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सरगुजा/कोरिया/एमसीबी@क्या बीटेक वाले आईजी साहब एमसीबी के प्रधान आरक्षक इश्तियाक को पुलिस अधीक्षक को बोलकर नवीन पदस्थापना के लिए रवानगी दिला पाएंगे?

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-न्यूज डेस्क-
-सरगुजा/कोरिया/एमसीबी,01 मई 2025 (घटती-घटना)। पुलिस विभाग में खासकर सरगुजा संभाग के सभी जिलों में कुछ शातिर प्रधान आरक्षक व आरक्षक जो राजनीतिक पकड़ के साथ अवैध कारोबारियों को संरक्षण देते हैं,साथ ही गरीब तबके के लोगों के लिए न्याय व्यवस्था में रोड़ा बनते थे और रसूखदारों के लिए यह चमचे बने रहते थे, इनकी वजह से समाज की सुरक्षा की व्यवस्था की जिम्मा निभाने वाली पुलिस चारों तरफ आलोचनाओं में घिरी हुई थी, जमकर अवैध कारोबार फलफूल रहे थे यदि बात की जाए तो कोरिया व एमसीबी जिले की तो यहां तो स्थिति और भी बद से बदत्तर थी,एक प्रधान आरक्षक जो पूरे पुलिस विभाग के लिए ही आंखों की किरकिरी तो बना हुआ ही था, पर कुछ भ्रष्ट अधिकारियों के लिए वह उनके आंखों का तारा था,क्योंकि अवैध वसूली कर उनके बहुत करीब पहुंचा हुआ था और बाकी कमर्चारियों की शिकायत किया करता था और अपने वर्दी के आड़ में क्या-क्या काम किया करता था यह किसी से छुपा नहीं है, जमीन व्यवसाय से लेकर अवैध कारोबारियों को संरक्षण उसकी आदत बन चुकी थी,अधिकारियों से अधिक थानेदारों से अधिक यदि किसी की संपत्ती थी तो वह प्रधान आरक्षक की जिसकी जांच शायद ही कोई अधिकारी कर नहीं पाएगा? क्योंकि सभी अधिकारी इसके रिश्तेदार बन जाते थे और जहां उनके समाज का कोई अधिकारी आता था तो वह उसका रिश्तेदार तो पक्का माना जाता था,एमसीबी जिले का भी एक प्रधान आरक्षक जो शराब के कारोबार को लेकर चर्चित है उसके रहते अंबिकापुर शहर में अवैध शराब की बिक्री बंद नहीं हो सकती? ऐसा लोगों का दावा है, क्योंकि इस समय मनेन्द्रगढ़ शहर के कई होटल और कई जगह पर अवैध शराब की बिक्री होती है,अवैध कारोबारी को संरक्षण देना उसे प्रधान आरक्षक की पहचान है, जिस दिन से तबादला हुआ है उस दिन से वह छुट्टी लेकर अपने तबादला रुकवाने की जुगत में हैं जहां मारे मारे फिर रहे है है, ताकि यह रह कर वह पुनः अपना कारोबार जारी रख सकें?,और साथ ही अपने जमीन खरीदी बिक्री का काम करते रहे, काफी आलीशान घर भी वह इस समय बनवा रहे हैं,सूत्रों की माने तो मनेंद्रगढ़ के एक चर्चित होटल के सामने उनका एक करीबी फल व्यवसाय करता है जो उनके अवैध पैसे का हिसाब किताब रखता है सारा पैसा उसी के पास आता है और उसके पास से इस प्रधान आरक्षक तक पहुंचता है,वर्तमान पुलिस अधीक्षक क्या उसकी पैरवी