Breaking News

लेख@अंतरराष्ट्रीय सहकारिता दिवस बेअसर-सहकारिता को उखाड़ फेकने वाले भ्रष्ट अधिकारियों ने थाम रखी है बागडोर

Share


सहकारिता के माध्यम से एक बेहतर विश्व का निर्माण किये जाने का लक्ष्य लिए वर्तमान में 1 जुलाई से 6 जुलाई तक अन्तरराष्ट्रीय सहकारिता दिवस मनाकर पुरे देश में सहकारिता के उद्देश्य पर राजनेताओं और अधिकारीयों ने बढ़चढ़ बात प्रचार-प्रसार कर अख़बारों में फ़र्जी आंकड़ों से स्यँव को महिमामंडित करने की ओपचारिकता का निर्वहन किया जा रहा है,जबकि मध्‍यप्रदेश सरकार 11 वर्षों से सहकारिता के चुनाव न कराकर सम्पूर्ण जिम्मेदारी अपने अधीनस्थ सहकारिता विभाग के भ्रष्ट अधिकारिओं के जिम्मे कर चुकी है जिसका लाभ उठाकर अधिकारी मालामाल है और प्रदेश में सहकारिता में भ्रष्‍टाचार के चरम पर होने से अंतिम सांसे ले रही है। पूरा प्रदेश इस समय भ्रष्ट सहकारिता के अधिकारियों के जिम्मे है,अगर नर्मदापुरम की बात की जाए तो हाल ही में सहकारिता के सयुंक्त आयुक्त के के द्विदी जो पूर्व में गुना के सहकारिता उपायुक्त के रूप में समिति प्रबंधक शंकर हरि रघुवंशी से एक लाख रूपये की रिश्वत लेते लोकायुक्त ग्वालियर ने पकड़ा था वे पूर्व में वर्ष 2010 से पूर्व होशंगाबाद में उप रजिस्ट्रार सहकारी संस्थायें रहे के द्वारा धारा- 64 में 35 प्रकरणों में 28 करोड़ 44 लाख 33 हजार 388 रूपये एवं धारा-68 बी के 88 प्रकरणों में आरोपित 308 कर्मचारियों के विरूद्ध अधिरोपित राशि 5 करोड़ 94 लाख 76 हजार 868 के दोषपूर्ण निराकरण से संस्थाओं को हानि पहुंचाकर सहकारिता के उद्देश्य को समाप्त कर अपने चुके है। सहकारिता में षड्यंत्र के लिए इनके द्वारा होशंगाबाद-हरदा जिले की सहकारी समितियों में निरीक्षकों/अंकेक्षकों द्वारा की किये गये अंकेक्षण जाँच के आधार पर धारा-64 में 26 करोड़ 44 लाख 44 हजार 388 रूपये एवं चारा-58 बी के 89 प्रकरणों में 308 समिति कर्मचारियों पर 5 करोड़ 94 लाख 75 हजार 868 रूपये की गबन धोखाधड़ी सहित आर्थिक अनियमितताओं का प्रतिवेदन प्रस्तुत करने पर प्रकरणों को पंजीवद्ध करके कर्मचारियों को आरोपी बनाकर 3-4 वर्षों तक सुनवाई कर लगभग 90 प्रकरणों में नस्तीबद्ध / खारिज की कार्यवाही की जाकर जमकर लेनदेन किया और समितियों को इसकी नुकसानी उठानी पड़ी,अब मुंग खरीदी और गेहूं खरीदी में भ्रष्टाचार की नई इबारत लिखकर अब ये सरकार को सहकारिता का गला घोटने का कर्तव्य दिखाकर सहकारिता के गले पर छुरी चलाते मौज करेंगे।
देखा जाए तो प्रदेश के हर जिले में इनके जैसे भ्रष्ट अधिकारी है,जिन्हें सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग का संरक्षण मिला है यही कारण है कि हर जिले में काम करने वाली सहकारी समितियां हो या उचित मूल्य पर राशन दुकान चलाने वाली संस्था,हर जगह भ्रष्टाचार व्याप्त है। पूर्व के वर्षों में अधिकांश जगह देखा गया है सहकारिता विभाग के प्रमुख सचिव से लेकर पंजीयक पदेन आयुक्त सभी की सांठगांठ से नियमों एवं अधिनियम को ताक पर रखकर