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कोरिया @माला,बैठक और महत्वाकांक्षा: क्या 25 लोगों ने तय कर दिया 25 हजार का भविष्य ?

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  • 25 हजार का समाजज्और 25 लोगों का फैसला! कोरिया में प्रतिनिधित्व या राजनीतिक रिहर्सल?
  • माला पहनते ही बन गए नेता? साहू समाज में ‘घोषणा राजनीति’ पर बड़ा सवाल
  • प्रदेश आदेश ठंडे बस्ते में, कोरिया में अलग ही चल रहा ‘संगठन मॉडल’
  • समाज सेवा या 2028 का टिकट प्लान? साहू समाज की सियासत गरमाई
  • बैठक छोटी, दावा बड़ा — कौन तय करेगा 25 हजार की आवाज?
  • प्रदेश से ऊपर कौन? कोरिया में अध्यक्ष घोषणा पर उठे तीखे सवाल
  • मालाओं की राजनीति या समाज का नेतृत्व? कोरिया में विवाद गहराया
  • आज अध्यक्ष कल टिकट? साहू समाज में बढ़ती राजनीतिक सुगबुगाहट
  • घोषणा सभा या टिकट लॉन्चिंग? साहू समाज की सियासत पर कटाक्ष
  • प्रदेश का पत्र हल्का या महत्वाकांक्षा भारी? कोरिया में उठे सवाल
  • माला, मंच और महत्वाकांक्षा — समाज की राजनीति का नया फार्मूला
  • जिसके पास माला ज्यादाज् वही नेता ज्यादा? साहू समाज में गरमा गई बहस
  • समाज का प्रतिनिधित्व या व्यक्तिगत ब्रांडिंग? कोरिया में सियासी खींचतान
  • समाज की ताकत या कुछ चेहरों की चाहत? कोरिया मॉडल पर सवाल


-रवि सिंह-
कोरिया,05 फरवरी 2026 (घटती-घटना)।
कभी समाज सेवा और संगठनात्मक मजबूती के लिए पहचाना जाने वाला साहू समाज इन दिनों कोरिया जिले में एक नए तरह के प्रयोग से गुजरता दिखाई दे रहा है,यहां समाज का प्रतिनिधित्व अब जनसमर्थन से नहीं, बल्कि सीमित बैठक और मालाओं की संख्या से तय होता नजर आ रहा है, सवाल यह है कि क्या सच में 25 हजार लोगों की आवाज सिर्फ 25 लोगों की बैठक में कैद हो सकती है, या फिर यह सब आने वाले विधानसभा चुनाव 2028 की टिकट राजनीति का ट्रायल रन है?
बता दे की कोरिया जिले में साहू समाज का अध्यक्ष विवाद अब केवल संगठनात्मक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि व्यंग्य, सवाल और राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र बन चुका है, प्रदेश साहू संघ के आदेश, स्थानीय बैठकों की घोषणाएं, प्रेस विज्ञप्तियों का दौर और अब पूर्व जिलाध्यक्ष मधुसूदन प्रसाद साहू की खुली आपत्ति-इन सबके बीच समाज के भीतर एक बड़ा सवाल गूंज रहा हैः आखिर 25 हजार लोगों का प्रतिनिधित्व क्या 25 लोगों की बैठक से तय होगा?