करके उसका स्थानांतरण रुकवाना चाहते हैं? जबकि कहीं ना कहीं उसके कार्यप्रणाली से वह भी अनभिज्ञ नहीं है,इसके बावजूद भी यदि उसका स्थानांतरण रोकने में उनकी भूमिका है तो फिर मानिए की एमसीबी जिले में ऐसे प्रधान आरक्षकों के भरोसे ही अवैध कारोबार संचालित होता रहेगा? और आम जन न्याय से दूर होते रहेंगे? जनप्रतिनिधि से लेकर सभी लोग इस प्रधान आरक्षक की शिकायत को लेकर उच्च अधिकारियों से इसकी तत्काल रवानगी की मांग कर रहे हैं पर यह प्रधान आरक्षक कितने जुगाड़ू है कि उनकी रवानगी हो ही नहीं पा रही है, अब इसका प्रभाव कितना है इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है, एमसीबी जिले से तत्काल प्रधान आरक्षक को रवानगी मिले ऐसा अब मांग उठने लगा है।
लोगों की उम्मीद अब दीपक झा छत्तीसगढ़ कैडर के 2007 बैच के आईपीएस अफसर से…
अब लोगों की उम्मीद यदि किसी से है तो वह है वर्तमान सरगुजा आईजी से जिनकी कार्यप्रणाली सुनकर अभी से ही पुलिसकर्मियों के अंदर भय व्याप्त है, क्योंकि यह बेहतर पुलिस व्यवस्था रखने के लिए व अवैध गतिविधियों को बिल्कुल भी पसंद नहीं करते जिस वजह से उनकी गिनती एक ईमानदार अधिकारियों में आती है और एक साफ-सुथरा व्यक्तित्व उनकी पहचान है,दीपक झा छत्तीसगढ़ कैडर के 2007 बैच के आईपीएस अफसर है। वे मूलतः बिहार राज्य के दरभंगा के रहने वाले है। उनका जन्म 13 जनवरी 1979 को हुआ है। दीपक झा के पिता झारखंड के बोकारो स्टील प्लांट में कार्यरत थे,जिसके चलते दीपक झा की स्कूलिंग बोकारो से हुई है। आईआईटी से इंजीनियरिंग करने के बाद चौथे प्रयास में यूपीएससी क्रैकर आईपीएस बने है। आईआईटी से बीटेक की डिग्री लेने के बाद अच्छे वेतन पर काम करने वाले दीपक झा ऐसे आईपीएस अफसर है जिन्होंने आईपीएस बनने के लिए सर्वधिक वेतन वाली नौकरी छोड़ आईपीएस की सर्विस चुना। सरगुजा से पहले राजनांदगांव रेंज के आईजी थे। अब इन्हीं से उम्मीद है की संभाग की पुलिसिंग को अच्छी करने के लिए कम से कम सरगुजा रेंज में ही एक जिले से दूसरे जिले पुलिस कर्मियों का स्थानांतरण यथावत रखें ताकि 15-20 साल से एक ही जगह पर पदस्थ कर्मचारियों की वजह से पुलिसिंग खराब हो रही है,और पुलिस से लोगों का भरोसा उठ रहा है खाकी के आड़ में कुछ नामचीन निचले स्तर के कर्मचारी अवैध संपत्ती अर्जित करने में लग गए हैं जिस वजह से पुलिस की छवि ही प्रदेश में खराब हो रही है कुछ का स्थानांतरण तत्कालीन सरगुजा आईजी अंकित गर्ग ने किया था ताकि व्यवस्था सामान्य रह सके और समाज को एक बेहतर पुलिस मिले अब उसी को आगे यथावत रखने की उम्मीद वर्तमान आईजी से हो रही है।
कौन है छत्तीसगढ़ कैडर के आईपीएस दीपक झा?
