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कोरिया/सोनहत@हसदो की सिसकियाँ और मिटता वजूद.

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  • कंक्रीट के चमकते शहरों के नाम एक रूहानी वसीयत
  • अमृतधारा का और गौर घाट का भविष्य संकट मेंः क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को सूखी नदी विरासत में देंगे?
  • कॉरिडोर बनाने की मांग हुई तेज, नर्मदा नदी की तर्ज पर हसदो किनारे हो वृहद वृक्षारोपण
  • किनारे नो कंस्ट्रक्शन जोन और ट्री ट्रांसप्लांट जोन घोषित करने की मांग


राजन पाण्डेय
कोरिया/सोनहत,17 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)।
पंद्रह से बीस साल पहले की वो सुबह याद कीजिए, जब कटगोड़ी से दामुज तर्रा से बसेर के साथ अकलासरई से सोनहत के रास्तों पर सूरज की किरणें जमीन तलाशती थीं,जंगल इतने घने थे कि अकेले गुजरने में डर लगता था। आज डर तो नहीं लगता, पर टीस जरूर उठती है, आज उसी स्थान पर खड़े हो जाइए तो नजरें जंगल के पार चली जाती हैं,पेड़ नहीं बचे,बस खालीपन बचा है, अकलासराई से तर्रा और बसेर के बीच जहां से हलफली नदी जन्म लेती है,वहां कभी साल भर पानी का संगीत गूंजता था। आज विकास की ऐसी अंधी दौड़ चली कि नवंबर आते-आते यह नदी एक सूखे नाले में तब्दील हो जाती है।
हर दिन हो रही है 100 ‘भविष्य’ की हत्याएं
सुबह 9 बजे अगर आप इन रास्तों पर निकलें, तो दर्जनों लोग सिर पर लकडि़यों का गट्ठर लादे दिख जाएंगे,यह सिर्फ लकड़ी नहीं है,यह हसदो के आंचल से छीने गए वे पौधे हैं जिन्हें वृक्ष बनना था।
आंकड़ों का गणित खौफनाक है…
अगर 10 लोग भी रोज निकल रहे हैं,तो हम प्रतिदिन 100 पौधों की हत्या देख रहे हैं,साल भर में हजारों पेड़ धराशायी हो रहे हैं,ऊपर से कोयले की चाहत में मशीनें तर्रा बीट की छाती को छलनी कर रही हैं। यह अंधाधुंध ड्रिलिंग जल स्तर को पाताल में ले जा रही है।
उधार की सांसों पर टिकी है हसदो
विडंबना देखिए,जिस अमृतधारा महोत्सव को हम अपनी पहचान बताते हैं, उसकी मूल नदी हसदो आज खुद अपनी सांसों के लिए तड़प रही है, वर्तमान में हसदो का अस्तित्व बनिया नदी के दिए ‘उधार के जल’ पर टिका है, गौरघाट के वो पक्षी, वो पेड़ों की छांव अब केवल स्मृतियों में शेष हैं, मेण्ड्रा की पहाडि़यों से निकलने वाली हसदो ने कोरबा की प्यास बुझाई, वहां बिजली पैदा की, जांजगीर और रायगढ़ के खेतों को हरा-भरा किया, लेकिन अपने उद्गम स्थल कोरिया में वह आज ‘अनाथ’ सी खड़ी है।
अब नही जागे तो हो जाएगी देर
चिरमिरी की प्यास बुझाने वाली हसदो आज खुद प्यासी है। पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के सरकार समय चले लोक सुराज अभियान में क्षेत्र के युवाओं ने मुख्यमंत्री जनदर्शन में गुहार लगाकर एक इस मांग की शुरुवात किया था पर अफसोस उस समय लोगो ने इसकी गम्भीरता को नही समझा, दरअसल हसदो हमसे कुछ मांग नहीं रही, वह बस अपना खोया हुआ श्रृंगार (जंगल) वापस चाहती है।
कभी ठंडे मौसम के लिए जाना जाता था सोनहत क्षेत्र अब यहां भी गर्मी की मार
सोनहत की वह ठंडी तासीर अब बीते दौर की बात हो गई है, कभी जिस इलाके में गर्मियों के दिनों में भी शाम ढलते ही चादर ओढ़नी पड़ती थी, आज वहां सूरज की तपिश झुलसाने लगी है, घने जंगलों के कटने और हसदो की धारा सूखने का सीधा असर यहां के सूक्ष्म-जलवायु पर पड़ा है, आंकड़ों की बात न भी करें, तो स्थानीय अनुभव बताते हैं कि बीते दो दशकों में औसत तापमान में जो बढ़ोतरी हुई है,उसने सोनहत की पहचान ‘कोरिया के शिमला’ वाली छवि को लील लिया है। कंक्रीट के बढ़ते जाल और नग्न होती पहाडि़यों ने इस शांत वादी को ‘हीट आइलैंड’ में तब्दील करना शुरू कर दिया है।
