
आजादी के बाद भारत सरकार ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के स्थान पर राजभाषा घोषित कर संसद में 15 वर्षों में अंगेजी के स्थान पर हिन्दी का स्थान लिए जाने की बात कर विधान की धारा 351 के अनुसार सभी सरकारों पर हिन्दी ओर देवनागरी लिपि को विशेष प्रकार से उन्नयन करने का दायित्व लेने के बाद आज तक हिन्दी को उपेक्षित रखा है। जबकि तत्समय हिन्दी की गिनतियों में अनेक प्रकार की जटिलताओं को दूर कर गिनती को सरल ओर सहज बनाने के लिए परिवर्तन, संशोधन ओर परिवर्द्धनो के सुझाव भी हिन्दी सम्मेलनों के द्वारा रखे गए थे जिसमें अंग्रेजी ओर संस्कृत भाषा की गिनतियाँ को आधार मानकर हिन्दी वर्णमाला की गिनतियों को समक्ष रखकर हिन्दी के धुरंधर एवं सुधारवादी विद्वानों के उस दिशा में सतत् प्रयत्नशील सुझावों को स्थान देना था। 16 जुलाई 1951 आषाढ़ की प्रतिपदा को प्रयाग में देश के मूर्धन्य साहित्यकारों- लेखकों ओर हिन्दी के मर्म विशेषज्ञों को लेकर हिन्दी सम्मेलन में तत्समय के डॉ॰एपी चतुर्वेदी, एमडी एमएसएच साहित्यरत्न के द्वारा हिन्दी गिनती को सरल बनाने के लिए प्रस्तुत सुझावों को सभी ने स्वीकारा था जो सुधार हेतु भारत सरकार के पास भेजा गया किन्तु तत्समय के विषय को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने वाले जिम्मेदारों ओर राष्ट्र के शिक्षा मंत्री के संज्ञान में लिए बिना इसे विस्मरण कर दिया गया ओर तब से अब तक हिन्दी की गिनती जो हम सभी के लिए सहज ओर सरल होनी थी,उसका लाभ से वंचित होने से यह गिनती अब तक जटिल बनी रही,जिसे सुधारा जाकर सरल बनाने से आने बाली पीçढ़यों को इसकी उपयोग लाभप्रद होगा जिससे इन्हे वंचित नही किया जाना चाहिए।
हिन्दी की इन गिनतियों को बीते 8 दसक से जो शिशु-वर्ग के विद्याथियों के सम्मुख सुधार के बाद सहज ओर सरल रूप से पढ़ाया जा सकता था किन्तु दुर्भाग्य ही कहिए कि इसके लाभ से दो-तीन पीçढ़या वंचित रह चुकी है, परिणाम स्वरूप तब से अब यह हिन्दी गिनती सभी के लिए जटिल समस्या बन कर शिशुओं-बच्चो के कोमल मस्तिष्क के लिए एक भारी बोझ बनी, जिसे उन्होने स्वीकारा ओर सीखा। अगर देश की हिन्दी अकादमी जैसे अनेक संस्थाए जो हिन्दी को पोषित ओर संरक्षित करने पर अब तक करोड़ों रुपए खर्च कर चुकी है वे हिन्दी के शोध को महत्व देकर इन त्रुटियों की ओर गंभीरता से ध्यान देती तो हिन्दी की गिनतियो को सुधारा जाकर इन गिनतियों को सहज बोधगम्य बनाया जाकर इसका ज्ञान विस्तारित किया जा सकता था, जिसके अभाव में अब तक जो अध्यापक मार-मार कर गिनती पहाड़े रटाते रहे,उससे राहत मिल सकती थी,जो नहीं मिली है, अगर यह हमारे समक्ष उजागर हुई ही तो क्यों न हम इसमें सुधार कर इसे सार्वजनिक मान्यता देकर स्वीकार कर हिन्दी का मान सम्मान को प्राथमिकता से अंगीकार करे।
