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सूरजपुर@ पहले जांच में दोषी,फिर एफआईआर और सेवा समाप्ति…अब चुपके से ‘री-एंट्री’ की तैयारी? 35.78 लाख के फसल बीमा मामले में सीईओ चंद्राकर की नई कवायद

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  • घोटालेबाजों की वापसी का रास्ता तैयार? 35.78 लाख के फसल बीमा मामले में सीईओ चंद्राकर की ‘गुपचुप जांच’ पर सवाल
  • नई जांच से किसकी राह आसान होगी? 35.78 लाख के प्रकरण में जवाबदेही पर बड़े सवाल ‘संरक्षण’ के आरोपों का जवाब कौन देगा?
  • नई जांच के पीछे किसकी कवायद? 35.78 लाख के प्रकरण में ‘री-एंट्री’ की तैयारी पर बड़े सवाल
  • फसल बीमा घोटाले में ‘री-एंट्री’ का रास्ता! पहले जांच में दोषी,अब कनिष्ठ अधिकारियों से दोबारा जांच
  • जिस जांच में दोषी पाए गए,उसी मामले में फिर जांच क्यों? फसल बीमा प्रकरण में सीईओ की कवायद पर सवाल
  • 5 जून 2023 की कार्रवाई के बाद 23 जनवरी 2026 का आदेश,अब नई जांच से किसकी राह आसान होगी?
  • 35.78 लाख के खेल में जांच पर जांच! पुराने दोषियों की वापसी की कवायद ने बढ़ाया रहस्य
  • पहले जिला प्रशासन की जांच,फिर बैंक की कार्रवाई…अब दोबारा जांच क्यों?
  • फसल बीमा प्रकरण में उठे बड़े सवाल…
  • दोषी कौन,जांच कौन और फायदा किसे? 35.78 लाख के फसल बीमा प्रकरण में नई कवायद से सवाल…

-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,18 अगस्त 2026 (घटती-घटना)।
इस पूरे घटनाक्रम ने बैंक के सीईओ श्रीकांत चंद्राकर की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह नहीं है कि किसी कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का अधिकार है या नहीं—नियमित प्रक्रिया के तहत उसे अपना बचाव रखने का अवसर मिलना चाहिए,सवाल यह है कि क्या उस अवसर को देने के नाम पर 35.78 लाख रुपये के मूल प्रकरण की जांच फिर से उसी तरीके से की जा रही है,जिससे पहले की जांच और कार्रवाई का प्रभाव बदल जाए? यदि सीईओ के स्तर से नई जांच गठित की गई है तो उन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि इसका लिखित आदेश क्या है? क्या कोई नया दस्तावेज सामने आया है? क्या पूर्व जांच में कोई प्रक्रियागत कमी पाई गई? क्या 23 जनवरी 2026 के संयुक्त पंजीयक आदेश में ऐसी कोई दिशा है जिसके अनुपालन के लिए जांच समिति आवश्यक है? क्या नई रिपोर्ट केवल बचाव का अवसर देने तक सीमित रहेगी या उसके आधार पर 5 जून 2023 के सेवा समाप्ति आदेश पर पुनर्विचार होगा? इन सवालों का जवाब सार्वजनिक होना चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल : 35.78 लाख रुपये और किसानों का क्या हुआ?
इस प्रकरण का सबसे अहम पक्ष किसी कर्मचारी की नौकरी नहीं,बल्कि किसानों की फसल बीमा राशि है,उपलब्ध दस्तावेजों में 35.78 लाख रुपये की राशि का उल्लेख है, 5 जून 2023 के बैंक आदेश में भी जांच दल की रिपोर्ट के आधार पर इस राशि से संबंधित अनियमितता और चार कर्मचारियों की जवाबदेही का उल्लेख है,ऐसे में नई जांच का केंद्र भी सबसे पहले यह होना चाहिए कि किसानों की राशि का वास्तविक हिसाब क्या है, कितने किसानों के खातों से राशि का कथित फर्जी आहरण हुआ? प्रत्येक किसान के नाम पर कितनी राशि दर्ज थी? कुल 35.78 लाख रुपये में से कितनी राशि किस खाते या माध्यम से निकली? कितनी राशि की वसूली हुई? कितनी राशि अब भी लंबित है? क्या प्रभावित किसानों को उनकी राशि वापस की गई? क्या बैंक ने इस संबंध में ऑडिट या विशेष ऑडिट कराया? ये सवाल आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने एफआईआर और विभागीय कार्रवाई के समय थे,यदि नई जांच इन मूल सवालों के जवाब तलाशने के बजाय केवल कर्मचारियों की सेवा बहाली के रास्ते तलाशती है, तो यह प्रक्रिया की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़ा करेगा।
अब बैंक प्रबंधन से सीधे सवाल…
पहला सवाल-नई जांच समिति गठित करने का लिखित आदेश कहां है और उसका क्रमांक क्या है?