एक संदेश प्रशासन के नाम-
हसदो को सिर्फ एक जल स्रोत मत समझिए, यह हमारी संस्कृति और जीवन का आधार है, नर्मदा की तर्ज पर हसदो के किनारों को भी हरा-भरा कीजिए,इससे पहले कि ‘अमृतधारा’ सिर्फ एक नाम रह जाए और इसकी धारा सूख जाए।
प्रशासन और समाज से कुछ चुभते सवाल
हसदो की इस दयनीय स्थिति को देखते हुए आज हर संवेदनशील नागरिक के मन में कुछ सवाल कौंध रहे हैं,क्या नर्मदा की तर्ज पर हसदो का पुनरुद्धार संभव नहीं? जब मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी के किनारों पर व्यापक पौधरोपण का अभियान चल सकता है,तो छत्तीसगढ़ की ऊर्जा दायिनी हसदो के लिए ऐसी कोई योजना क्यों नहीं? क्या प्रशासन हसदो और हलफली के किनारों को फिर से हरा-भरा करने का ब्लूप्रिंट तैयार नहीं कर सकता,कहां है हमारी जन-भागीदारी? क्या हम सिर्फ सरकार के भरोसे बैठे रहेंगे? क्या सोनहत और कोरिया का हर नागरिक अपनी इस नदी को बचाने के लिए एक ‘जन-आंदोलन’ खड़ा नहीं कर सकता? स्थानीय जिला प्रशासन और वन विभाग क्या हसदो को बचाने का सामूहिक संकल्प ले सकते हैं? विभागीय चुप्पी का अर्थ क्या है? पेड़ों की कटाई और अवैध रेत उत्खनन ने नदी का स्वरूप बिगाड़ दिया है, क्या वन विभाग और प्रशासन एक व्यापक अभियान चलाकर इन खाली हो चुके जंगलों में फलदार और छायादार वृक्ष नहीं लगा सकते?
तापमान में बदलाव का दिखने लगा असर
एक पेड़ का कटना केवल लकड़ी का नुकसान नहीं,बल्कि एक प्राकृतिक ऑक्सीजन प्लांट की तालाबंदी है,वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि एक पूर्ण विकसित पेड़ साल भर में इतनी ऑक्सीजन पैदा करता है कि दो वयस्क मनुष्य जीवित रह सकें,जब सोनहत के जंगलों में एक पेड़ गिरता है,तो हम प्रतिदिन औसतन 700 से 1000 लीटर ऑक्सीजन पैदा करने की क्षमता खो देते हैं,इतना ही नहीं,एक अकेला पेड़ अपनी वाष्पीकरण प्रक्रिया से 10 एयर कंडीशनर के बराबर ठंडक पैदा करता है; इसके कटते ही आसपास के स्थानीय तापमान में 2सेंटीग्रेड से 5सेंटीग्रेड तक की सीधी बढ़ोतरी दर्ज की जा सकती है। यानी हर गिरता पेड़ हमारे फेफड़ों से हवा और हमारे भविष्य से ठंडक छीन रहा है। ‘
ग्रीन हसदो कॉरिडोर का बने कॉन्सेप्ट-
हसदेव नदी के संरक्षण की दिशा में ‘हसदो कॉरिडोर’ का विचार एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरदर्शी कदम है,इस प्रस्ताव के तहत हसदेव नदी के उद्गम स्थल से लेकर अमृतधारा जलप्रपात तक, नदी के दोनों किनारों पर 500 मीटर के दायरे को ‘नो-कंस्ट्रक्शन जोन’ (निर्माण निषिद्ध क्षेत्र) और ‘ट्री-प्लांटेशन जोन’ (वृक्षारोपण क्षेत्र) घोषित करने की मांग की गई है, इस पहल का मुख्य उद्देश्य न केवल नदी के प्राकृतिक प्रवाह को अतिक्रमण से बचाना है,बल्कि व्यापक स्तर पर सघन वृक्षारोपण के माध्यम से स्थानीय जैव-विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करना भी है,यदि यह कॉरिडोर धरातल पर उतरता है, तो यह जल संरक्षण के साथ-साथ पर्यावरण संतुलन की दिशा में एक ‘ग्रीन मॉडल’ साबित होगा, जो आने वाली पीढि़यों के लिए इस जीवनदायिनी नदी को सुरक्षित रखेगा।


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