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रायपुर@तीन बार राजपत्र भी हार गया? खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग में नियमों को कुचलकर बांटी गईं नियुक्तियां!

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  • तीन बार राजपत्र हारा और स्थापना जीती,चौथी बार भी स्थापना के जितने की उम्मीद?
  • तीन बार पदोन्नति में लगभग 15 को फायदा, चौथी बार 17 और लाइन में…जून के पहले सप्ताह में सूची आने की संभावना
  • फूड सेफ्टी ऑफिसर बनने के लिए चाहिए थी योग्यता,
  • लेकिन विभाग में चल पड़ा ‘सेटिंग मॉडल’!
  • छत्तीसगढ़ खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग में फूड टेस्ट से पहले डिग्री टेस्ट जरूरी नहीं?
  • खाद्य सुरक्षा अधिकारी बनने के लिए चाहिए थी तकनीकी योग्यता,लेकिन विभाग में चल पड़ा ‘नेटवर्क मॉडल’!
  • फर्जी डिग्री,प्रमोशन और
  • संरक्षण का खेल,खाद्य विभाग में बड़ा भर्ती विवाद
  • क्या मिलावटी तेल पकड़ने
  • वाला विभाग खुद ‘मिलावटी
  • डिग्री’ में फंसा?
  • राजपत्र ने कहा बायोटेक्नोलॉजी, विभाग बोला-चलो जनरल
  • बीएससी भी चलेगी!
  • नियम एक तरफ,सेटिंग एक तरफ, खाद्य विभाग में नियुक्तियों का हाई प्रोफाइल खेल
  • फूड सेफ्टी विभाग में ‘मिलावटी योग्यता’ का आरोप, स्थापना शाखा पर गंभीर सवाल
  • स्नस्स््रढ्ढ के नियमों को दरकिनार कर बांटी गईं नियुक्तियां?
  • तकनीकी डिग्री जरूरी थी,फिर कैसे बने नमूना सहायक खाद्य सुरक्षा अधिकारी?
  • राजपत्र में अलग नियम,विभाग में अलग सिस्टम, खाद्य विभाग की नियुक्तियां विवादों में…


रायपुर,03 जून 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग इन दिनों ऐसे विवादों के भंवर में फंसा दिखाई दे रहा है, जिसने सिर्फ विभागीय कार्यप्रणाली ही नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिस विभाग को जनता के खाने-पीने की गुणवत्ता की निगरानी करनी थी,वही विभाग अब अपनी नियुक्तियों और अधिकारियों की शैक्षणिक योग्यता को लेकर कटघरे में खड़ा दिखाई दे रहा है,आरोप इतने गंभीर हैं कि यदि इनकी निष्पक्ष जांच हो जाए तो विभाग के भीतर वर्षों से चल रही कथित सेटिंग संस्कृति का पूरा चेहरा सामने आ सकता है। मामला खाद्य सुरक्षा अधिकारी (एफएसओ) और जिला अधिकारी (डीओ) जैसे महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियों और प्रमोशन का है, आरोप है कि विभाग में कई ऐसे लोगों को नियुक्ति और पदोन्नति दी गई जिनकी शैक्षणिक योग्यता भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) द्वारा निर्धारित नियमों के अनुरूप नहीं थी, इससे भी बड़ा आरोप यह है कि स्थापना शाखा में बैठे अधिकारियों ने नियमों की अनदेखी करते हुए कथित रूप से लेनदेन, प्रभाव और संरक्षण के आधार पर अपात्र लोगों को पात्र बना दिया, अब सवाल सिर्फ नियुक्तियों का नहीं रहा, बल्कि यह सवाल बन चुका है कि आखिर छत्तीसगढ़ खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग में चलता क्या है राजपत्र या ‘स्थापना व्यवस्था ‘?
धारा 91 से शुरू होती है पूरी कहानी
खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम (एफएसएस एक्ट), 2006 की धारा 91 केंद्र सरकार को नियम बनाने की शक्ति देती है, इसी शक्ति के तहत केंद्र सरकार ने खाद्य सुरक्षा और मानक नियम, 2011 तथा बाद में खाद्य सुरक्षा और मानक (पहला संशोधन) नियम, 2022 जारी किए,इन नियमों में फ़ूड सेफ्टी ऑफिसर और डेजि़ग्नेटेड ऑफिसर की पात्रता स्पष्ट रूप से निर्धारित की गई, नियम 2.1.2 नामित अधिकारी (डीओ) से संबंधित है, जबकि नियम 2.1.3 विशेष रूप से खाद्य सुरक्षा अधिकारी (एफएसओ) की योग्यता निर्धारित करता है, नियम 2.1.3 के तहत एफएसओ के लिए निम्न तकनीकी विषयों में स्नातक,मास्टर या डॉक्टरेट की डिग्री अनिवार्य रूप से निर्धारित है एक दिन और हमेशा के लिए, डेयरी प्रौद्योगिकी,जैव प्रौद्योगिकी, तेल प्रौद्योगिकी, कृषि विज्ञान, पशु चिकित्सा विज्ञान, जैव-रसायन विज्ञान, सूक्ष्म जीव विज्ञान,रसायन विज्ञान दवा यानी नियम साफ थे, पात्रता स्पष्ट थी, गजट अधिसूचना सार्वजनिक थी। फिर भी सवाल यह उठ रहा है कि अंतिम पात्र लोगों को कैसे मिला?