लिये गये निर्णयों से अनेक जिलों की समितियों के डिफाल्टर होने के बावजूद वहां से चयनित प्रतिनिधि बैंक संचालक बन जाता है। ऐसे चयनित अथवा निर्वाचित बैंक प्रतिनिधि डिफाल्टर होते हुये राजनीतिक संरक्षण के कारण सत्ता हथियाने के लिए षड्यंत्र रचकर संस्थाओं के अध्यक्ष से लेकर जिला बैंकों के अध्यक्ष तक बन जाते है जिसे सभी का समर्थन प्राप्त होता है। अगर साक्ष्यों के साथ ऐसे डिफाल्टर प्रतिनिधि या संस्था की शिकायत की जाती है तब राजनीतिक दबाव के रहते पंजीयक पदेन आयुक्‍त से लेकर संयुक्‍त आयुक्त तक जांच के नाम पर उसका पाँच साल का कार्यकाल निकाल देंने के बाद निर्णय देंगे जिसमें शिकायत में वे डिफाल्टर या अपात्र हो जाये तो उनकी शिकायत के बाद अपात्र होने के निर्णय तक लिये गये किसी भी निर्णय या कार्यवाही को शून्य घोषित किये जाने की अपेक्षा विधिक मान्यता दी जाकर सहकारिता में यह भ्रष्‍टाचार विकराल रूप ले चुका है। मध्य प्रदेश के सहकारी अधिनियम में राज्य सरकार सीधे संशोधन की अधिकारिता रखती है और इसलिए इस सरकार ने अनेक संशोधन किये फिर भी सहकारिता का विस्तार जिस गति से होना चाहिए नहीं हुआ और न ही मध्य प्रदेश में सहकारी आन्दोलन जनता के बीच अपना विश्वास जमा पाया। सहकारी संस्थाओं की स्थापना का उददेश्‍य ही यही है कि समाज के ऐसे लोग जिनके पास साधनों का अभाव होता है, अपने परिवार के दायित्वों की पूर्ति हेतु मिलजुल कर व्यापार करना चाहते है, ऐसे सभी कृषक और मजदूर वर्ग के उत्थान सहकारी संस्‍थाओं से जुड़कर कार्य की शुरुआत कर सकते है। सहकारिता संस्थाओं में छोटे,बड़े अमीर गरीब का,कोई भेदभाव को स्थान नहीं हैं और न ही ऐसी संस्थाऍं‍व्यापार व सेवा मान के मिश्रण की संस्था है इसका उद्देश्य अधिक लाभ कमाना नहीं है ऐसी संस्थाओं का उद्देश्य समाज को शोषण से बचाने तथा उनके अधिनियम के तहत नैतिकता व सहज एवं प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त का पालन कर सबके लिये अनिवार्यतया लागू हो तथा जिन अधिकारियों को सहकारी अधिनियम की पालना का दायित्व है उनका आचरण आतंक का न होकर, मार्गदर्शक एवं सहायक का होना चाहिये जिसका आज अभाव है। समर्थन मूल्य पर उपज खरीदी में खरीदी केन्द्रों को आवंटित करने के लिए बोलिया लगाई जाकर उपायुक्त सहकारिता, उपसंचालक कृषि आदि करोड़ों रूपये नर्मदापुरम में कमा रहे है, अरबों रुपयों की मूंग,गेहू और धान रिजेक्ट होने के बाद सरकार को चुना लग चूका है किन्तु जिम्मेदारी जिनपर है वे ही सर्वेसर्वा होने से हर वर्ष अरबों रूपये भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है और समितिओं में ताला लगने की नोबत आ गई,जिससे निपटने के लिए इन अधिकारियों ने स्वसहायता समूहों को खरीदी का काम दे रखा है जबकि उनके पास खाते में हजार रूपये नहीं वे अरबों रूपये की खरीदी कर करोड़ों का कमीशन पाने के बाद आज भी वे समूह लखपति नहीं हो सके है, यह सब चौकाने वाले तथ्य है।
