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अम्बिकापुर@सप्लायर तक पहुंची आबकारी टीम…लेकिन गढ़वा बॉर्डर पर क्यों थम जाती है जांच?

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  • 50 से ज्यादा प्रकरण,सैकड़ों इंजेक्शन जब्त,फिर भी नहीं टूट रहा नशे का नेटवर्क,खुद आबकारी अधिकारी ने गिनाईं संसाधनों की मजबूरियां
  • सरगुजा में नशीले इंजेक्शनों के खिलाफ आबकारी विभाग की कार्रवाई एक बार फिर चर्चा में है। पहले वाहिद अंसारी,फिर उसके कथित सप्लायर मोशीम अंसारी की गिरफ्तारी…विभाग इसे बड़ी सफलता बता रहा है,लेकिन इस कार्रवाई के बाद जो सबसे बड़ा सवाल खड़ा हुआ है,वह किसी आरोपी पर नहीं बल्कि खुद विभाग की कार्यप्रणाली पर है। क्योंकि इस बार सवाल विपक्ष या आम लोगों ने नहीं उठाया,बल्कि विभाग के ही जिम्मेदार अधिकारी सहायक जिला आबकारी अधिकारी सुपरमैन रंजीत गुप्ता के बयान ने कई परतें खोल दी हैं। रंजीत गुप्ता ने साफ कहा कि मोशीम अंसारी को नशीले इंजेक्शन गढ़वा के सप्लायरों से मिलते थे,लेकिन वहां तक पहुंचना आबकारी विभाग के लिए आसान नहीं है। संसाधन नहीं हैं,साइबर सेल नहीं है,हथियार नहीं हैं,फंड नहीं है।

-संवाददाता-
अम्बिकापुर,17 जून 2026 (घटती-घटना)। सरगुजा संभाग में नशीले इंजेक्शनों के खिलाफ चल रहे अभियान के बीच एक तरफ आबकारी विभाग ने 24 घंटे के भीतर कैरियर से सप्लायर तक पहुंचकर अपनी सक्रियता दिखाई है, वहीं दूसरी तरफ विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के बयान ने पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। वाहिद अंसारी की गिरफ्तारी के बाद उसके कथित सप्लायर मोशीम अंसारी को भी गिरफ्तार कर लिया गया। 600 नशीले इंजेक्शनों की बरामदगी और एनडीपीएस एक्ट के तहत कार्रवाई को विभाग बड़ी सफलता मान रहा है। लेकिन इस कार्रवाई के बाद सहायक जिला आबकारी अधिकारी सुपरमैन रंजीत गुप्ता द्वारा संसाधनों की कमी, सीमित अधिकार क्षेत्र और अन्य एजेंसियों के अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने की जो बातें सामने आई हैं, उन्होंने नशे के खिलाफ लड़ाई की वास्तविक तस्वीर भी उजागर कर दी है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि विभाग को पहले से पता है कि नशीले इंजेक्शनों की सप्लाई का स्रोत गढ़वा जैसे बाहरी क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है, तो आखिर वर्षों से कार्रवाई सप्लायर और स्थानीय नेटवर्क तक ही क्यों सिमटी हुई है?
24 घंटे में कार्रवाई,लेकिन
कहानी यहीं खत्म नहीं होती

14 जून की रात सरना मैदान से वाहिद अंसारी की गिरफ्तारी हुई। उसके पास से 200 नशीले इंजेक्शन बरामद किए गए। पूछताछ में उसने मोशीम अंसारी का नाम लिया और अगले ही दिन आबकारी टीम ने मोशीम अंसारी की दुकान से 400 और इंजेक्शन बरामद कर लिए। कार्रवाई तेज थी,परिणाम भी सामने आया। लेकिन इस पूरी कार्रवाई ने यह भी साबित कर दिया कि स्थानीय स्तर पर काम करने वाले लोग अकेले नहीं हैं। उनके पीछे कोई न कोई सप्लाई चैन सक्रिय है। यहीं से सवाल उठता है कि यदि मोशीम अंसारी तक पहुंचना संभव था तो उसके ऊपर की कड़ी तक पहुंचने में वर्षों से बाधा क्या है?
