
-भूपेन्द्र सिंह-
अम्बिकापुर/रायपुर 26 अगस्त 2024 (घटती-घटना)। भाजपा शासनकाल में छत्तीसगढ़ के इतिहास में 28 जुलाई 2024 का दिन दर्ज हो गया है, यह दिन इसलिए विशेष हो गया है क्योंकि इस दिन आदिवासी अंचल सरगुजा के अंबिकापुर से प्रकाशित होने वाले दैनिक घटती-घटना अखबार के कार्यालय व संपादक के प्रतिष्ठान पर बुलडोजर की कार्यवाही हुई थी और यह कार्यवाही सिर्फ अखबार के कलम बंद अभियान को रोकने के लिए की गई थी। इस कार्यवाही के सूत्रधार शासन के मंत्री थे और सरगुजा जिले के सबसे बड़े प्रशासनिक अधिकारी जो कलेक्टर थे,सरगुजा कलेक्टर विलास भोसकर संदीपान…इनकी कहानी भी अजीब है इनसे रुष्ट विधायक व पार्टी के लोग इन्हें सरगुजा कलेक्टर से हटाना चाहते थे और यह बात उन्हें भी पता थी पर इसी बीच दैनिक घटती-घटना समाचार-पत्र स्वास्थ्य मंत्री की कमियों सहित उनके भतीजे प्रभारी डीपीएम व ओएसडी के फर्जी प्रमाण-पत्र को लेकर खबर प्रकाशित कर रहा था, जिस पर रोक लगाने के लिए पहले अखबार का शासकीय विज्ञापन बंद किया गया और जब शासकीय विज्ञापन बंद हुआ तो अखबार ने अपना कलम ही बंद कर दिया,वह कलम इसलिए बंद किया …जिससे वर्तमान सरकार के संचालक यह ही बताएं कि…कमियो को ना छपे तो क्या छापे…? यह बात शायद पूरी सरकार को ही नागवार गुजरी और उसके बाद जो षड्यंत्र रचा गया वह किसी से छुपा नहीं है। सूत्रों की माने तो कलेक्टर को सरगुजा में बने रहने के लिए यह कहा गया कि कुछ भी करो लेकिन दैनिक घटती-घटना के कार्यालय व प्रतिष्ठान पर कार्यवाही करो, फिर क्या था कलेक्टर साहब अपनी कुर्सी बचाने के लिए नियमों को दरकिनार कर गए और मंत्रियों की बात सुनकर नियमों को तोड़ -मरोड़ कर जो कार्यवाही की वह किसी से छुपी नहीं है,यहां तक कि भू-राजस्व संहिता की धारा 248 के तहत,अगर किसी व्यक्ति या संस्था पर सरकारी ज़मीन पर कब्ज़े या अतिक्रमण का शक हो,तो उसे नोटिस भेजा जाता है, नोटिस जारी होने के बाद,मामले को तहसीलदार की अदालत में दर्ज कर लिया जाता है, कम से कम एक बार सुनवाई के बाद अगर प्रशासन यह साबित कर पाता है कि संबंधित व्यक्ति ने सरकारी ज़मीन घेरी है, तो उस पर जुर्माना लगाया जाता है, संशोधित नियमों के मुताबिक,यह जुर्माना घेरी गई ज़मीन के बाज़ार मूल्य का 20 प्रतिशत तक हो सकता है,अगर जुर्माना नहीं जमा किया जाता,तो उस व्यक्ति को जेल भी भेजा जा सकता है… वहीं दंड संहिता की धारा 166 के अनुसार, सरकारी कर्मचारी जो दूसरे को चोट पहुंचाने के इरादे से कानून का उल्लंघन करता है,उसे कारावास या जुर्माना या दोनों की अवधि के साथ दंडित किया जा सकता है। यदि कोई सरकारी कर्मचारी आपको नुकसान पहुंचता है या अपमान करता है, तो आईपीसी का यह प्रावधान लागू हो सकता है पर सरगुजा कलेक्टर कितने बेबस थे…मंत्रियों के सामने…की…उन्होंने कानूनी प्रावधानों को भी ध्यान नहीं दिया और वही किया जो ऊपर से मंत्री ने उन्हें आदेश दिया।

जमीन कीमती तब हो गई जब दैनिक घटती-घटना ने अपना कलम बंद कर दिया…