आदेश एक तरफ ऐलान दूसरी तरफ- 31 जनवरी 2026 को छत्तीसगढ़ प्रदेश साहू संघ के अध्यक्ष डॉ. नरेंद्र साहू द्वारा जारी पत्र में कोरिया जिले की पूर्व चुनाव प्रक्रिया को निरस्त कर नई समय-सारिणी घोषित की गई थी, आदेश में साफ लिखा गया था कि मतदाता सूची, नामांकन और अंतिम चुनाव प्रक्रिया प्रदेश की निगरानी में 25 फरवरी को होगी, लेकिन कोरिया में मानो अलग ही पटकथा लिखी गई, सीमित लोगों की बैठक हुई, माला पहनाई गई और अध्यक्ष की घोषणा कर दी गई, यहीं से समाज में व्यंग्य शुरू हुआ — “प्रदेश का आदेश फाइल में रह गया और माला मंच पर भारी पड़ गई।”
माला पहनते ही प्रतिनिधित्व?” — समाज में उठता व्यंग्य- समाज के भीतर अब सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि क्या नेतृत्व तय करने का नया फार्मूला यही है — पहले बैठक बुलाओ, फिर माला पहनाओ और घोषणा कर दो कि यही पूरे समाज का चेहरा है? लोग तंज कसते हुए कहते नजर आ रहे हैं —आज समाज का अध्यक्षज् कल पार्टी का प्रत्याशीज् और परसों विधायक का सपना, हालांकि इन चर्चाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस तेजी से राजनीतिक गलियारों में नाम उछल रहे हैं, उसने सवालों को और धार दे दी है।
माला पहनते ही बन गया प्रतिनिधित्व?- समाज के भीतर सबसे बड़ा व्यंग्य यही बन गया है कि प्रदेश के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद कुछ लोगों ने बैठक कर माला पहनाई और घोषणा कर दी — अब यही पूरे समाज का चेहरा है, अब लोग तंज कसते हुए पूछ रहे हैं — क्या समाज चलाने का नया फार्मूला यही है? पहले बैठक बुलाओ, फिर माला पहनाओ और अगले चुनाव में कहो — “हम ही 25 हजार लोगों के प्रतिनिधि हैं।”
प्रदेश आदेश या स्थानीय महत्वाकांक्षा?- 31 जनवरी 2026 को छत्तीसगढ़ प्रदेश साहू संघ के अध्यक्ष डॉ. नरेंद्र साहू द्वारा जारी पत्र में साफ कहा गया था कि चुनाव प्रक्रिया निरस्त होगी और नई व्यवस्था लागू की जाएगी, लेकिन कोरिया में मानो यह पत्र किसी फाइल का कागज भर रह गया, प्रदेश की लाइन एक तरफज् और स्थानीय घोषणा दूसरी तरफ, अब समाज में यही चर्चा है — क्या कोरिया जिला संगठन प्रदेश से ऊपर हो गया है या फिर कुछ लोग खुद को नियमों से भी बड़ा समझने लगे हैं?
प्रदेश से ऊपर कौन?” — सवाल जो पीछा नहीं छोड़ रहा- प्रदेश स्तर पर साफ लिखा गया था कि विवाद की स्थिति में अंतिम फैसला प्रदेश संगठन का होगा, इसके बावजूद अलग राह चुनने वालों ने न सिर्फ आदेशों को हल्के में लिया बल्कि समाज को दो हिस्सों में बांटने की जमीन भी तैयार कर दी, समाज के वरिष्ठ लोग अब खुलकर कह रहे हैं, यह अध्यक्ष पद की लड़ाई नहीं, अनुशासन बनाम महत्वाकांक्षा की लड़ाई है।
समाज सेवा या 2028 की टिकट की सीढ़ी?- कोरिया जिले की गलियों में सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि समाज का प्रतिनिधित्व अचानक इतना सक्रिय क्यों हो गया? क्यों अब माला, बैठक और पद की होड़ बढ़ गई? कई लोग इसे सीधा-सीधा राजनीतिक तैयारी बता रहे हैं — जहां समाज का मंच, सिर्फ एक लॉन्चिंग पैड बनता नजर आ रहा है, व्यंग्य में लोग कहते सुनाई दे रहे हैं —आज समाज का अध्यक्ष कल पार्टी का प्रत्याशीज् और परसों विधायक का सपना, हालांकि इन चर्चाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जिस तेजी से राजनीतिक गलियारों में नाम उछल रहे हैं, उसने सवालों को और तेज कर दिया है।
सीमित बैठक, बड़ा ऐलान — वैधता पर उठे सवाल- सूत्रों का दावा है कि जिस बैठक में अध्यक्ष होने की घोषणा की गई, उसमें समाज का व्यापक प्रतिनिधित्व नहीं था। विरोधी पक्ष इसे संगठनात्मक अनुशासन की खुली अवहेलना बता रहा है, समर्थक इसे “स्थानीय निर्णय” कहकर सही ठहराने में लगे हैं, लेकिन सवाल वही है, क्या समाज की आवाज भीड़ से तय होगी या कुछ चेहरों की सहमति से?