आप हो या हम सभी ने अपने छात्र जीवन में कक्षा आठवी ओर उसके आगे की कक्षाओं में तथा उसके बाद आज भी हिन्दी की गिनती के इन अंकों 69,59 ,89, 79 आदि गिनती का अन्तर नही समझ पाते और अधिकांश चूक कर बैठते है ओर 59 का 69 कहने की गलती करते है ठीक उसी प्रकार 59 को 69 कहने की गलती के अलावा 79 को 89 या 69 को 56 ओर 89 को 79 कहने की गलतिया दोहराई जाती है। जबकि संस्कृत ओर अंग्रेजी भाषा की गिनतियों की ज्यादा दिमाग पच्चीसी किए बिना कम समय में ओर रुचि लेकर इसे सभी लोग आसानी से सीख लेते है। आपको मेरी बातें भले मूर्खतापूर्ण लगे किन्तु यह आपको चिंतन करना ही है की दो भाषाओं को छोड़ हिन्दी की गिनतिया क्या इन दोनों भाषाओं की तुलना में कठिनाईपूर्ण ओर जटिल नहीं है ओर क्या इसमें भ्रम की स्थिति निर्मित होने से उसे समझने में समय लगने के साथ मन की लिए उलझाव जैसे स्थिति निर्मित नहीं होती है। आइए इनका विवेचन हेतु सूक्ष्मता को समझे ओर इसकी जटिलता ओर सरलता के भेद को जाने।
अँग्रेजी ओर देवनागरी हिन्दी की गिनती के दहाई अंक का अंतर
पहले हम आंग्लभाषा/अंग्रेजी ओर देवनागरी हिन्दी की तुलना कर अध्ययन करें तो एक से लेकर दस तक अर्थात दहाई के अंक तक की गिनती पर ध्यान दे तो ये दोनों भाषाओ की गिनती समान रूप में चलती है,जिसमें गिनती पढ़ने वालों के समक्ष केवल नामकरण मात्र का अन्तर दिखाई देता है। जब दहाई के साथ इकाइयाँ मिलती है, तब उनके नाम-करण में परिवर्तित होता दिखाई देता है मात्र 10 के बाद की दो गिनतिया 11 ओर 12 हिन्दी में नियमानुसार पायी जाती है। ग्यारह (एकादश) दस और एक के योग (10+1= 11) से बनता है, इसके नामकरण का वही नियम है जो कि आगे की गिनतियो का परिणाम होगा। हिन्दी में दहाई सूचक अंक बायी ओर तथा इकाई सूचक अंक दायी ओर लिखा जाता है, किन्तु पढ़ते समय इकाई का उच्चारण पहले और दहाई का उच्चारण बाद में होता है,जैसे एकादस या ग्यारह में एक अर्थात् इकाई का उच्चारण पहले और दश या दहाई का रह जो दश का ही अपभ्रश है, का उच्चारण बाद में होता है। उसी प्रकार आगे दहाई के साथ जब ओर इकाइया जा कर मिलती है, तब भी उनके नामकरण में यही नियम कार्य करता है।
उपर्युक्त परिवर्तित या विकृत रूपों का व्यवहार सरलता के ध्यान में किया गया है। ग्यारह, इक + रह अर्थात् एक और दस का योग = ग्यारह जिसमें एक+दस में रह दस का विकृत रूप है। बारह=बा+रह अर्थात् दो और रह या दस का योग=बारह,तेरह=ते+रह अर्थात् तीन और दस का योग=तेरह, चौदह चौ+रह अर्थात चार ओर दस का योग चौदह,यही क्रम आगे भी जारी रहता है। यह हम हिन्दी गिनती पर ध्यानकर्षण चाह रहे थे अब अँग्रेजी गिनती की बात कर दुबारा आगे हिन्दी गिनती के क्रम पर बात की जायेगी। अब अँग्रेजी गिनती पर ध्यान दीजिये। हिन्दी के ग्यारह ओर बारह यौगिक है इनका अर्थ समझ लेने पर इन दोनों का स्वरूप समझ आ जाता है कि बारह में रह का संकेत दस ओर दो के योग स्वरूप बारह को अवश्य लिखा जा सकता है किन्तु अँग्रेजी में श्वद्यद्ग1द्गठ्ठ एलेवन तो भ्2द्गद्य1द्ग ट्वेल के विषय में समझने जैसा कुछ भी नहीं है बल्कि उसे याद करना पड़ता है बिना रटे कोई ओर चारा नजर नहीं आता है। अँग्रेजी के ये शब्द एलेवन ओर ट्वेल एक परंपरागत रूçढ़वादी शब्द है इसे ग्रहण करना होता है। 