों से जुड़ा हुआ है।
सरकार को चाहिए लंबी अवधि की ठोस नीति-सड़कों से मवेशियों को हटाने के लिए केवल अभियान चलाकर समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है,इसके लिए गांव स्तर पर पशु-आश्रय,पर्याप्त चारा-पानी,पशु चिकित्सा सुविधा,टैगिंग, मालिकों की जवाबदेही और नियमित निगरानी की एकीकृत व्यवस्था जरूरी है,साथ ही यह भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए कि जिले में पशुओं के लिए कितने आश्रय केंद्र संचालित हैं, उनकी क्षमता कितनी है और वर्तमान में कितने पशु वहां रखे गए हैं।
सबसे बड़ा सवाल—जवाबदेही किसकी?
कोरिया से लेकर सरगुजा तक यदि प्रमुख सड़कों पर लगातार आवारा मवेशियों के झुंड दिखाई दे रहे हैं तो यह केवल पशुओं की समस्या नहीं है। यह प्रशासनिक निगरानी, सड़क सुरक्षा और स्थानीय निकायों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़ा करता है, आम नागरिक से यातायात नियमों के पालन की अपेक्षा बिल्कुल जायज है, लेकिन नागरिकों को सुरक्षित सड़क उपलब्ध कराना भी शासन-प्रशासन की जिम्मेदारी है, आज जरूरत इस बात की है कि प्रशासन सड़क किनारे लगे किसी बोर्ड या कागजी आदेश तक सीमित न रहे,बल्कि जमीन पर उतरकर समस्या का स्थायी समाधान करे, क्योंकि सड़क पर बैठा एक मवेशी सिर्फ एक पशु नहीं—किसी परिवार के लिए अचानक आने वाली त्रासदी का कारण बन सकता है,कोरिया से सरगुजा तक जनता का सवाल सीधा है…क्या प्रशासन हादसे के बाद जागेगा या हादसा होने से पहले सड़कों को सुरक्षित करेगा?
किसान की फसल भी खतरे में,सड़क भी…
आवारा मवेशियों की समस्या का सबसे बड़ा असर केवल सड़क सुरक्षा पर नहीं पड़ रहा,इसका सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों पर भी पड़ रहा है,दिन के समय यही मवेशी खेतों में घुसकर खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। किसान महंगे बीज,खाद,दवाइयां और डीजल का खर्च उठाकर फसल तैयार करता है,लेकिन आवारा पशुओं का झुंड कुछ ही घंटों में उसकी मेहनत पर पानी फेर सकता है।
किसान के सामने दोहरी परेशानी है…खेत में फसल बचाए या सड़क पर पशुओं को रोकने की व्यवस्था करे?
छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह समस्या और गंभीर है,क्योंकि फसल का नुकसान सीधे उनकी आय और परिवार की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करता है।


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