वर्तमान सरगुजा आईजी का जन्म और शिक्षा से जुड़ी जानकारी- दीपक झा छत्तीसगढ़ कैडर के 2007 बैच के आईपीएस अफसर है। वे मूलतः बिहार राज्य के दरभंगा के रहने वाले है। उनका जन्म 13 जनवरी 1979 को हुआ है। दीपक झा के पिता झारखंड के बोकारो स्टील प्लांट में कार्यरत थे। जिसके चलते दीपक झा की स्कूलिंग बोकारो से हुई है। केजी वन से तीसरी तक उन्होंने गुरु गोविंद सिंह पब्लिक स्कूल बोकारो से पढ़ाई की है। चौथी से दसवीं तक उन्होंने डीपीएस स्कूल बोकारो से पढ़ाई की है। सीबीएसई बोर्ड से पढ़े दीपक झा का दसवीं में 88 प्रतिशत था और 12वीं में 80 प्रतिशत था। वहीं 12वीं करने के बाद उन्होंने आईआईटी प्रवेश परीक्षा जेईई निकाल कर आईआईटी कानपुर में एडमिशन लिया। 1997 में उन्होंने आईआईटी कानपुर से मैकेनिकल ब्रांच से 7.6 सीजीपीए के साथ उत्तीर्ण की है।
इंजीनियर से यूपीएससी में चयन की कहानी
बीटेक करने के बाद दीपक झा हिंदुस्तान पैट्रोलियम में इंजीनियर की नौकरी करने लगे। उन्होंने हिंदुस्तान पैट्रोलियम में मुंबई में ज्वाइन किया। वे 2001 से 2004 तक उन्होंने हिंदुस्तान पेट्रोलियम में जॉब किया। जॉब में रहते हुए ही उन्होंने यूपीएससी की भी तैयारी शुरू की। पहले अटेंप्ट तो में दीपक झा का प्री क्लियर नहीं हुआ। दूसरे अटेम्प्ट में उनका प्री निकाला और मेंस में पहुंचे। पर उनका मेंस नहीं निकल पाया। तीसरे प्रयास में प्री व मेंस निकालते हुए साक्षात्कार तक पहुंचे पर सलेक्शन नहीं हो पाया। चौथ अटेंप्ट में यूपीएससी क्रैक करने हेतु दीपक झा ने बड़ा रिस्क लिया। तैयारी में कोई कमी ना हो इसलिए उन्होंने हिंदुस्तान पेट्रोलियम की नौकरी से इस्तीफा दे दिया और पूरा फोकस यूपीएससी की तैयारी पर किया। चौथे अटेंप्ट में प्री, मेंस, इंटरव्यू इंटरव्यू निकालते हुए 90 वीं रैंक के साथ यूपीएससी क्रैक की और आईपीएस बने।
एडिशनल एसपी से आईजी तक का सफर
दीपक झा ने 18 अगस्त 2018 को आईपीएस की सर्विस ज्वाइन की है। लाल बहादुर शास्त्री प्रशिक्षण अकादमी में ट्रेनिंग के बाद फील्ड प्रशिक्षण के लिए उनकी बिलासपुर जिले में प्रशिक्षु आईपीएस के तौर पर तैनाती हुई। वह बिलासपुर जिले में सीपत थाना प्रभारी रहे। फिर कांकेर जिले के पखांजूर में एसडीओपी रहे। राजनांदगांव के खैरागढ़ में भी वे एसडीओपी रहे। स्पेशल टास्क फोर्स के एडिशनल एसपी दीपक झा रहे। इस दौरान उन्होंने बस्तर में कई अभियान चलाया। एडिशनल एसपी के बाद दीपक झा एसपी पीटीएस माना बने। फिर नवगठित कोंडागांव जिले के ओएसडी बने। पूर्णकालीक जिला बनने पर कोंडागांव के एसपी रहे। कोंडागांव के बाद पांचवी वाहनी के कमांडेंट बने। इस दौरान उन्होंने धुर नक्सल प्रभावित एरिया मिनपा कैंप स्थापित करने में काफी मेहनत की। जगदलपुर से पैदल बुर्का पाल होते हुए मिनपा तक पहुंचे और अपने सहकर्मियों तक 25 दिनों तक वहां रहे। इस दौरान उनके साथ अभियान में शामिल तीन जवान भी शहीद हो गए। दीपक झा महासमुंद के एसपी भी रहे। फिर रायगढ़ व जगदलपुर जिलों के एसपी रहे। बिलासपुर एसपी भी