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लेख@किधर जाएं बेचारे बूढ़े मां-बाप

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हमारे शास्त्रों में माता-पिता को परमात्मा से भी ऊपर का दर्जा दिया गया है। कोई जमाना था जब लोग श्री रामचंद्र जी द्वारा पिता दशरथ की आज्ञा मानकर 14 वर्ष बनवास जाने की बात कह कर गर्व महसूस किया करते थे। और वह भी क्या जमाना था जब श्रवण कुमार द्वारा अपने अंधे माता-पिता को कावड़ में बिठाकर तीर्थ स्थानों‌ की यात्रा की कहानी सुना कर माता-पिता को समर्पित होने के बात कहा करते थे। लेकिन दोस्तों आजकल घोर कलयुग का जमाना आ गया है। कोई जमाना था जब घर का बुजुर्ग घर का मुखिया या बादशाह हुआ करता था। घर के सभी सदस्य उसके साम्राज्य की प्रजा हुआ करते थे। सबका ईमानदारी तथा निष्पक्षता से ध्यान रखना उसका फर्ज हुआ करता था। परिवार का कोई भी सदस्य उसके सामने सिर उठाकर ऊंची आवाज में बात करने की हिम्मत नहीं किया करता था। लेकिन इस किस्म की बातें तो आजकल इतिहास के पन्नों का हिस्सा बनकर रह गई है। जो मां बच्चों को 9 महीने अपने गर्भ में रखती है, जन्म देकर, पाल पोसकर तथा अच्छे संस्कार देकर तथा दुनिया की सारी बातें बता कर बड़ा करती है और जो पिता बच्चों को खुश करने के लिए घोड़ा बनकर,और उन्हें जीवन में ऊंचा उठने
के लिए कठिन परिश्रम करता है, खुद फटे पुराने कपड़े पहनता है ताकि उनके बच्चे नए-नए तथा बढि़या कपड़े पहन सके,बच्चों की खातिर वह उन लोगों के सामने भी नतमस्तक हो जाता है जिन्हें वह शायद देखना भी पसंद ना करें। पिता उधार लेकर अथवा जमीन जायदाद गिरवी रखकर बच्चों को उच्च शिक्षा देता है,उनकी नौकरी तथा विवाह शादी का बीड़ा उठाता है। लेकिन वाह‌ री किस्मत जिनके मां-बाप इतनी कुर्बानियां करके बुढ़ापे में उनके द्वारा बुढ़ापे में सेवा करवाने के सपने संजोते हैं वही बच्चे अपने मां-बाप से दूर कहीं नौकरी करने के लिए चले जाते हैं। कुछ बच्चे विदेशों में जाकर बस जाते हैं। शुरू शुरू में कभी-कभी टेलीफोन करते हैं और पैसे भी भेजते हैं फिर अचानक यह सिलसिला बिल्कुल बंद हो जाता है। बुढ़ापे में बच्चों से सेवा करवाने वाले मां-बाप अकेले घर की दीवारों को ही देखते रह जाते हैं। उनकी नज़रें और कान हमेशा बच्चों के आने की इंतजार करते रहते हैं। लेकिन बच्चे हैं विदेशों में या फिर दूर के बड़े शहरों में ऐश की जिंदगी व्यतीत करते हैं और कभी भी अपनी मां-बाप को याद नहीं करते, बात नहीं करते,मिलने नहीं आते। पूछा जा सकता है कि क्या मां बाप ने अपनी जवानी की सहुलते बच्चों के लिए इसलिए कुर्बान कर दी ताकि बच्चे उनको उस बुढ़ापे में अकेला छोड़ जाए जब उन्हें उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी। बूढी आंखें बच्चों को देखने और उनके द्वारा सेवा करवाने के लिए तरसती रहती हैं। विदेशों में रहने वाले बेटे अपने मां बाप के बीमार होने और मरने पर भी यह बहाना बनाकर नहीं आते कि छुट्टी नहीं मिलती। लेकिन जब मां बाप मर जाते हैं तब उनकी संपत्ति बेचकर पैसे इकट्ठे करने के लिए ऐसेकृतघ्न बच्चे जरूर आ जाते हैं। जो बच्चे पीछे अपने मां-बाप के साथ रहते हैं वो भी जोरू का गुलाम बनकर अपने मां बाप को बहुत परेशान करते हैं,जिस घर को मां-बाप ने बनाया था उसके एक कोने में उनको फेंक देते हैं,उनकी सेवा नहीं करते, पेट भर खाना नहीं देते, बीमार होने पर दवा दारू नहीं देते,बच्चों को उनके पास नहीं आने देते, मां बाप घर के किसी मामले में दखल नहीं दे सकते,घर में होने वाला कोई काम उनसे पूछ कर नहीं किया जाता,बाहर से आने वाले मेहमानों को उनसे नहीं मिलने दिया जाता,बुजुर्गों की धन संपत्ति को हड़पने की कोशिश की जाती है,उनका अपमान,अवहेलना