दूसरा सवाल-भैयाथान और सूरजपुर शाखा के शाखा प्रबंधकों को ही जांच की जिम्मेदारी देने का आधार क्या है?
तीसरा सवाल-क्या नई जांच 23 जनवरी 2026 के संयुक्त पंजीयक आदेश के अनुपालन में है? यदि हां, तो आदेश के किस निर्देश के तहत?
चौथा सवाल-क्या 5 जून 2023 के आदेश क्रमांक 383 में उल्लिखित जिला प्रशासन की जांच रिपोर्ट को नई समिति पुनः जांचेगी?
पांचवां सवाल-क्या कोई नया तथ्य, नया दस्तावेज या नई वित्तीय जानकारी सामने आई है?
छठा सवाल-35.78 लाख रुपये की राशि में से अब तक कितनी वसूली हुई है और कितनी राशि शेष है?
सातवां सवाल-क्या प्रभावित किसानों को राशि वापस की गई है? यदि हां,तो कितनी?
आठवां सवाल-क्या नई जांच रिपोर्ट के आधार पर जगदीश प्रसाद कुशवाहा या अन्य संबंधित कर्मचारियों की सेवा में वापसी का प्रस्ताव है?
नौवां सवाल-यदि ऐसा प्रस्ताव है तो उसका कानूनी और सेवा नियमों के तहत आधार क्या है?
दसवां सवाल-क्या जांच समिति को किसी निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए स्वतंत्र रूप से साक्ष्य जुटाने की अनुमति है या पहले से कोई निष्कर्ष तय किया गया है? इन सवालों के जवाब मिलने पर ही स्पष्ट होगा कि नई जांच वास्तव में न्यायालयीन आदेश की प्रक्रिया पूरी करने की कवायद है या पुराने मामले में आरोपित कर्मचारियों की ‘री-एंट्री’ का रास्ता खोलने की कोशिश।
अब नजर बैंक प्रबंधन,सहकारिता विभाग और शासन के जवाब पर…
दैनिक घटती-घटना ने इस मामले को पहले भी प्रमुखता से उठाया था, 9 मार्च 2026 की ‘सहकारी बैंक में ‘संरक्षण’ का संदेह?’ रिपोर्ट में भी 35.78 लाख रुपये के फसल बीमा प्रकरण,कार्रवाई और आगे की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए गए थे,उस समय यह सवाल सामने आया था कि क्या कार्रवाई की दिशा बदलकर आरोपित कर्मचारियों के लिए रास्ता तैयार किया जा रहा है,अब नई जांच की कथित कवायद ने उसी सवाल को फिर सामने ला दिया है,अब कथित नई जांच की खबर सामने आने के बाद मामला फिर चर्चा में है,बैंक प्रबंधन, सहकारिता विभाग और शासन के सामने पारदर्शिता के साथ यह बताने की जिम्मेदारी है कि 05.06.2023 के आदेश क्रमांक 383 और 23.01.2026 के प्रकरण क्रमांक 17/55(2)/2023 के आदेश के बाद नई जांच की जरूरत क्यों पड़ी,यदि नई समिति बनाई गई है तो उसका आदेश सार्वजनिक किया जाना चाहिए,सबसे महत्वपूर्ण यह कि किसी भी नई प्रक्रिया का केंद्र किसान और उनकी राशि होनी चाहिए। सेवा बहाली यदि नियमों के तहत संभव है तो वह भी पारदर्शी प्रक्रिया से हो, लेकिन 35.78 लाख रुपये के मूल प्रकरण की जवाबदेही और वसूली का सवाल उससे दबना नहीं चाहिए,जब तक इन सवालों के स्पष्ट जवाब सामने नहीं आते,तब तक 35.78 लाख रुपये के फसल बीमा प्रकरण में नई जांच की कथित कवायद पर सवाल उठते रहेंगे। दस्तावेजों का क्रम यह बताता है कि मामला पहले ही कई स्तरों से गुजर चुका है। अब यदि फिर से जांच हो रही है तो किस आदेश के तहत, किस उद्देश्य से और किस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए,यह सार्वजनिक होना चाहिए,दैनिक घटती-घटना का सवाल सीधा है की यदि पुरानी जांच गलत थी तो उसे गलत साबित करने वाला नया दस्तावेज सामने लाया जाए,यदि प्रक्रिया अधूरी थी तो उसे नियमों के तहत पूरा किया जाए और यदि 35.78 लाख रुपये की अनियमितता के निष्कर्ष कायम हैं तो किसानों की राशि की वसूली और जिम्मेदारी तय करने को प्राथमिकता दी जाए,लेकिन चोरी-छिपे नई जांच, कथित गोपनीय निर्देश और किसी पक्ष के पक्ष में रिपोर्ट तैयार कराने की चर्चा,यदि सही है, तो यह सहकारी व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल है। इसलिए बैंक प्रबंधन को आगे आकर स्थिति साफ करनी चाहिए।
संरक्षण’ के आरोपों का जवाब कौन देगा?