खुद अधिकारी ने बताई विभाग की बेबसी
पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू सहायक जिला आबकारी अधिकारी सुपरमैन रंजीत गुप्ता का वह कथन है, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि मोशीम अंसारी को नशीले इंजेक्शन गढ़वा क्षेत्र के सप्लायरों से मिलते थे और वहां कार्रवाई करना आबकारी विभाग के लिए आसान नहीं है।, उनका कहना है कि आबकारी विभाग के पास न पर्याप्त बल है,न हथियार,न साइबर सेल और न ही पर्याप्त वित्तीय संसाधन। उन्होंने यह भी कहा कि पूर्व में एक बार अंबिकापुर साइबर टीम की मदद से गढ़वा जाकर कार्रवाई की गई थी, जिसमें 1500 नशीले इंजेक्शन के साथ तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था,लेकिन हर बार ऐसी मदद मिलना संभव नहीं होता। रंजीत गुप्ता का यह बयान एक अधिकारी की ईमानदार स्वीकारोक्ति माना जा सकता है, लेकिन साथ ही यह कई संस्थागत प्रश्न भी खड़े करता है। यदि विभाग खुद को सीमित संसाधनों वाला मानता है तो फिर लगातार सामने आ रहे अंतरराज्यीय नेटवर्क से निपटने की जिम्मेदारी किसकी है?
क्या आबकारी विभाग केवल अंतिम कड़ी पकड़ रहा है? पिछले एक वर्ष में संभागीय उड़नदस्ता टीम ने 50 से अधिक प्रकरण दर्ज किए हैं। यह संख्या बताती है कि कार्रवाई लगातार हो रही है। लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि इतने प्रकरणों के बावजूद नशीले इंजेक्शनों की उपलब्धता खत्म नहीं हुई। हर कुछ सप्ताह में नई खेप पकड़ी जाती है। नए आरोपी सामने आते हैं। नई सप्लाई लाइन का खुलासा होता है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या कार्रवाई मुख्यतः कैरियर,स्थानीय विक्रेता और छोटे सप्लायरों तक सीमित रह जाती है,जबकि बड़े नेटवर्क संचालक अब भी कानून की पकड़ से बाहर हैं?
गढ़वा का नाम बार-बार क्यों आता है? नशीले इंजेक्शन के कई मामलों में जांच के दौरान झारखंड के गढ़वा क्षेत्र का नाम सामने आने की चर्चा होती रही है। यदि वास्तव में सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण हिस्सा वहां से संचालित हो रहा है तो फिर क्या दोनों राज्यों की एजेंसियों के बीच कोई स्थायी समन्वय तंत्र मौजूद है?
– क्या संयुक्त अभियान चलाए जा रहे हैं?
– क्या अंतरराज्यीय नेटवर्क की आर्थिक जांच हो रही है?
– क्या कॉल डिटेल,बैंक खातों और डिजिटल ट्रांजेक्शन की पड़ताल हो रही है?
– इन सवालों के जवाब अब तक सार्वजनिक नहीं हैं।
बैच नंबर की जांच से खुल सकता है बड़ा राज
विशेषज्ञों का मानना है कि जब्त इंजेक्शनों पर अंकित बैच नंबर पूरे नेटवर्क का सबसे मजबूत सुराग हो सकते हैं। यदि बैच नंबर के आधार पर यह पता लगाया जाए कि इंजेक्शन किस कंपनी ने बनाए,किस स्टॉकिस्ट को भेजे गए,किस एजेंसी ने खरीदे और किस मेडिकल प्रतिष्ठान तक पहुंचे,तो सप्लाई चेन की कई परतें सामने आ सकती हैं। लेकिन अब तक अधिकांश मामलों में जनता के सामने ऐसी जांच के परिणाम नहीं आए हैं। यही वजह है कि हर नई बरामदगी के बाद वही सवाल फिर खड़ा हो जाता है—आखिर माल आ कहां से रहा है?
ड्रग विभाग की भूमिका पर भी सवाल
यह मामला केवल एनडीपीएस एक्ट के तहत गिरफ्तारी का नहीं है। यदि वैध दवा वितरण प्रणाली से नशीले इंजेक्शन अवैध बाजार तक पहुंच रहे हैं तो औषधि प्रशासन विभाग की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
क्या संबंधित मेडिकल दुकानों के रिकॉर्ड जांचे गए?
