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लेख@पुनर्वास पट्टे की भूमि का हस्तांतरण

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सरगुजा में कानूनी सवाल,फर्जीवाड़े के आरोप और आजीविका सुरक्षा का संकट

रगुजा जिले में पुनर्वास पट्टे से प्राप्त भूमि के क्रय-विक्रय एवं पंजीयन पर लगाई गई रोक ने एक बार फिर उस गंभीर प्रश्न को सामने ला दिया है,जिस पर लंबे समय से चर्चा होती रही है। पुनर्वास के उद्देश्य से दी गई भूमि,जिसे प्रभावित परिवारों की आजीविका और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवंटित किया गया था,आखिर किस प्रकार बड़े पैमाने पर खरीद-फरोख्त के दायरे में पहुंच गई?
यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सरगुजा में वर्षों से ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि पुनर्वास पट्टे की भूमि के हस्तांतरण की अनुमति प्राप्त करने के लिए कई मामलों में तथ्यों को छिपाया गया,भ्रामक जानकारी प्रस्तुत की गई या वास्तविक परिस्थितियों से अलग दस्तावेज प्रस्तुत किए गए। यदि ऐसा हुआ है, तो यह केवल राजस्व नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि शासन की पुनर्वास नीति की मूल भावना पर भी आघात है।
पुनर्वास भूमि का उद्देश्य
पुनर्वास पट्टा कोई सामान्य कृषि भूमि का पट्टा नहीं होता। इसका उद्देश्य उस व्यक्ति या परिवार को पुर्नस्थापित करना होता है,जिसकी आजीविका किसी परियोजना,अधिग्रहण,विस्थापन या अन्य कारणों से प्रभावित हुई हो।
सरकार ऐसे परिवारों को इसलिए भूमि देती है ताकि वे भविष्य में भूमिहीन न हों और उनके पास जीविकोपार्जन का स्थायी साधन बना रहे। इसलिए कानून ने ऐसी भूमि के हस्तांतरण पर विशेष प्रतिबंध लगाए हैं।
सरगुजा में उठते रहे हैं सवाल
सरगुजा में समय-समय पर यह आरोप सामने आते रहे हैं कि पुनर्वास पट्टे की कुछ भूमि के हस्तांतरण के लिए अनुमति प्राप्त करने के दौरान वास्तविक तथ्यों का पूर्ण खुलासा नहीं किया गया।
कई मामलों में यह प्रश्न उठता रहा है कि…
क्या अनुमति देने वाले
अधिकारी के समक्ष सभी तथ्य
रखे गए थे?

क्या यह बताया गया था कि
भूमि पुनर्वास श्रेणी की है?
क्या लाभार्थी की वास्तविक
आर्थिक स्थिति का परीक्षण
किया गया था?
क्या यह जांच हुई थी कि
भूमि बेचने के बाद परिवार के
पास जीविकोपार्जन का अन्य
साधन रहेगा या नहीं?
क्या राजस्व अभिलेखों और
मूल पट्टा शर्तों का सही परीक्षण
किया गया था?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर
नकारात्मक हैं,तो ऐसे मामलों
की वैधानिकता पर स्वाभाविक
रूप से प्रश्न खड़े होते हैं।
गलत जानकारी देकर ली गई
अनुमति का कानूनी प्रभाव
भारतीय विधि का एक
स्थापित सिद्धांत है कि धोखा
धड़ी या मिथ्या तथ्यों के आधार
पर प्राप्त आदेश कानून की दृष्टि
में टिकाऊ नहीं माना जाता।

यदि किसी व्यक्ति ने तथ्य छिपाकर,
गलत जानकारी देकर या भ्रामक दस्तावेज प्रस्तुत कर भूमि हस्तांतरण की अनुमति प्राप्त की है,तो सक्षम प्राधिकारी के पास ऐसे आदेश की समीक्षा, निरस्तीकरण अथवा पुनरीक्षण का अधिकार हो सकता है,बशर्ते संबंधित कानूनों और प्रक्रियाओं के अनुसार कार्रवाई की जाए।
ऐसे मामलों में सामान्यतः निम्न बिंदुओं की जांच की जा सकती है…
मूल पट्टा आदेश।
भूमि की श्रेणी।
अनुमति आवेदन में प्रस्तुत
जानकारी।
राजस्व अभिलेख।
जांच प्रतिवेदन।
अनुमति प्रदान करने की
प्रक्रिया।
लाभार्थी और क्रेता के बीच
लेन-देन की परिस्थितियां।