दीपक झा रहे। बिलासपुर के बाद बलौदा बाजार भाटापारा जिले के एसपी बने। ईमानदार छवि के सख्त अफसर माने जाने वाले दीपक झा कोनो गठित राजनांदगांव रेंज का आईजी बनाया गया। वर्तमान में वे राजनांदगांव रेंज के आईजी है। दीपक झा ने नक्सल क्षेत्र बस्तर में आम लोगों से जुड़ी समस्याओं के निराकरण के लिए विशेष अभियान चलाया था। शहरी पुलिसिंग में भी वह काफी सख्त माने जाते हैं। रायगढ़ में पदस्थ रहते उन्होंने ट्रैफिक को लेकर विशेष सुधार अभियान चलाया था। बिलासपुर में पदस्थ रहने के दौरान जुए-सट्टे की रोकथाम और गैंगवार खत्म करने में दीपक झा की भूमिका अहम मानी जाती है।
कोरिया के पुलिस पेट्रोल टंकी में भी एक प्रधान आरक्षक ने की है गड़बड़ी:सूत्र
एक प्रधान आरक्षक को पेट्रोल टंकी में तैनात किया गया था जो पुलिस पेट्रोल टंकी है जो रक्षित केंद्र के पास बैकुंठपुर में स्थित है जिसे यहां का जिम्मा दिया गया था वह प्रधान आरक्षक ने इस पेट्रोल टंकी में भी बहुत बड़ी गड़बड़ी की है वैसे इसकी रवनागी हो चुकी है पर वहा पुनः रुकवाने की जुगद में है, ऐसा सूत्रों का दावा है जिस वजह से वही के कर्मचारी व प्रभारी के साथ भी उनकी एक झड़प हो चुकी है जो बात अब धीरे-धीरे दबी जुबान पर सुनाई देने लगी है और वहां पर जांच की मांग उठने लगी है अब देखना यह है कि क्या जांच होगी? और वहां के गड़बड़ी का खुलासा हो पाएगा? आखिर गड़बड़ी हुई क्या है क्या पेट्रोल डीजल की बिक्री में हुई है या फिर पेट्रोल डीजल मंगवाने में गड़बड़ी हुई है वैसा सूत्रों का दावा है कि पेट्रोल डीजल किसी निजी पेट्रोल टंकी से मंगाया जाता था।
स्थानांतरण आदेश के 14 दिन बाद भी कार्यमुक्त क्यों नहीं हुए प्रधान आरक्षक?
सरगुजा रेंज के तत्कालीन पुलिस महानिरीक्षक अंकित गर्ग द्वारा 18 अप्रैल 2025 को बेहतर पुलिसिंग और लंबे समय से एक ही स्थान पर पदस्थ पुलिस कर्मियों के तबादले की दृष्टि से 21 पुलिस कर्मियों का स्थानांतरण आदेश जारी किया गया था। इसमें एमसीबी जिला से दो प्रधान आरक्षक—क्रमांक 38 इश्तियाक अहमद और क्रमांक 76 शैलेन्द्र केशरवानी,का स्थानांतरण क्रमशः जशपुर और सूरजपुर जिलों में किया गया। लेकिन 14 दिन बीत जाने के बावजूद अब तक इन दोनों को कार्यमुक्त नहीं किया गया है,जिससे पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों के अनुसार प्रधान आरक्षक इश्तियाक अहमद लंबे समय से एमसीबी जिले में पदस्थ हैं और अक्सर जिस थाना में इच्छा होती थी,वहां तैनात हो जाते थे। स्थानीय स्तर पर उन पर अवैध कारोबार में लिप्त लोगों से साठगांठ के आरोप भी लगते रहे हैं। आम जनमानस द्वारा भी लंबे समय से उनके अन्यंत्र जिला स्थानांतरण की मांग की जा रही थी। ऐसे में आईजी अंकित गर्ग द्वारा किया गया स्थानांतरण आदेश जनभावनाओं के अनुरूप माना गया। लेकिन हैरानी की बात यह है कि स्थानांतरण आदेश जारी होने के बाद से ही इश्तियाक अहमद ने अवकाश ले लिया। सवाल यह उठता है कि स्थानांतरण से पहले तो उन्होंने कभी अवकाश नहीं लिया, फिर अब अचानक