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अम्बिकापुर@क्या मरीजों की बीमारी भी अब कमीशन तय करेगा? ब्लड टेस्ट की विश्वसनीयता पर उठते सवाल,डॉक्टर-लैब गठजोड़ की जांच जरूरी

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राज्यसभा में राघव चड्डा ने उठाया कमीशन का मुद्दा,देशभर में फर्जी ब्लड रिपोर्ट के मामले सामने आने के बाद अम्बिकापुर में भी पारदर्शिता और जांच की मांग तेज


-संवाददाता-
अम्बिकापुर,07 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। स्वास्थ्य सेवा का आधार मानी जाने वाली पैथोलॉजी जांचों की विश्वसनीयता पर अब गंभीर सवाल उठने लगे हैं। राज्यसभा में सांसद राघव चड्डा द्वारा डॉक्टरों और कुछ डायग्नोस्टिक लैब के कथित कमीशन तंत्र का मुद्दा उठाए जाने के बाद पूरे देश में इस विषय पर नई बहस छिड़ गई है। उन्होंने सदन में कहा कि कुछ डॉक्टर मरीजों को विशेष लैब में जांच कराने के लिए भेजते हैं और बदले में कथित रूप से कमीशन, महंगे उपहार या विदेश यात्राओं जैसी सुविधाएं प्राप्त करते हैं। यदि ऐसे आरोप सही हैं तो यह केवल आर्थिक अनियमितता नहीं,बल्कि मरीजों के स्वास्थ्य और जीवन से जुड़ा अत्यंत गंभीर विषय है। इसी बीच देश के विभिन्न हिस्सों में फर्जी ब्लड रिपोर्ट तैयार करने,बिना वास्तविक जांच के रिपोर्ट जारी करने तथा नामी लैब के नाम का दुरुपयोग करने जैसे मामलों का खुलासा भी हुआ है। इन घटनाओं ने मरीजों का भरोसा कमजोर किया है और स्वास्थ्य व्यवस्था की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
अलग-अलग लैब,अलग-अलग रिपोर्ट…आखिर सही कौन? एक वरिष्ठ पुस्तक विक्रेता विनीत सेठी ने दावा किया कि यदि एक ही व्यक्ति एक ही समय पर तीन अलग-अलग पैथोलॉजी लैब में समान रक्त जांच कराए तो कई बार तीनों रिपोर्टों में महत्वपूर्ण अंतर देखने को मिलता है। यह दावा स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं है, लेकिन यदि ऐसा होता है तो यह सवाल स्वाभाविक है कि चिकित्सक उपचार किस रिपोर्ट के आधार पर करें और मरीज किस पर भरोसा करे। हालांकि चिकित्सा विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि कुछ परीक्षणों में मशीन, परीक्षण विधि,रेफरेंस रेंज,सैंपल हैंडलिंग तथा जैविक कारणों से सीमित अंतर संभव है। लेकिन यदि अंतर असामान्य या चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण हो तो उसकी जांच आवश्यक है।
अम्बिकापुर में भी उठ रहा सवाल : अम्बिकापुर में भी समय-समय पर यह चर्चा होती रही है कि कुछ चिकित्सक विशेष लैब से ही जांच कराने की सलाह देते हैं। फिलहाल इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और किसी विशेष डॉक्टर या लैब के विरुद्ध सक्षम प्राधिकारी द्वारा दोष सिद्ध नहीं किया गया है। फिर भी यदि ऐसी शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं तो संबंधित स्वास्थ्य विभाग को उनकी गंभीरता से जांच करनी चाहिए।
सीएमएचओ की जिम्मेदारी
विशेषज्ञों का मानना है कि जिला स्वास्थ्य प्रशासन को निम्न बिंदुओं पर विशेष अभियान चलाना चाहिए—
– जिले की सभी पैथोलॉजी लैब का नियमित निरीक्षण।
– मान्यता, लाइसेंस और योग्य पैथोलॉजिस्ट की उपलब्धता की जांच।
– गुणवत्ता नियंत्रण और रिकॉर्ड का ऑडिट।
– शिकायत मिलने पर रिपोर्ट का पुनः सत्यापन।
– यदि कमीशन या अनियमितता के प्रमाण मिलें तो संबंधित नियमों के तहत कड़ी कार्रवाई।
देशभर में सामने आए गंभीर मामले
देश के विभिन्न राज्यों में पुलिस और प्रशासन ने ऐसे मामलों का खुलासा किया है, जिनमें बिना परीक्षण के कंप्यूटर से रिपोर्ट तैयार करने,फर्जी डिजिटल हस्ताक्षर लगाने तथा ब्रांडेड लैब के नाम का दुरुपयोग करने के आरोप सामने आए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी रक्त जांच के क्षेत्र में बड़े कॉरपोरेट धोखाधड़ी के मामले सामने आ चुके हैं,जिससे यह स्पष्ट होता है कि लैब परीक्षणों की गुणवत्ता और निगरानी अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।
कमीशन का खेल मरीज पर भारी?
स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि किसी डॉक्टर और लैब के बीच आर्थिक लेन-देन या कमीशन की व्यवस्था होती है,तो अनावश्यक जांच लिखे जाने की आशंका बढ़ जाती है। इससे मरीज का आर्थिक बोझ बढ़ता है और कई बार अनावश्यक इलाज भी शुरू हो सकता है। यद्यपि सभी डॉक्टर और सभी लैब इस श्रेणी में नहीं आते। बड़ी संख्या में चिकित्सक और पैथोलॉजी विशेषज्ञ पूरी ईमानदारी और पेशेवर मानकों के साथ कार्य कर रहे हैं। इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले प्रमाण और निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
मरीज भी रहें सतर्क
मरीजों को चाहिए कि वे मान्यता प्राप्त लैब से ही जांच कराएं,रिपोर्ट का सत्यापन करें और यदि रिपोर्ट पर संदेह हो तो आवश्यकता पड़ने पर दूसरी विश्वसनीय लैब से पुनः जांच कराएं। उपचार केवल योग्य चिकित्सक की सलाह से ही लें।
सवाल व्यवस्था से है,
किसी व्यक्ति विशेष से नहीं
स्वास्थ्य व्यवस्था में जनता का विश्वास सर्वोपरि है। यदि कुछ लोगों की वजह से पूरे चिकित्सा तंत्र की छवि प्रभावित हो रही है तो इसकी निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होना आवश्यक है। यदि आरोप गलत हैं तो उन्हें भी तथ्यों के आधार पर खारिज किया जाना चाहिए,और यदि सही हैं तो दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। आखिर मरीज इलाज के लिए अस्पताल जाता है, किसी कमीशन तंत्र का हिस्सा बनने के लिए नहीं।


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