इस पूरे घटनाक्रम ने बैंक के सीईओ श्रीकांत चंद्राकर की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं,सवाल यह नहीं है कि किसी कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का अधिकार है या नहीं, नियमित प्रक्रिया के तहत उसे अपना बचाव रखने का अवसर मिलना चाहिए था जो उसे पूर्व में मिला भी पर अपने आपको कार्यवाही से बचा नहीं सके,जांच, एफआईआर और कार्रवाई के बाद अब फिर सवाल क्यों? जब 35.78 लाख रुपये के फसल बीमा प्रकरण में पहले ही विस्तृत जांच समिति गठित की गई थी और जांच के दौरान एक-एक साक्ष्य,दस्तावेज और वित्तीय अनियमितता को जांच प्रतिवेदन में दर्ज किया गया था,तभी मामला एफआईआर तक पहुंचा और आरोपित कर्मचारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की स्थिति बनी, यदि उस समय संबंधित लोगों को लगता था कि वे दोषी नहीं हैं अथवा जांच में उनके साथ अन्याय हुआ है, तो उन्हें उसी समय अपनी बेगुनाही के पक्ष में सभी साक्ष्य प्रस्तुत करने और जांच के निष्कर्षों को चुनौती देने का पूरा अवसर था, अब सवाल यह है कि वर्षों बाद अचानक ऐसी कौन-सी नई परिस्थिति या नया साक्ष्य सामने आ गया है, जिसके आधार पर पहले से जांचे और कार्रवाई किए जा चुके प्रकरण को फिर से जांच के लिए खोला जा रहा है? क्या पूर्व जांच रिपोर्ट में कोई गंभीर त्रुटि साबित हुई है? क्या उस जांच को सक्षम प्राधिकारी ने निरस्त किया है? या फिर संबंधित आरोपितों को न्यायालय ने इस मामले में दोषमुक्त कर दिया है? यदि न्यायालय ने दोषमुक्त नहीं किया है और पूर्व जांच रिपोर्ट को भी विधिवत निरस्त नहीं किया गया है, तो फिर नई जांच का औचित्य क्या है? क्या केवल दोबारा जांच कर लेने से पहले की जांच में दर्ज निष्कर्ष और जिम्मेदारी खत्म हो जाएगी? सबसे अहम सवाल यही है कि जिस समय एफआईआर हुई, विभागीय कार्रवाई हुई और सेवा समाप्ति तक की कार्रवाई पहुंची, उस समय अपनी बेगुनाही साबित करने का प्रयास क्यों नहीं किया गया?
अब यदि नई जांच हो रही है, तो बैंक प्रबंधन को स्पष्ट करना चाहिए कि नई जांच का आधार क्या है, नया साक्ष्य क्या है और क्या किसी न्यायालय ने संबंधित आरोपितों को इस प्रकरण में दोषमुक्त किया है? वरना यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि कहीं पुरानी जांच के निष्कर्षों को बदलकर फिर से ‘री-एंट्री’ का रास्ता तो तैयार नहीं किया जा रहा?
दैनिक घटती-घटना ने पहले भी उठाया था मामला…
इस प्रकरण पर दैनिक घटती-घटना/कोरिया समाचार,सोमवार 09 मार्च 2026, पृष्ठ 6 पर ‘सहकारी बैंक में ‘संरक्षण’ का संदेह?’ शीर्षक से रिपोर्ट प्रकाशित की जा चुकी है। उसमें 35.78 लाख रुपये के फसल बीमा प्रकरण,एफआईआर,निलंबन, सेवा समाप्ति और आगे की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे। यह सरकारी जांच दस्तावेज नहीं है,लेकिन इससे स्पष्ट है कि मामला पहले से सार्वजनिक चर्चा का विषय रहा है, यदि अब नई जांच वास्तव में गठित की गई है तो बैंक या सहकारिता विभाग को यह भी बताना चाहिए कि पूर्व प्रकाशित रिपोर्ट में उठाए गए सवालों पर कोई आधिकारिक परीक्षण हुआ या नहीं।
क्या पुरानी जांच को नई रिपोर्ट से बदला जा सकता है?
यदि किसी जांच के आधार पर विभागीय कार्रवाई हुई और बाद में उसमें कमी पाई गई,तो उस कमी को सक्षम प्राधिकारी के आदेश से स्पष्ट किया जाना चाहिए। केवल नई समिति बनाकर पुराने निष्कर्षों के विपरीत रिपोर्ट आने से पहले की कार्रवाई अपने आप समाप्त नहीं हो जाती,नई जांच में पुराने निष्कर्ष सही पाए जाएं तो उन्हें बरकरार रखना होगा। यदि नए दस्तावेज से अलग तथ्य सामने आते हैं तो उसका स्रोत और प्रमाण रिकॉर्ड पर होना चाहिए। और यदि पुरानी जांच प्रक्रियागत रूप से त्रुटिपूर्ण थी तो उस त्रुटि की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।


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