क्या स्टॉक रजिस्टर का मिलान हुआ?
क्या थोक विक्रेताओं से पूछताछ की गई?
क्या लाइसेंसधारी एजेंसियों की जवाबदेही तय हुई?
यदि नहीं,तो जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अभी अधूरा माना जाएगा।
सफलता भी…सिस्टम की कमजोरी भी…
सुपरमैन रंजीत गुप्ता और उनकी टीम ने वाहिद अंसारी से मोशीम अंसारी तक पहुंचकर यह जरूर दिखाया है कि कार्रवाई केवल दिखावे की नहीं थी। एक दिन पहले उठे सवाल का जवाब अगले दिन गिरफ्तारी के रूप में मिला। लेकिन इसी कार्रवाई ने यह भी उजागर कर दिया कि नशे के खिलाफ लड़ाई केवल जज्बे के भरोसे नहीं जीती जा सकती। जब एक अधिकारी स्वयं कह रहा है कि विभाग के पास पर्याप्त संसाधन,तकनीकी सहायता,हथियार,साइबर समर्थन और अंतरराज्यीय कार्रवाई की क्षमता नहीं है,तब यह मामला केवल व्यक्तिगत कार्यक्षमता का नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था की क्षमता का बन जाता है।
सरगुजा पूछ रहा है…
– यदि गढ़वा से सप्लाई आने की जानकारी है तो वहां नियमित संयुक्त कार्रवाई क्यों नहीं होती?
– 50 से अधिक प्रकरणों के बावजूद नेटवर्क खत्म क्यों नहीं हुआ?
– जब्त इंजेक्शनों के बैच नंबर की विस्तृत जांच हुई या नहीं?
– मेडिकल एजेंसियों और स्टॉकिस्टों की भूमिका की पड़ताल कहां तक पहुंची?
– क्या वित्तीय लेन-देन और बैंक खातों की जांच की जा रही है?
– क्या आबकारी विभाग को अंतरराज्यीय नेटवर्क से निपटने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं?
– क्या नशे के कारोबार के पीछे मौजूद बड़े संचालकों तक जांच पहुंचेगी?
क्या यही है निष्कर्ष. .
मोशीम अंसारी की गिरफ्तारी ने यह साबित किया कि आबकारी विभाग स्थानीय सप्लायर तक पहुंच सकता है। लेकिन विभाग के अपने अधिकारी की स्वीकारोक्ति यह भी बताती है कि जांच अक्सर उस बिंदु पर पहुंचकर रुक जाती है,जहां से असली नेटवर्क शुरू होता है। सरगुजा में नशीले इंजेक्शनों के खिलाफ लड़ाई की असली सफलता तब मानी जाएगी,जब केवल कैरियर और सप्लायर ही नहीं,बल्कि सप्लाई चेन के स्रोत,वित्तीय नेटवर्क,थोक कारोबारी और अंतरराज्यीय संचालक भी कानून के दायरे में आएं। फिलहाल कार्रवाई ने एक बार फिर उम्मीद जगाई है,लेकिन जनता अब गिरफ्तारियों से ज्यादा उस सवाल का जवाब चाहती है—नशे का यह कारोबार आखिर संचालित कौन कर रहा है और उस तक कानून कब पहुंचेगा?
इनका है कहना…
सुपरमैन रंजीत गुप्ता के इस तर्क पर जिले के एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि झारखंड सीमा क्षेत्र से नशीले इंजेक्शनों की सप्लाई की जानकारी लंबे समय से विभाग को है,तो वहां तक पहुंचने में लगातार असमर्थता के कारणों को भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए। अधिवक्ता ने यह भी दावा किया कि उक्त सीमा क्षेत्र से अधिकारी का व्यक्तिगत और पारिवारिक जुड़ाव होने की चर्चा स्थानीय स्तर पर होती रही है। उनके अनुसार इन तथ्यों और संबंधित व्यावसायिक गतिविधियों की निष्पक्ष जांच होने पर कई महत्वपूर्ण पहलू सामने आ सकते हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और न ही इस संबंध में किसी सक्षम एजेंसी द्वारा कोई आधिकारिक निष्कर्ष जारी किया गया है। बावजूद इसके,उठ रहे सवालों ने पूरे मामले में पारदर्शी जांच की मांग को और तेज कर दिया है।


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