भारत में ही नही अपितु सहकारिता समूचे विश्व में व्याप्त है। हमारे देश में स्वतंत्रता के पूर्व सन् 1894 में सहकारिता का प्रादुर्भाव हुआ जिसमें मूलत: किसानों को साहूकारी प्रथा से मुक्त कराना उद्देश्य रहा है। सहकारिता का अर्थ ही सहकारी से बना है याने सहयोग से किया जाने वाला कार्य सहकारी है। इस सहकारी क्षेत्र में बहुत बड़े उथल-पुथल हुए अधिनियम बनाए गये उनमे निरंतर संशोधन होते रहे है और हो रहे है। किन्तु वास्तविकता के आधार पर देखा जाये तो सहकारिता का ह्रास हुआ है। इसका मुख्य कारण आज सरकार ने सहकारिता को केवल मात्र बडे बडे किसान सम्मेलन, राजनीतिक सभाओं में शक्ति प्रदर्शन के लिये भीड जुटाने में अपना स्वार्थ निकालना व राजनीतिक लाभ प्राप्त करने तक सीमित रखा है। हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री
महोदय माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी ने अपने शासन काल में प्रदेश के समस्त मुख्यमंत्री महोदय के सम्मेलन में 25 अगस्त को उद्बोधन दिया था कि सहकारी संस्थाओं से राजनीति और नौकरशाहों को दूर किया जाये। उन्होंने इस सामाजिक आन्दोलन में भ्रष्ट लोगों को घुसपैठ की चर्चा की तथा सहकारी क्षेत्र में बेहतर अभि शासन प्रतिमानों की स्थापना तथा सख्ती के साथ अमल करने की जरूरत बताई। तत्कालीन माननीय प्रधानमंत्री श्री वाजपेई जी ने कहा कि देश कई भागों में सहकारिता को राजनीतिक शक्ति के रूप में उपयोग किया जाता है,सहकारी चुनाव राजनीतिक दलों तथा व्यक्तियों में दुश्मनी के अखाड़े के रूप में सामने आते है सहकारी संस्थाओं में अनियमितता, डूबते कार्यो,कर्जो तथा बड़ती हानि का आकार,भ्रष्टाचार, पक्षपात के कारण आम जनता तथा सदस्यों के विश्वास को डिगाते है ऐसे उद्बोधन से सहकारिता के क्षेत्र को एक नई दिशा दी किन्तु उनका उदबोधन उनके तक ही सीमित रहा है।
भारत में सहकारी संस्थाओं की स्थापना भारतीय सहकारी समिति अधिनियम 1912 के अधीन हुई है और देश के स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले से चल रहा सहकारिता आन्दोलन आज विराट रूप धारण कर चुका है और देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इसके चलते देशवासी आर्थिक रूप से समृद्ध तो हुए ही है साथ बेरोजगारी की समस्या भी बहुत हद तक कम हुई है। भारत में सहकारिता की यह निश्चित व्याख्या सन 1904 में अंग्रेजों ने कानून बनाकर की थी। कानून बनने के बाद अनेक पंजीकृत संस्थाओं इस क्षेत्र में उतरी। सहकारिता में समाज हित को देखते हुए सरकार के प्रयास से सहकारी संस्थाओं की संख्या में वृद्धि हुई, लेकिन सहकारिता का जो मूल तत्व था वह धीरे-धीरे समाप्त हो गया। सहकारी संस्थाओं में दलीय राजनीति हावी होने लगी। हर जगत लोभ एवं भ्रष्टाचार का बोलबाला हो गया। समितियों के सदस्य निष्कि्रय होते चले गये और सहकारी हस्तक्षेप बढ़ता गया। सहकारिता की इस पृष्ठभूमि, सहकारिता को स्वतंत्रता देने की मांग तथा सहकारिता आन्दोलन को बनाने के लिए सरकार भारतीय अस्तित्व में आई जो सहकारिता के उद्देश्य को जन जन तक पहुंचाने का कार्य