यदि यह प्रमाणित हो जाए कि अनुमति धोखे या तथ्य छिपाकर प्राप्त की गई थी, तो संबंधित आदेशों को चुनौती दी जा सकती है और जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध अलग-अलग कानूनों के तहत
कार्रवाई की संभावना भी बन सकती है।
प्रशासनिक और न्यायिक समीक्षा क्यों जरूरी?
सरगुजा में यदि वास्तव में बड़ी संख्या में ऐसे प्रकरण हुए हैं जिनमें नियमों की अनदेखी या तथ्यों का गलत प्रस्तुतीकरण हुआ है,तो केवल भविष्य के क्रय-विक्रय पर रोक पर्याप्त नहीं होगी।
विशेषज्ञ मानते हैं कि आवश्यकता इस बात की भी है किः-
पूर्व में दी गई अनुमतियों की
समीक्षा की जाए।
संदिग्ध मामलों का रिकॉर्ड
सत्यापित किया जाए।
मूल पुनर्वास शर्तों का परी
क्षण किया जाए।
जिम्मेदार अधिकारियों एवं
आवेदकों की भूमिका की
जांच की जाए।
यह देखा जाए कि कहीं
शासन को गलत जानकारी
देकर निर्णय तो नहीं कराया गया।

सरगुजा की सामाजिक वास्तविकता
सरगुजा में बड़ी संख्या में ग्रामीण और आदिवासी परिवार कृषि भूमि पर निर्भर हैं। ऐसे क्षेत्र में पुनर्वास भूमि का महत्व केवल संपत्ति तक सीमित नहीं है। यह परिवार की खाद्य सुरक्षा,रोजगार और सामाजिक स्थिरता से जुड़ा विषय है।
यदि पुनर्वास भूमि धीरे-धीरे निजी खरीद-फरोख्त का माध्यम बन जाती है, तो कुछ वर्षों बाद वही परिवार पुनः भूमिहीनता और आर्थिक असुरक्षा की स्थिति में पहुंच सकते हैं,जिन्हें पुनर्वास नीति के माध्यम से सुरक्षित करने का प्रयास किया गया था।
वर्तमान रोक का महत्व
कलेक्टर द्वारा क्रय-विक्रय और पंजीयन पर लगाई गई रोक को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। यह कदम केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं बल्कि उस व्यापक कानूनी प्रश्न से जुड़ा है कि पुनर्वास पट्टे की भूमि के हस्तांतरण की अनुमति देने का अधिकार किन परिस्थितियों में और किस सीमा तक प्रयोग किया जा सकता है। साथ ही यह अवसर भी है कि पिछले वर्षों में हुए ऐसे सभी प्रकरणों की निष्पक्ष समीक्षा हो, जिन पर नियमों के उल्लंघन,तथ्य छिपाने या फर्जीवाड़े के आरोप लगते रहे हैं। सरगुजा में पुनर्वास पट्टे की भूमि का मामला केवल जमीन की खरीद-फरोख्त का मुद्दा नहीं है। यह शासन की पुनर्वास नीति,गरीब एवं विस्थापित परिवारों के अधिकार,राजस्व प्रशासन की जवाबदेही और कानून के शासन से जुड़ा विषय है। यदि किसी भी स्तर पर गलत जानकारी,तथ्य छिपाने या फर्जी दस्तावेजों के आधार पर अनुमति प्राप्त की गई है,तो ऐसे मामलों की पारदर्शी जांच और कानूनी समीक्षा आवश्यक है। अन्यथा पुनर्वास के लिए दी गई भूमि धीरे-धीरे अपने मूल उद्देश्य से भटककर केवल व्यापारिक संपत्ति बनकर रह जाएगी,जो पुनर्वास नीति की भावना के विपरीत होगा।

सुधा सिंह
अम्बिकापुर,सरगुजा(छ.ग.)


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