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कविता @ कैसा लगा है रोग …

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रिश्तों का खेले खेल इंसान लगाकर घृणित दाव,
कलयुग जमा रहा है देखो धीरे-धीरे अपने पॉंव,
शर्मशार हो रही आज मर्यादाएं खौंफ रहा न कोई,
मानवता कुछ इंसानों में आजकल एकदम है सोई ।
कोई दौलत के खातिर रोक रहा अंतिम संस्कार,
कहीं प्रेम चकव्यूह में किसी ने भूले सारे संस्कार,
गुड़े गुडç¸यों का खेल हुआ सात जन्मों का बंधन,
कागज के टुकड़ों तक सीमित हुआ एकल जीवन ।
अपराध करने में तनिक भी नहीं झिझकते लोग,
अज्ञानी स्वार्थ आनंद चकाचौंध का लगा है रोग,
कमजोर पड़ रही है अब पैतृक संस्कारों की नींव,
रोज अनेक नई दर्दनाक खबरें उड़ा देती है नींद ।
क्या जाने कितने कहॉं कहॉं छुपे बैठे है हैवान,
गाजर मूली के जैसे अंधाधुंध कट रहे हैं इंसान,
गैरों से कैसी उम्मीद भरोसा तोड़ रहे हैं अपने,
प्रेम जाल मोह आसक्ति के ख़तरनाक ये सपने ।
तीव्रता से बढ़ें जा रहा घिनौना अपराधिक श्राप,
मुखौटा लगा कर धोखा दे रहे आस्तीन के सॉंप,
लोक लाज संस्कार छोड़ करें एक प्रेम की सवारी,
आत्मघाती कदम चातुर्य कलयुगी बुद्धि व मक्कारी ।
दिल दहलाने वाले हादसे किस ओर जा रहा मानव,
नर हो या नारी घात लगाएं बैठा है भीतर का दानव,
मैला कर दिया मॉं की ममता व स्त्रीत्व का सम्मान,
कलंकित की कलियुग की नारी ने पत्नी की पहचान ।
रिश्तों का मज़ाक बढ़ा रहा है समाजिक चिंताएं,
जल रही है न जाने देखो कितनी बेकसूर चिताएं,
सोचो कैसे मिलेगी आगे मददगार भरोसे की सीढ़ी,
लगाम कसो वरना खोखली हो जाएगी नई पीढ़ी ।


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