कर रही है। वर्तमान में देश मे लगभग 5 लाख से अधिक सहकारी संस्थाएं सक्रिय है जिसमे करोड़ो लोगों को रोजगार मिल रहा है समितियां समाज जीवन के अनेक क्षेत्र में काम कर रही है, लेकिन कृषि,उर्वरक और दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में इनकी भागीदारी अधिक है। अब तो बैंकिंग क्षेत्र में सहकारी समितियों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। लेकिन देश में सहकारी आंदोलन का राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति का साधन बनाकर अनेक विसंगतियों के जाल मे
फंसा दिया गया है। सन् 2003 के आंकड़ों से यह ज्ञात हुआ कि इस सहकारी ढांचे का घाटा 10,000 करोड़ (दस हजार करोड़) के ऊपर जा रहा है। इससे यह बात समाने आयी कि यह त्रिस्तरीय रचना डूबने की कगार पर है जिसको बचाने के लिए केन्द्र सन ने प्रो. बैधनाध की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया। इस वैधनाथन कमेटी ने समस्त पहलुओं का अध्ययन कर वर्ष 2005 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिये कि-1. पूरी संरचना में हिसाब की एक पद्धति हो। 2. प्रत्येक समितियॉ, बैकें पूरी तरह संगणीकृत हो। 3. हिसाब पद्धति तथा (एम आई एस) का प्रशिक्षण दिया जाए। 4. आर्थिक दृष्टि से प्रत्येक स्तर स्‍वतंत्र हो। एवं 5. प्रशासनिक दृष्टि से भी प्रत्येक स्तर पर समितियां स्‍वतंत्र हो।
राज्य सरकार को चाहिये कि वह इन समितियों के पंजीयन के बाद इनका समय पर निर्वाचन कराये। यदि समितियों को लगातार 3 साल घाटा हुआ,अथवा कोई भ्रष्टाचार का गंभीर मामला हो अथवा गणपूर्ति न हो तो समिति को स्थगित करे। जिला सहकारी बैंकें भी स्वायत्तता हो, मगर शासन का एक प्रतिनिधि कार्यकारी मंडल में हो, और बैंकों का कार्य रिजर्व बैंक के निर्देशानुसार चले। इसके लिए राज्य सरकार को अपने कानून में एमओयू के तहत संशोधन करना आवश्यक रहे। मध्यप्रदेश को 1797 करोड़ रुपये की मदद देने की वैधनाथन कमेटी ने सिफारिश की है जिसके आधार पर मप्र सरकार ने एक एमओयू पर हस्ताक्षर किये व प्राप्त पैकेज का लाभ लिया है किन्तु वैधनाथन कमेटी की सिफारिशों पर ध्यान नहीं दिया गया । प्रदेश सरकार का यह कार्य सहकारिता के क्षेत्र में अनुचित कार्य है एवं मध्यप्रदेश शासन ने पैकेज की राशि प्राप्त कर केन्द्र शासन के साथ वादाखिलाफी की है व एमओयू पर हस्ताक्षर कर धोखाधडी कर सहकारिता को गंभीर क्षति पहुंचाई है। यही कारण है कि प्रदेश की सहकारी बैंक व समितियां आज भी घाटे से नहीं उबर पायी है और इन समितियों में भ्रष्टाचार बढ़ता चला जा रहा है। भ्रष्टाचार की शिकायतों पर निजी स्वार्थवश ध्यान नहीं दिया जा रहा है। मध्य प्रदेश सरकार सहकारिता में भ्रष्टाचार फैलाकर सत्ता हथियाना चाहती है।


आत्माराम यादव पीव
ग्वालटोली नर्मदापुरम
मध्यप्रदेश


Share

Check Also

लेख@कोचिंग संस्कृति के चौराहे पर शिक्षा

Share शिक्षा नहीं,ब्रांड बिक रहे हैं… भारत में शिक्षा को सदियों से ज्ञान, संस्कार और …

Leave a Reply