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लेख@आधुनिक दुनिया और इंसानियत की पुकार

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कभी-कभी बैठकर मैं सोचती हूँ कि वक्त के साथ यह दुनिया कितनी बदल सी गई है। बाहर से देखें तो सब कुछ आधुनिक सा हो गया है — ऊँची इमारतें, तेज इंटरनेट,चाँद-मंगल तक पहुँचने के सपने। लेकिन इंसान के अंदर की सोच? वो अब भी पुरानी जंजीरों में जकड़ी हुई है,आज भी एक इंसान की पहचान जाति-धर्म,रंग-रूप, ऊंच-नीचे से किया जाता है। असल में तो हम सब की अलग ही एक कहानी है और हम सब अपना किरदार निभा रहे है। भूख, दर्द, सुख-दुःख का एहसास तो सभी को एक जैसा होता है तो फिर बांटना क्यों?, समझ नहीं आता। खैर हक¸ीक¸त तो ये है कि ये लेबल हम इंसानों ने बनाया है शायद इसलिए लोग इंसानियत ही भूलते जा रहे हैं और धोखे,भेदभाव और दिखावे से थककर वो जानवरों के पास सुकून ढूंढते है। कभी किसी जानवर से ये पूछते है कि तुम्हारा धर्म या जाति क्या है। नहीं ना, उनको हम इंसान प्यार करते हैं तो वो भी हमें प्यार देते हैं,हम नफ़रत करते है तो वो नफ़रत करते हैं। ठीक इसी प्रकार अगर बिना जाति-धर्म पूछे,आप स्नेह,प्यार, आर्शीवाद देते हैं तो निश्चित रूप से आपको भी प्यार,स्नेह,आर्शीवाद मिलेगा। सच कहा जाए तो आज भी अक्सर किसी की पहचान उसकी काबिलियत,मेहनत या दिल से नहीं,बल्कि उसकी जाति,धर्म,रंग या परिवार से तय होती है। कोई कितना भी हुनरमंद क्यों न हो,पहले उसका सरनेम पूछा जाता है। कोई कितना भी नेक दिल क्यों न हो,पहले उसका धर्म देखा जाता है। काला-गोरा,ऊँच-नीच,अपना-पराया—इन दीवारों ने हमें बाँट रखा है।शायद इसी वजह से इंसान अब इंसान से घबराने लगा है। सोचो,जिस दिन ये ऊँच-नीच का भेदभाव खत्म हो जाएगा, जिस दिन काला-गोरा सिर्फ रंग रह जाएगा,जिस दिन जाति-धर्म से पहले इंसान को इंसान समझा जाएगा—उस दिन हम सच में विकास के रास्ते पर होंगे। असली तरक्की तब होती है जब हर बच्चे को बराबर मौका मिले,जब मेहनत का फल सरनेम देखकर न बाँटा जाए। समाज सेवा भले आप ना करें लेकिन अपने अदंर की इंसानियत को हमेशा रखना चाहिए क्योंकि हमारे स्वभाव पर निर्भर करता है कि हमारे मरने के बाद लोग हमे याद करेगे या नहीं। ये सच्चाई है कि अंत में कुछ साथ नहीं जाता। न पैसा,न पद,न जाति का घमंड। आखिरी वक्त में बस यही काम आता है कि हम इंसान कैसे थे। किसी के आँसू पोंछे थे या नहीं, किसी के बुरे वक्त में साथ थे या नहीं? किसी को उठाया था या गिराया था? इसलिए दुनिया बदलने का इंतज़ार मत करो। बदलाव की शुरुआत खुद से करो। अगले इंसान को जज करने से पहले एक बार रुककर खुद के बारे में सोचो—क्या मैं उसे इंसान की तरह देख रहा हूँ? अगर हाँ,तो समझो तुम पहले ही एक अच्छे इंसान बनने के रास्ते पर हो और जब हम सब थोड़े-थोड़े अच्छे इंसान बन जाएंगे,तो दुनिया अपने आप खूबसूरत हो जाएगी।


मुस्कान केशरी
मुजफ्फ रपुर,बिहार


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