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सूरजपुर@ बसदेई PHC : मरीजों को दवा मिले न मिले,सवाल पूछने वालों को नोटिस जरूर मिलेगा

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  • खबर छपी तो नोटिस,सवाल उठे तो पुलिस,बसदेई PHC में आखिर छुपाना क्या चाहते हैं जिम्मेदार?
  • बसदेई PHC : व्यवस्था पर सवाल उठाओ तो नोटिस,नोटिस के बाद भी बोलो तो पुलिस शिकायत! आखिर स्वास्थ्य सेवाएं सुधारना लक्ष्य है या सवाल दबाना?
  • कलेक्टर तक पहुंची शिकायत, MBBS डॉक्टर को प्रभार देने की मांग, अस्पताल की व्यवस्था पर उठे सवालों के बीच मानहानि नोटिस और पुलिस जांच भी चर्चा में
  • व्यवस्था पर सवाल उठाओ और कटघरे में पहुंच जाओ! बसदेई PHC विवाद ने खड़े किए बड़े प्रश्न
  • अस्पताल की बदहाली पर नहीं, खबरों पर कार्रवाई क्यों? बसदेई PHC फिर विवादों में
  • क्या बसदेई PHC की प्रभारी सीएमएचओ से भी ऊपर? सवालों से ज्यादा सक्रिय दिखा नोटिस तंत्र
  • बसदेई PHC : इलाज कम, विवाद ज्यादा, अब कलेक्टर तक पहुंची शिकायत
  • कलेक्टर तक पहुंची शिकायत, फिर भी सवाल कायम—आखिर किसके संरक्षण में चल रही व्यवस्था?