योग्यता नहीं,जुगाड़
चाहिए विभाग में चल रही सबसे बड़ी चर्चा…

विभागीय सूत्रों का दावा है कि कई नियुक्तियां ऐसी हुईं जिनमें एफएसएसएआई के निर्धारित विषयों और वास्तविक डिग्रियों का मेल ही नहीं था, कहीं सामान्य बीएससी को तकनीकी डिग्री की तरह स्वीकार किया गया, कहीं डिस्टेंस एजुकेशन से प्राप्त संदिग्ध डिग्रियों को मान्यता दी गई और कहीं ऐसे विषयों को पात्र मान लिया गया जिनका फ़ूड सेफ्टी से सीधा संबंध ही नहीं था,विभागीय गलियारों में अब व्यंग्य में कहा जा रहा है यहां फूड सेफ्टी ऑफिसर बनने के लिए फूड टेक्नोलॉजी नहीं,सही टेक्नोलॉजी चाहिए,एक अन्य कर्मचारी ने तंज कसते हुए कहा जो विभाग मिलावटी खाद्य पदार्थ पकड़ता है, वहां पहले मिलावटी डिग्रियां पकड़नी चाहिए।
स्थापना शाखा पर उठे सबसे बड़े सवाल
अब पूरा विवाद सिर्फ नियुक्ति पाने वालों पर नहीं, बल्कि उन अधिकारियों पर केंद्रित हो गया है जो स्थापना शाखा में बैठे रहे और जिन्होंने इन फाइलों को मंजूरी दी, क्योंकि कोई भी नियुक्ति अकेले नहीं होती, दस्तावेज जांचे जाते हैं,योग्यता सत्यापित होती है, नियमों से मिलान होता है,नोटशीट तैयार होती है, फिर आदेश जारी होता है,ऐसे में यदि अपात्र लोगों को नियुक्ति मिली,तो सवाल उन सभी पर उठते हैं जिन्होंने इन फाइलों को आगे बढ़ाया,विभागीय कर्मचारियों का आरोप है कि वर्षों तक इन मामलों पर पर्दा डाला गया। किसी ने निष्पक्ष जांच कराने का प्रयास नहीं किया। उल्टा संरक्षण दिया गया, एक कर्मचारी ने व्यंग्य में कहा यहां राजपत्र नहीं,स्थापना शाखा अंतिम सत्य है।
क्या पैसे लेकर बनाई गईं नई ‘योग्यताएं’?
सबसे गंभीर आरोप यही हैं कि कथित रूप से लेनदेन और प्रभाव के आधार पर पात्रता की ‘नई व्याख्या’ तैयार की गई,यानी राजपत्र में तकनीकी डिग्री मांगी गई, लेकिन विभागीय स्तर पर सामान्य डिग्री को भी ‘अनुकूल’ मान लिया गया,सूत्रों का दावा है जहां नियम अटकते थे, वहां नोटशीट रास्ता बना देती थी, यदि यह आरोप सही साबित होते हैं तो मामला सिर्फ प्रशासनिक त्रुटि नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार माना जाएगा।
धारा 94 और राज्य सरकार की भूमिका
इस पूरे विवाद में धारा 94 की भी चर्चा हो रही है,यह धारा राज्य सरकार को भर्ती नियम बनाने की शक्ति देती है, लेकिन कानूनी विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि राज्य सरकार भर्ती प्रक्रिया और प्रमोशन प्रतिशत तय कर सकती है,लेकिन केंद्र सरकार द्वारा तय न्यूनतम तकनीकी पात्रता समाप्त नहीं कर सकती,यानी राज्य भर्ती नियम बना सकता है,पर एफएसओ की मूल योग्यता नहीं बदल सकता।
2026 संशोधन ने क्यों बढ़ाई हलचल?-
5 मई 2026 को छत्तीसगढ़ शासन ने भर्ती नियमों में संशोधन किया, इस संशोधन में स्ष्द्धद्गस्रह्वद्यद्ग-ढ्ढढ्ढ के श्व3द्गष्ह्वह्लद्ब1द्ग वर्ग में भर्ती अनुपात ‘90′-10’’ से बदलकर ‘75′-25’’ किया गया, अब विभाग में यह चर्चा तेज है कि क्या इस बदलाव का उपयोग कुछ विशेष लोगों को प्रमोशन और लाभ देने के लिए किया गया? क्योंकि संशोधन के बाद पुराने विवाद फिर से चर्चा में आने लगे।
जनता के स्वास्थ्य से
जुड़ा सबसे बड़ा संकट