तथा तिरस्कार किया जाता है, उनको गालियां दी जाती हैं,उनके मरने की दुआएं की जाती हैं,कई बार उनके साथ हाथापाई भी की जाती है,ऐसे में बूढ़े मां-बाप भगवान से मौत मांगते हैं,परंतु क्या भगवान से मांगने पर हर चीज मिल जाती है। उन्हें बहुत बार वृद्ध आश्रम में भेज दिया जाता है,उनका हाल पूछने कभी कोई नहीं आता। ऐसे बेचारे बुजुर्ग मां बाप जाएं तो कहां जाएं। एक सर्वेक्षण के अनुसार अनपढ़ बेटे तो अपने बूढ़े मां-बाप को अपने साथ रखना ज्यादा पसंद करते हैं उनकी सेवा करके आशीर्वाद प्राप्त करते हैं परंतु वृद्ध आश्रम में रहने वाले बहुत सारे बुजुर्ग अमीर तथा धनाढ्य और पढ़े लिखे परिवारों से होते हैं। जो कृतघ्न बच्चे अपने बुजुर्ग माता-पिता का ऐसा हाल करते हैं उनको तो लानत है। ऐसे बेटे यह क्यों नहीं सोचते कि उनके मां-बाप उनके दादा-दादी के साथ जो दुर्व्यवहार कर रहे हैं उनके अपने बच्चे भी बड़े होकर अपने मां-बाप के साथ इससे भी बहुत ज्यादा बुरा बर्ताव करेंगे। लेकिन ऐसे बेटों को जवानी का अहंकार और कमाई हुई धन दौलत यह सब सोचने का अवसर ही नहीं देती। अगर हम चाहते हैं कि हमारे बुढ़ापे में हमारे बेटे श्रवण कुमार की तरह हमारी सेवा करें तो सबसे पहले जवान बेटों को स्वयं श्रवण कुमार बनकर अपने माता-पिता की सेवा करके दिखाना होगा तभी ही उनके बुढ़ापे में उनके बेटे आज्ञाकारी बनकर समर्पण भावना के साथ उनकी सेवा करेंगे। कैसी विडंबना है कि माता-पिता तो कठिनाइयां उठाकर तथा त्याग करके अपने बच्चों को बड़ा करते हैं और बच्चे उनकी सेवा करने के बदले में उनको दर दर की ठोकरे खाने के लिए मजबूर करते हैं। पश्चिमी देशों में अधिकांश माता-पिता यह पहले ही मान लेते हैं कि बड़े होकर उनकी संतान ने उनकी सेवा तो करनी ही नहीं इसलिए जैसे ही संतान अपने पैरों पर खड़ा होना सीख जाती है माता-पिता उनको घर से चलता कर देते हैं। बेशक मां-बाप ऐसा अपने दिल पर पत्थर रखकर करते होंगे लेकिन जब बच्चों ने बुढ़ापे में सेवा करनी ही नहीं फिर उनके जुल्मो सितम सहने तथा उन पर खर्च करने का क्या फायदा। आजकल के स्वार्थी,अहंकारी तथा बदतमीज बच्चों को अपने पास रखने के बदले में माता-पिता को अपने संतान के प्रति अपने व्यवहार बदलना पड़ेगा। आजकल कुछ प्राइवेट कंपनियां किराए के बेटे भी देने लगी है। यह बेटे कंपनियों द्वारा कुछ पैसे लेकर बुजुर्ग मां-बाप के पास उनके बेटों की तरह रहते हैं, सेवा करते हैं,प्यार करते हैं और उन्हें उनके बेटों की कमी महसूस नहीं होने देते। इससे बुजुर्गों का समय बहुत अच्छा कट जाता है। इसके बावजूद भी अपना खून तो अपना खून ही होता है। सरकार को प्रत्येक बेटे से यह है लिखवा लेना चाहिए कि वह अपनी-आमदनी का कुछ भाग अपने माता-पिता को हर महीने देता रहेगा,अगर वह बेटा मां बाप से दूर कहीं नौकरी करता है या व्यवसाय चलाता है तो समय-समय पर वह माता-पिता को टेलीफोन करता रहेगा और समय-समय पर उनका हाल-चाल पूछने भी आता रहेगा। भारत के संविधान के मुताबिक कोई भी बेटा अपने मां-बाप को उनकी धन संपत्ति बेटों के नाम करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। बुजुर्गों को भी चाहिए किअपनी जवानी के दिनों में ही अपने बुढ़ापे के लिए कुछ पैसे बचाकर रखना शुरू करें जो कि बुढ़ापे में उनके काम आएंगे। अपना स्वास्थ्य ठीक रखें और हम उम्र बुजुर्गों के साथ संपर्क बनाकर रखें,अपनी समस्याओं का आदान-प्रदान उनके साथ करके उन्हें निपटाने की कोशिश करें। बुढ़ापा है इसने तो सब पर आना है। क्यों ना कोई ऐसा तरीका ढूंढा जाए कि बुढ़ापा सुख चैन,शांति और बेटों के ऊपर आश्रित हुए बिना सुख से बीत जाए।


प्रो.शामलाल कौशल
रोहतक,हरियाणा


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