छुट्टी क्यों? क्या वह स्थानांतरण आदेश को निरस्त कराने के प्रयास में हैं? विभागीय सूत्र बताते हैं कि पहले भी इश्तियाक अहमद का स्थानांतरण प्रस्तावित हुआ था,लेकिन स्टाफ की कमी का हवाला देकर उसे रोक दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब अन्य जिलों के पुलिसकर्मियों को आदेश के 24 घंटे के भीतर कार्यमुक्त कर दिया गया, तो एमसीबी जिला में पदस्थ इन दो प्रधान आरक्षकों को अब तक कार्यमुक्त क्यों नहीं किया गया? क्या इसमें किसी प्रभावशाली संरक्षण की भूमिका है? अब जब सरगुजा रेंज के नए आईजी दीपक झा ने पदभार ग्रहण कर लिया है,यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वे अपने पूर्ववर्ती आईजी अंकित गर्ग के आदेशों को लागू कराते हैं या फिर इश्तियाक अहमद की एमसीबी जिले में यथावत स्थिति बनी रहती है। इस मामले पर आम जनता की नजरें टिकी हुई हैं और वे चाहती हैं कि आदेशों का पालन हो तथा पुलिस व्यवस्था में पारदर्शिता बनी रहे।
सरगुजा आईजी को लोगों का सुझाव,लंबे समय से एक ही जिले में नौकरी करने वाले कर्मचारियों का कम से कम संभाग के जिले में ही स्थानांतरण हो…
छोटे कर्मचारियों की वजह से भी कई बार बेहतर पुलिसिंग खराब हो जाती है, यदि कोई अच्छा अधिकारी आ जाता है और बेहतर पुलिसिंग करने का प्रयास करता है उसे समय कुछ शातिर कर्मचारी उनके गोपनीय बातों को भी लिक कर देते हैं, जिस वजह से कई बार थाने के प्रभारी अपने कामयाबी से चूक जाते हैं और ऐसा सरगुजा,कोरिया व एमसीबी जिले में अक्सर देखने को मिला है जानकारों की मानें तो बड़े-बड़े अवैध कारोबारी को पकड़ने में उन्हें सफलता नहीं मिल पाई है,क्योंकि छोटे कर्मचारी इतने शातिर है की अवैध कारोबारी से अवैध वसूली करके उन्हें अंदर की जानकारी दे देते हैं जिस कारण अवैध कारोबार फलता-फूलता रहता है, कई बार तो लंबा-चौड़ा पैसे का डील करके अपने ऊपर के अधिकारी को भी उसे पैसे के प्रभाव में ले आते हैं,और उनके ईमानदारी के रास्ते से भटका देते हैं ऐसा लंबे समय से चला रहा है एमसीबी व कोरिया जिले में ऐसे कई पुलिसकर्मी है जो काफी चर्चा में रहते हैं इससे पहले भी सरगुजा आईजी अंकित गर्ग ने कुछ लोगों को तबादला किया था उसके बाद दूसरी सूची में फिर से उन्होंने ऐसे ही लोगों का चयन किया जो जिले में मठाधीश बन बैठे थे और अपनी राजनीतिक पकड़ से लेकर तमाम तरह की पकड़ दिखा कर अपने ही अधिकारियों को लाल आंख दिखाया करते थे,उनका तबादला कराने तक की हिम्मत रखते थे ऐसा बीच शहरों में वह कहा करते थे, ऐसे लोगों का तबादला हर 4 से 5 साल में एक जिले से दूसरे जिला होना चाहिए ताकि अवैध कार्य को संरक्षण ना मिले और ऐसे पुलिस कर्मियों को भी हर जिले में काम करने का अनुभव मिले ताकि पुलिसिंग भी अच्छी हो और हर जिले में काम करने का तौर तरीका बदलेगा तो यह भी काम करने के प्रति जागरूक होंगे और अवैध कार्य को संरक्षण के मोह से यह भी बाहर आएंगे इसीलिए ऐसा करना भी जरूरी है।


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