पत्र नहीं मानते” — चर्चा या चुनौती?- अंदरखाने यह भी चर्चा है कि प्रदेश अध्यक्ष के पत्र को मानने से इंकार किया गया। यदि यह बात सच साबित होती है, तो यह सिर्फ एक बयान नहीं बल्कि संगठन के इतिहास की सबसे बड़ी चुनौती मानी जाएगी, फिलहाल इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन समाज के व्हाट्सऐप ग्रुप से लेकर बैठकों तक यही मुद्दा सबसे ज्यादा गर्म है।
अब प्रदेश नेतृत्व की अग्निपरीक्षा- पूरा विवाद अब प्रदेश साहू संघ के अगले कदम पर टिका हुआ है। अगर इस पर सख्त और स्पष्ट फैसला नहीं आया तो आने वाले समय में हर जिला अपनी-अपनी “घोषणा सभा” कर सकता है, और तब शायद समाज की राजनीति में नया ट्रेंड शुरू हो जाए — “जिसके पास माला ज्यादा, वही नेता ज्यादा।”
समाज चाहता है नेतृत्वज् रणनीति नहीं- साहू समाज का बड़ा वर्ग अब भी ऐसा नेतृत्व चाहता है जो समाज को दिशा दे, हितों की रक्षा करे और संगठन को मजबूत बनाए। लेकिन अगर प्रतिनिधित्व व्यक्तिगत राजनीतिक सपनों की सीढ़ी बन गया, तो समाज का असली उद्देश्य कहीं पीछे छूट जाएगा।
मधुसूदन साहू की एंट्री से विवाद और गरमाया- पूर्व जिला अध्यक्ष मधुसूदन प्रसाद साहू ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर जगदीश साहू के चुनाव को अवैधानिक बताते हुए कहा कि बिना वैधानिक प्रक्रिया और सार्वजनिक सूचना के अध्यक्ष घोषित करना नियमों के खिलाफ है, उन्होंने यह भी कहा कि प्रदेश संगठन के आदेश के रहते किसी भी तरह की घोषणा समाज के हजारों सदस्यों के अधिकारों को नजरअंदाज करने जैसा है। प्रेस नोट में अधिवक्ताओं के हस्ताक्षर शामिल होने से मामला अब कानूनी बहस की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है।
प्रदेश से ऊपर कौन?– प्रदेश साहू संघ के पत्र में स्पष्ट लिखा गया था कि किसी भी विवाद की स्थिति में प्रदेश स्तर का निर्णय अंतिम होगा। इसके बावजूद अलग राह चुनने वालों ने समाज को दो हिस्सों में बांटने की जमीन तैयार कर दी है, वरिष्ठ सदस्यों का कहना है कि यह सिर्फ अध्यक्ष पद की लड़ाई नहीं, बल्कि अनुशासन बनाम महत्वाकांक्षा की जंग बनती जा रही है।
प्रदेश नेतृत्व की अग्निपरीक्षा- पूरा मामला अब प्रदेश साहू संघ के अगले कदम पर टिक गया है, यदि इस विवाद पर सख्त और स्पष्ट फैसला नहीं आया तो आने वाले समय में हर जिला अपनी-अपनी “घोषणा सभा” करने लगेगा, और तब शायद नया ट्रेंड बन जाए — “जिसके पास माला ज्यादाज् वही नेता ज्यादा।”


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