-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर19 जून 2026 (घटती-घटना)।
सूरजपुर जिले का बसदेई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र अब केवल एक अस्पताल नहीं, बल्कि सवालों,विवादों,शिकायतों,नोटिसोंऔर प्रशासनिक संरक्षण की चर्चाओं का केंद्र बन चुका है, पिछले कई महीनों से अस्पताल की कार्यप्रणाली को लेकर लगातार खबरें प्रकाशित हो रही हैं,कभी अस्पताल में आरएमए प्रभारी व्यवस्था को लेकर सवाल उठे, कभी एमबीबीएस डॉक्टरों की भूमिका को लेकर बहस हुई,कभी नाइट ड्यूटी में डॉक्टरों की अनुपस्थिति चर्चा में रही, तो कभी मरीजों के इलाज के बजाय रेफर किए जाने की शिकायतें सामने आईं,लेकिन इन सवालों का जवाब व्यवस्था सुधार के रूप में कम और नोटिसों तथा शिकायतों के रूप में ज्यादा दिखाई दिया।
अब मामला उस स्तर तक पहुंच चुका है जहां बसदेई के ग्रामीणों ने सीधे कलेक्टर सूरजपुर को लिखित शिकायत देकर स्वास्थ्य केंद्र की संपूर्ण प्रशासनिक एवं स्वास्थ्य व्यवस्था की निष्पक्ष जांच कराने की मांग कर दी है, शिकायत में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि स्वास्थ्य केंद्र को लेकर लगातार विवाद, स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में गिरावट, प्रशासनिक समन्वय की कमी और मरीजों की बढ़ती परेशानियों की जांच की जाए तथा अस्पताल का प्रभार एमबीबीएस चिकित्सक को सौंपने पर विचार किया जाए।
खबरें छपती रहीं,सवाल बढ़ते रहे…
बसदेई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को लेकर प्रकाशित खबरों में लगातार यह सवाल उठता रहा कि जब अस्पताल में एमबीबीएस डॉक्टर पदस्थ हैं तो फिर अस्पताल संचालन और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर विवाद क्यों है? ग्रामीणों ने कई बार आरोप लगाया कि अस्पताल में इलाज से ज्यादा रेफर की व्यवस्था दिखाई देती है,रात के समय डॉक्टरों की अनुपस्थिति को लेकर भी सवाल उठे। ग्रामीणों का कहना रहा कि ड्यूटी रोस्टर कागजों में तो मौजूद है, लेकिन वास्तविकता में कई बार मरीजों को डॉक्टर उपलब्ध नहीं हो पाते। गंभीर मरीजों को जिला अस्पताल रेफर करना आम बात बन चुकी है,इसी दौरान अस्पताल परिसर में प्रभारी के लिए आवंटित सरकारी मर्टर पर वर्षों से ताला लटकने और मुख्यालय में निवास न करने जैसे आरोप भी चर्चा में रहे।
50 लाख का मानहानि नोटिस और फिर पुलिस शिकायत
अस्पताल की व्यवस्था पर सवाल उठाने वाली खबरों के जवाब में 50 लाख रुपये का मानहानि नोटिस भेजा गया,लेकिन नोटिस के बाद भी जब खबरें प्रकाशित होती रहीं और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सवाल उठते रहे तो मामला पुलिस तक पहुंच गया,यहीं से पूरे घटनाक्रम ने नया मोड़ ले लिया,अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि खबरें गलत थीं तो स्वास्थ्य विभाग ने अस्पताल की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक क्यों नहीं की? यदि अस्पताल की व्यवस्था आदर्श थी तो ग्रामीणों द्वारा कलेक्टर को शिकायत क्यों दी गई? और यदि शिकायतें निराधार हैं तो जांच कर सच्चाई सामने लाने के बजाय नोटिस और पुलिस शिकायतों का सहारा क्यों लिया जा रहा है?
क्या सीएमएचओ से भी ऊपर है बसदेई पीएचसी की प्रभारी?
पूरा मामला अब स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े कर रहा है,जिले के स्वास्थ्य विभाग का मुखिया सीएमएचओ होता है,लेकिन बसदेई पीएचसी को लेकर उठे विवादों में अब तक ऐसा कोई बड़ा कदम सामने नहीं आया जिससे यह लगे कि व्यवस्था सुधार सर्वोच्च प्राथमिकता है,इसके उलट खबरें प्रकाशित होने के बाद नोटिस,फिर पुलिस शिकायत और अब पूछताछ की प्रक्रिया ने कई लोगों को यह सवाल पूछने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर बसदेई पीएचसी की प्रभारी को किस स्तर का संरक्षण प्राप्त है? ग्रामीणों का कहना है कि यदि अस्पताल की व्यवस्थाओं को लेकर शिकायतें गलत हैं तो विभाग जांच कर सच्चाई सामने लाए, लेकिन यदि शिकायतें सही हैं तो सुधारात्मक कार्रवाई करे। सवाल उठाने वालों को ही कटघरे में खड़ा करना समाधान नहीं हो सकता।
कलेक्टर तक पहुंची शिकायत ने बढ़ाई मुश्किलें…
अब तक जो बातें केवल खबरों और चर्चाओं तक सीमित थीं,वे अब आधिकारिक शिकायत का हिस्सा बन चुकी हैं,कलेक्टर को दिए गए आवेदन में स्वास्थ्य केंद्र की संपूर्ण व्यवस्था की जांच,मरीजों और ग्रामीणों की शिकायतों का सत्यापन,स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन और एमबीबीएस चिकित्सकों की भूमिका की समीक्षा की मांग की गई है,शिकायत में यह भी कहा गया है कि जहां एमबीबीएस डॉक्टर उपलब्ध हैं,वहां अस्पताल का प्रशासनिक प्रभार उन्हें सौंपा जाना अधिक उचित होगा ताकि चिकित्सा और प्रशासनिक जवाबदेही दोनों सुनिश्चित हो सकें।
व्यवस्था पर सवाल या सवाल करने वालों पर कार्रवाई?
बसदेई पीएचसी विवाद अब एक मूल प्रश्न पर आकर खड़ा हो गया है,क्या प्राथमिकता अस्पताल की व्यवस्था सुधारना है या फिर व्यवस्था पर सवाल उठाने वालों को जवाब देना? यदि मरीजों को पर्याप्त सुविधा मिल रही है,यदि नाइट ड्यूटी सुचारू है,यदि प्रशासनिक व्यवस्था दुरुस्त है,यदि अस्पताल में कोई विवाद नहीं है, तो फिर लगातार शिकायतें क्यों सामने आ रही हैं? और यदि शिकायतें वास्तविक हैं, तो कार्रवाई अस्पताल की व्यवस्था पर क्यों नहीं दिखाई दे रही?
अब निगाहें प्रशासन पर…
कलेक्टर तक पहुंची शिकायत के बाद अब पूरा मामला जिला प्रशासन के पाले में है, जांच होती है तो कई सवालों के जवाब सामने आ सकते हैं—अस्पताल का वास्तविक संचालन कौन कर रहा है? नाइट ड्यूटी की वास्तविक स्थिति क्या है? एमबीबीएस डॉक्टरों की भूमिका क्या है? मरीजों को रेफर क्यों किया जाता है? और आखिर बसदेई पीएचसी विवाद का मूल कारण क्या है? फिलहाल इतना जरूर है कि बसदेई पीएचसी अब केवल स्वास्थ्य सेवाओं के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था पर उठते सवालों,नोटिसों, शिकायतों और जवाबदेही की बहस के लिए जाना जाने लगा है। और जब किसी अस्पताल की पहचान इलाज से ज्यादा विवादों से बनने लगे,तो यह केवल उस अस्पताल नहीं बल्कि पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए चिंता का विषय माना जाता है।


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