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सूरजपुर/भैयाथान@35.78 लाख गबन केस में बैंक की कार्रवाई शून्य,मगर घोटाले पर जवाबदेही अब भी सवालों में

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  • घोटाला हुआ या सिर्फ प्रक्रिया गलत थी? विभागीय आदेश रद्द होते ही सिस्टम पर उठे बड़े सवाल
  • जांच,एफआईआर,बर्खास्तगी ब हुआ बेअसर! न्यायालय के फैसले से सहकारी बैंकिंग तंत्र कटघरे में
  • घोटाले की रकम वही, बदल गई फाइल की लाइन — 35.78 लाख केस में आदेश शून्य, सवाल बरकरार
  • किसानों की बीमा राशि पर गबन का आरोप, कार्रवाई शून्य अब जिम्मेदार कौन?
  • 35.78 लाख फसल बीमा गबन मामला: बैंक की सेवा समाप्ति कार्रवाई शून्य, मगर घोटाले और जवाबदेही पर बड़े सवाल कायम

-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर/भैयाथान,13 फरवरी 2026 (घटती-घटना)।
जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित अंबिकापुर की भैयाथान शाखा में किसानों की फसल बीमा राशि से जुड़े कथित 35 लाख 78 हजार रुपये के गबन प्रकरण ने अब नया कानूनी और प्रशासनिक मोड़ ले लिया है,जिन चार कर्मचारियों के खिलाफ कलेक्टर स्तर की जांच, एफआईआर और बैंक की विभागीय कार्रवाई के बाद सेवा समाप्ति का आदेश जारी किया गया था,उसी कार्रवाई को न्यायालय संयुक्त पंजीयन सहकारी संस्था, सरगुजा संभाग अंबिकापुर ने 23 जनवरी 2026 को प्रक्रिया संबंधी त्रुटियों के आधार पर शून्य घोषित कर दिया,फैसले के बाद सहकारी बैंकिंग व्यवस्था,जांच प्रक्रिया और जवाबदेही को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
जांच से लेकर बर्खास्तगी तक की पूरी कहानी- जानकारी के अनुसार वर्ष 2019–20 में किसानों की फसल बीमा राशि के फर्जी आहरण की शिकायत सामने आने पर कलेक्टर सूरजपुर द्वारा जांच दल गठित किया गया था, जांच रिपोर्ट में शाखा प्रबंधक जगदीश कुशवाहा, लिपिक सूबेदार सिंह, संस्था प्रबंधक रामकुमार सिंह और कर्मचारी सुनील यादव के नाम सामने आए और लगभग 35.78 लाख रुपये की वित्तीय अनियमितता का उल्लेख किया गया,जांच के आधार पर बैंक प्रबंधन ने चारों कर्मचारियों को निलंबित किया, पुलिस में एफआईआर दर्ज कराई और प्राधिकृत अधिकारी व बोर्ड बैठक के निर्णय के बाद 5 जून 2023 को सेवा समाप्ति का आदेश जारी किया। आदेश में यह भी कहा गया था कि कथित गबन राशि की वसूली के लिए पृथक से विधिक कार्रवाई की जाएगी।
न्यायालय का फैसला: प्रक्रिया गलत, कार्रवाई शून्य- करीब तीन वर्ष बाद मामला संयुक्त पंजीयन न्यायालय पहुंचा, न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि विभागीय जांच के दौरान सेवा नियम 1982 और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पूर्ण पालन नहीं हुआ, आरोपों की स्पष्ट जिम्मेदारी तय नहीं की गई और जांच प्रक्रिया में संबंधित पक्ष को पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया, इसी आधार पर न्यायालय ने बैंक द्वारा की गई सेवा समाप्ति की कार्रवाई को शून्य घोषित कर दिया, हालांकि न्यायालय ने यह नहीं कहा कि घोटाला नहीं हुआ या कोई कर्मचारी पूरी तरह दोषमुक्त है, बल्कि केवल विभागीय प्रक्रिया को त्रुटिपूर्ण बताया और बैंक को नियमानुसार पुनः कार्रवाई करने की स्वतंत्रता भी दी।
अब उठ रहे हैं कई बड़े सवाल❓– फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि घोटाले की जांच कलेक्टर स्तर पर हुई, एफआईआर दर्ज हुई और बैंक ने बोर्ड बैठक में निर्णय लेकर सेवा समाप्ति की, तो फिर विभागीय कार्रवाई न्यायालय में टिक क्यों नहीं पाई? क्या जांच रिपोर्ट अधूरी थी या विभागीय प्रक्रिया कमजोर रही? यदि प्रक्रिया सही नहीं थी तो तीन साल तक कार्रवाई कैसे लागू रही? और अगर कार्रवाई मजबूत थी तो न्यायालय में बैंक अपना पक्ष प्रभावी ढंग से क्यों नहीं रख पाया?
सूत्रों के अनुसार यह चर्चा भी है कि बैंक की ओर से सभी साक्ष्य और तर्क उतनी मजबूती से प्रस्तुत नहीं किए गए, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
जेल की नौबत और जांच की विश्वसनीयता पर प्रश्न- मामले में पुलिस स्तर पर एफआईआर और कानूनी कार्रवाई होने के कारण यह सवाल भी उठ रहा है कि जब गिरफ्तारी और आपराधिक प्रक्रिया तक मामला पहुंचा, तो क्या प्रारंभिक जांच रिपोर्ट पर्याप्त नहीं थी? कानूनी जानकारों का कहना है कि विभागीय जांच और आपराधिक जांच दो अलग प्रक्रियाएं हैं, इसलिए विभागीय कार्रवाई शून्य होने का मतलब यह नहीं कि आपराधिक मामला खत्म हो गया है।
किसानों का हित – असली मुद्दा- पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा मुद्दा किसानों की फसल बीमा राशि का है, यदि कथित गबन हुआ था तो उसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी तय होगी और वसूली की प्रक्रिया किस दिशा में जाएगी? स्थानीय स्तर पर लोग सवाल कर रहे हैं कि हर बार सहकारी संस्थाओं में कार्रवाई प्रक्रिया की खामियों में उलझ जाती है, लेकिन किसानों को नुकसान का हिसाब कौन देगा।
राजनीतिक और प्रशासनिक चर्चा भी तेज- मामले को लेकर राजनीतिक हलकों में भी चर्चा है कि जिस कार्रवाई की शुरुआत पूर्ववर्ती सरकार के समय हुई थी, वही अब अलग राजनीतिक माहौल में कानूनी चुनौती का सामना कर रही है, हालांकि किसी भी पक्ष ने आधिकारिक तौर पर इसे राजनीतिक मामला नहीं बताया है।
दोषी कौन, जिम्मेदार कौन?- न्यायालय के आदेश ने एक बात साफ कर दी है कि विभागीय कार्रवाई नियमों के अनुरूप नहीं थी, लेकिन इससे घोटाले या आरोपों का स्वतः अंत नहीं हो जाता, अब निगाहें बैंक प्रबंधन और जांच एजेंसियों पर हैं कि वे आगे क्या कदम उठाते हैं — नई जांच, पुनः विभागीय कार्रवाई या केवल लंबित कानूनी प्रक्रिया का इंतजार, फिलहाल जनता और किसान दोनों यही पूछ रहे हैं —अगर घोटाला हुआ है तो जिम्मेदार कौन तय करेगा, और अगर प्रक्रिया ही गलत थी तो उस गलती की जवाबदेही किसकी होगी?


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