साल 2009 की बात है। ब्रिटेन के आक्सफोर्ड में 16 साल के एक स्कूली छात्र ने आत्महत्या की कोशिश से कुछ मिनट पहले फेसबुक पर लिखा,मैं अब बहुत दूर जा रहा हूं। अमेरिका में बैठी उसकी फेसबुक मित्र ने इस संदेश को पढ़ा तो उसने तत्काल अपनी मां को बताया। मां ने आनन-फानन में मैरीलैंड पुलिस को सूचित किया। पुलिस ने व्हाइट हाउस के स्पेशल एजेंट से संपर्क साधा और उसने फौरन वाशिंगटन में ब्रिटिश दूतावास के अधिकारियों से। उन्होंने ब्रिटेन की मेट्रोपालिटन पुलिस से संपर्क किया और चंद मिनट बाद छात्र के घर का पता लगाकर पुलिस उसके घर जा पहुंची। जब तक वह घर के भीतर दाखिल हुई, छात्र नींद की बहुत अधिक गोलियां खा चुका था। वह बेहोश पड़ा था। पुलिसकर्मियों ने कुछ ही पलों में उसे अस्पताल पहुंचाया, जहां उसकी जान बच गई।
उक्त किस्सा बताता है कि यूरोप-अमेरिका में इंसान का जीवन कितना अनमोल है और सिर्फ एक जि़ंदगी बचाने के लिए कैसे एजेंसियां ज़मीन-आकाश एक कर देती हैं,लेकिन दुर्भाग्य से भारत में मौत सिर्फ एक आंकड़ा है। दिल्ली के मालवीय नगर में होटल में आग से 21 लोगों की मौत ने एक बार फिर यह बात साबित की। प्रारंभिक जांच में फिर वही लापरवाहियां सामने आई हैं,जो लगभग हर अग्निकांड के बाद सामने आती हैं। उदाहरण के लिए होटल के पास सिर्फ छह कमरे बनाने की अनुमति थी, लेकिन 25 कमरे बनाए गए। होटल के पास अनिवार्य फायर एनओसी तक नहीं थी। इमारत में प्रवेश और निकास का सिर्फ एक दरवाजा था और कोई आपातकालीन द्वार नहीं था। इस हादसे में कई विदेशी भी मारे गए हैं।
विडंबना यह कि किसी हादसे से सीख नहीं ली जाती। बीते साल दिसंबर में गोवा नाइटक्लब में अग्निकांड हुआ,जिसमें 25 लोगों की मौत हो गई थी। वह हादसा हाल के वर्षों का सबसे बड़ा सिस्टम फेलियर केस माना जाता है। इस अग्निकांड की मजिस्टि्रयल जांच में सामने आया था कि क्लब अवैध निर्माण पर चल रहा था,फायर एनओसी नहीं था,पर्याप्त आपातकालीन निकासी द्वार नहीं थे,स्पि्रंकलर सिस्टम नहीं था और फायर अलार्म सिस्टम तक नहीं था। रिपोर्ट के ये निष्कर्ष इस तरह के लगभग हर अग्निकांड के बाद सामने आते हैं, जो साफ तौर पर नियामकीय विफलता दिखाते हैं। आग की घटनाओं के संदर्भ में तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि भारत में लोग आग से कम,आग लगने से पहले की गई अनदेखी से ज्यादा मरते हैं। भारत में कई मामलों में मौत यहां कोई असाधारण घटना नहीं,बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था का एक नियमित परिणाम है। दिल्ली के जनकपुरी में एक युवक सड़क पर खोदे गए गड्ढे में गिर जाता है। घंटों तक मदद नहीं मिलती और उसकी मौत हो जाती है। नोएडा में एक इंजीनियर की कार खुले नाले में जा गिरती है। उसकी मौत के बाद सुरक्षा प्रबंधों तथा प्रशासनिक लापरवाही पर गंभीर सवाल उठते हैं। दिल्ली के राजेंद्र नगर की एक इमारत के बेसमेंट में चल रहे कोचिंग सेंटर में पानी भरने से तीन छात्र डूबकर मर जाते हैं। इस तरह के सैकड़ों उदाहरण हैं,लेकिन प्रशासनिक विफलता की कहानी वही रहती है।
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि 2015 से 2020 के बीच खुले गड्ढों और मैनहोल में गिरकर 5,393 लोगों की मौत हुई। यानी औसतन हर दिन दो भारतीय ऐसी मौत मरते हैं,जो पूरी तरह रोकी जा सकती थीं। सवाल यह है कि गड्ढे खुले क्यों थे और उनके आसपास आवश्यक सुरक्षा इंतज़ाम क्यों नहीं थे? भारत में हर बड़े हादसे के बाद एक तयशुदा पटकथा चलती है। जांच के आदेश दिए जाते हैं। मुआवजे की घोषणा होती है। कुछ अधिकारियों का तबादला होता है। फिर अगला हादसा हो जाता है। दुखद यह है कि भारत में मौतें अक्सर किसी एक व्यक्ति की गलती से नहीं होतीं। वे कई संस्थाओं की संयुक्त विफलता से होती हैं। ठेकेदार लापरवाह होता है,विभाग आंखें मूंद लेता है, निरीक्षण औपचारिकता बन जाता है और राजनीतिक व्यवस्था केवल हादसे के बाद सक्रिय होती है। परिणामस्वरूप नागरिक मरता है और तंत्र सिर्फ प्रेस कांफ्रेंस करता है। एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान केवल चुनाव नहीं होती। उसकी पहचान यह होती है कि वह अपने नागरिकों को कितनी सुरक्षा देता है। जिस देश में लोग गड्ढों,मैनहोल,सीवरों,आग,भगदड़ और खराब सड़कों से मर रहे हों,वहां विकास के दावों की चमक थोड़ी फीकी पड़ जाती है।
एक कड़वा सच यह भी है कि भारत में नागरिकों को भी इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि कहीं कानून का उल्लंघन हो रहा है,तो उस जगह से दूरी बनाएं। इतना ही नहीं,कई जगह वे खुद भी कानून का उल्लंघन करने से नहीं हिचकते। मसलन,हमारे देश में हर साल लगभग 1.8 लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं में मर जाते हैं। इनमें से करीब 30 हजार लोग सिर्फ इसलिए मरते हैं क्योंकि उन्होंने हेलमेट नहीं पहना होता। देश की विशाल आबादी उसकी सबसे बड़ी ताकत भी है और शायद संवेदनहीनता का कारण भी। बड़ी आबादी ने जान की कीमत को इतना कम कर दिया है कि न नागरिकों को और न सिस्टम को समझ आता है कि जीवन अनमोल है। एक विकसित समाज की नैतिकता का बड़ा पैमाना यह भी है कि वह अपने सबसे साधारण नागरिक की जान को कितनी अहमियत देता है। दुर्भाग्य से भारत बार-बार यह संदेश दे रहा है कि यहां मौत सस्ती है और जवाबदेही उससे भी सस्ती।
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