12 के बाद हिन्दी ओर अँग्रेजी कि गिनती समान रूप से चलती है ओर अँग्रेजी कि गिनती में भी इकाई का नाम पहले ओर दहाई का नाम बाद में संबोधित किया जाता है। जैसे तेरह-थर्टीन 3+13,चौदह—फॉरटीन 4+10,पन्द्रह-फिफ्टीन,5+10, सोलह-सिकस्टीन6+10,सत्रह-सेवेंटीन 7+10,अठारह-एटटीन 8+10, उन्नीस नाइनटीन 9+10 ओर बीस-ट्वन्टी। यहा ध्यान देने वाली बात यह है कि 13 से 19 तक इन दोनों भाषाओं की गिनती एक ही नियम पर समान चलती है, किन्तु उन्नीस के बाद इन गिनतियों के रास्ते अलग अलग हो जाते है।
अग्रेजी में जब दहाई के साथ 9 नामक इकाई मिलती है, तब उसका नामकरण उसी नियम के अनुसार होता है जैसा कि अन्य इकाइयों के संयोग पर हुआ करता है। हिन्दी मे 9 अंक जब किसी दहाई से मिलता है तब इसका नाम आगामी दहाई 10+9=उन्नीस होकर उन शब्द लग जाता है। देंखे -20+9= उनतीस अर्थात तीस मेँ एककम,30+9=उनतालीस अर्थात चालीस मेँ एक कम (जिसे त्रुटिवश ऊंचालीस भी प्रयोग करते है) 40+9= उनचास अर्थात आगामी सख्या 50 में 1 कम कम, 50+9= उनसठ अर्थात् आगामी संख्या 60 में1कम, 60+9=उनहत्तर अर्थात् आगामी संख्या 70 में 1 कम,70+9= उन्नासी-आगामी सख्या 80 में 1 कम, इन अंकों का प्रयोग एक नियम से किया गया है किन्तु यह नियम आगे दिखाई नही देता है जैसे ही 80+9=नवासी ओर 90+9=निन्यानवे ये दो अंको के योग में यह अपवाद रूप में खड़ा होता है ओर इनसे मेल नहीं खाता है।
अगर हिन्दी की गिनती में अँग्रेजी के सामान नियम लागू होकर 19,29,39,49, 59, 69, 79,89 ओर 99 अपवाद रूप लिए सरल ओर सहज हो जाती तो बच्चों के लिए बोधगम्य होने से उनको पढ़ने समझने के साथ हम सभी को पढ़ने में आनंद आता। उन्नीस के पूर्ववर्ती क्रमानुसार सत्रह,अठारह के की शैली या तुक पर उन्नीस के स्थान पर नौरह, सत्रह अठारह की शैली में, उनतीस के स्थान पर नौविस सत्ताईस,अट्ठाईस के क्रम के बाद उनतालीस के स्थान पर नौतीस सेतीस-अड़तीस के क्रमानुबाद, उनचास के स्थान पर नौतालिश संतालीस, अटतालीस के तुकपर उनसाथ के स्थान पर नोवन सत्तावन,अट्ठावन के तुक पर) , उनहत्तर के स्थान पर नौसठ सड़सठ अड़सठ के तुक पर) , उन्नासी के स्थान पर नौहत्तर सतहत्तर,अठहत्तर के तुक पर किया जाता तो लिखने पढ़ने में सुविधा होती ओर यह सुधारात्मक गिनती आने आप में सभी को सरल सहज होने से जल्द स्मृति मे आती जो कठिनाई अभी उठानी पड़ रही है लेकिन हम उसके आदि होने से आभास नहीं कर पा रहे है उससे मुक्ति मिलती।
आत्माराम यादव पीव
ग्वालटोली नर्मदापुरम
मध्यप्रदेश
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