विडंबना देखिए जिस विभाग को जनता को मिलावटी खाद्य पदार्थों से बचाना था, वही विभाग अब ‘मिलावटी योग्यता’ के आरोपों में घिरा हुआ है, फूड सेफ्टी ऑफिसर कोई साधारण पद नहीं है, यही अधिकारी खाद्य पदार्थों के सैंपल लेते हैं, मिलावट की जांच करते हैं,लाइसेंस निरीक्षण करते हैं, जनता के स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं, ऐसे पदों पर यदि विवादित योग्यता वाले लोग बैठेंगे तो पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
विभाग के भीतर सबसे चर्चित व्यंग्य
विभाग में इन दिनों कई तीखे व्यंग्य चल रहे हैं, कोई कहता है यहां फूड टेस्ट से पहले डिग्री टेस्ट होना चाहिए, दूसरा बोलता है खाद्य विभाग में अब नियम नहीं, नेटवर्क काम करता है, और तीसरी लाइन सबसे ज्यादा सुनाई दे रही है राजपत्र जनता को दिखाने के लिए है,असली नियम फाइलों में बनते हैं।
क्या होगी निष्पक्ष जांच?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या इन नियुक्तियों और प्रमोशन की स्वतंत्र जांच होगी? क्या यह जांच होगी कि डिग्रियां वैध थीं या नहीं? यूजीसी मान्यता थी या नहीं? विषय एफएसएसएआई नियमों के अनुरूप थे या नहीं? स्थापना शाखा ने जानबूझकर नियमों की अनदेखी की या नहीं? भर्ती और प्रमोशन प्रक्रिया में कथित लेनदेन हुआ या नहीं? यदि निष्पक्ष जांच हुई तो विभाग के कई बड़े नाम मुश्किल में आ सकते हैं।
अंत में सबसे बड़ा सवाल
क्या छत्तीसगढ़ खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग में कानून चलता है या व्यवस्था ? क्योंकि यदि केंद्र सरकार का राजपत्र, एफएसएसएआई के नियम और तकनीकी पात्रता भी विभागीय सेटिंग के आगे घुटने टेक दें, तो फिर जनता कैसे भरोसा करे कि उसके खाने की सुरक्षा सही हाथों में है? फिलहाल विभाग के गलियारों में सबसे ज्यादा यही लाइन गूंज रही है यहां नियम नहीं, रिश्ता और व्यवस्था काम करती है।
सवालों के घेरे में ये नियुक्तियां

  1. सवेश यादव- आरोप है कि वर्ष 2016 में विनायक यूनिवर्सिटी, सेलम तमिलनाडु से डिस्टेंस एजुकेशन के माध्यम से एमएससी डिग्री प्राप्त की गई, अब सवाल यह है कि क्या उक्त डिग्री उस समय एफएसओ की तकनीकी पात्रता के अनुरूप थी?
  2. सिद्धार्थ पांडे- इनकी बी टेक बायोटेक्नोलॉजी डिग्री स्॥्रभ्स् इलाहाबाद से बताई जा रही है, विभागीय हलकों में चर्चा है कि यह मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा और डिग्री की वैधता तथा पात्रता को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ।
  3. दीपक दितलहार- आरोप है कि इनके पास केवल सामान्य बीएससी डिग्री थी जबकि बायोटेक्नोलॉजी जैसे विषयगत डिग्री नहीं थी, इसके बावजूद एफएसओ पद के लिए पात्रता कैसे तय की गई, यह सवाल बना हुआ है।
  4. संतोष ध्रुव- एमएससी केमिस्ट्री की डिग्री सीवी रमन यूनिवर्सिटी बिलासपुर से प्राप्त बताई गई,आरोप यह है कि संबंधित समय में डिस्टेंस लर्निंग की यूजीसी मान्यता को लेकर विवाद था।
  5. शंखनाथ भोई- एमएटी यूनिवर्सिटी से एमएससी केमिस्ट्री की डिग्री लेने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं,आरोप है कि जिस समय डिग्री ली गई,उस दौरान डिस्टेंस एजुकेशन की मान्यता साफ नहीं थी।
  6. शाश्वत तिवारी- बताया जा रहा है कि आवश्यक विषयगत योग्यता और प्रमोशन के लिए आवश्यक सीआर अवधि को लेकर भी सवाल हैं।
  7. रामप्रकाश जयसवाल- जनरल बीएससी डिग्री के बावजूद एफएसओ पात्रता दिए जाने को लेकर विभाग में चर्चाएं हैं।
  8. फणीभूषण जयसवाल- बीई इलेक्ट्रॉनिक्स और सामान्य बीएससी डिग्री के आधार पर एफएसओ पात्रता कैसे तय हुई, यह भी बड़ा सवाल बना हुआ है।

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