कई कलेक्टर आए गए भाजपा से लेकर कांग्रेस तक की सरकार आई उनके शासन में भी कलेक्टर आए व गए किसी को भी वह जमीन कीमती नहीं लगी, जमीन कीमती तब हो गई जब दैनिक घटती-घटना ने अपना कलम बंद कर दिया। ऐसे में सवाल तो यही उठता है कार्यवाही तो सिर्फ एक बहाना था यहां तो दैनिक घटती-घटना अखबार के कलम बंद अभियान को बंद करना था। एक अखबार को शासन प्रशासन से टक्कर लेना कितना महंगा पड़ेगा यह बताना था, यह भी संदेश देना था कि शासन प्रशासन व सरकार से टक्कर मत लेना नहीं तो सबके साथ यही होगा, इस कार्यवाही के बाद शायद सरगुजा में कुछ और महीने विलास भोसकर संदीपान कलेक्टर बने रहेंगे क्योंकि उन्होंने जो कार्यवाही की है वह शासन के लिए किसी उपहार से कम नहीं है वहीं इसके लिए उनका पुरस्कृत होना तय है वैसे अब यह भी सवाल उठता है की न जाने ऐसे कलेक्टरों को पढ़ा-लिखा कर क्यों भेजा जाता है की कानून व्यवस्था को बनाने के बजाय उसे बिगाड़ दे।
मंत्री जी कौन सी जन्मघुट्टी पिला दिये थे की सब आदेश एक दिन में तैयार हो गया, इसके पीछे राज क्या है
सरगुजा कलेक्टर विलास भोसकर संदीपान आखिर आप क्यों कानून के नियमो को तोड़-मरोड़ कर रखने को मजबूर हो गये…मंत्री जी कौन सा जादुई कलम दिये थे…कि सब आदेश एक दिन तैयार हो गया था…?

तत्काल तो हिम्मत दिखा दिये…बस ये हिम्मत बरकरार रखियेगा…
अब कलेक्टर सरगुजा के लिए भी एक खुला-पत्र समाचार-पत्र की तरफ से प्रेषित है कि उन्होंने एक मंत्री के विवादित फर्जी डिग्री वाले भतीजे के लिए कानून को ही ताक पर रख दिया क्योंकि मंत्री का विवादित फर्जी डिग्री वाला भतीजा ऐसा चाहता था और ऐसा नहीं होने पर उसकी नौकरी चली जाती। कलेक्टर सरगुजा ने तत्काल तो हिम्मत दिखा दी…समाचार-पत्र कार्यालय/ प्रतिष्ठान उन्होंने जमींदोज कर दिया लेकिन अब वह अंत तक हिम्मत सम्हाल कर रखें क्योंकि अब न्याय की लड़ाई अंजाम तक जायेगी और हर बात का जवाब कानूनी प्रक्रिया अनुसार लिया जायेगा की कानून का पालन क्यों नहीं किया गया वहीं दो विवादित फर्जी लोगों के लिए पूरे प्रदेश की सरकार साथ ही सरगुजा जिला प्रशासन इतना आत्मीयता से भर गया की उनके लिए कानून ही ताक पर रख दिया। वैसे सवाल यह भी है की क्या हर फर्जी डिग्री वाले साथ ही फर्जी दिव्यांग प्रमाण-पत्र वाले अधिकारी कर्मचारी के साथ यही नियम लागू होगा इस सरकार के कार्यकाल में…क्या असल की जगह फर्जी वाला ही नौकरी में होगा असल आंदोलन ही करता रहेगा।
कलेक्टर साहब…अब आप ही पूछ कर बता दीजिए…कि क्या छापे?
कलेक्टर सरगुजा से एक आग्रह भी है समाचार-पत्र का की अब वह ही पूछकर बता दें की क्या छापें। समाचार-पत्र ने कलम बंद किया तो पूरी सरकार दहल गई समाचार पत्र को बंद करने उसके विरोध को दबाने बुलडोजर तक चला दिया गया लेकिन फिर भी सरकार ने यह नहीं बताया की क्या छापें…समाचार-पत्र में…चूंकि दैनिक घटती-घटना समाचार पत्र के विरोध को कुचलने का जिम्मा कलेक्टर सरगुजा का था ऐसे में उनके माध्यम से ही अब सवाल है की वही सरकार से यह पूछकर समाचार-पत्र को अवगत करा दें की क्या छापें।
खुला पत्र प्रधानमंत्री को…
प्रधानमंत्री जी…हमारा अपराध बस इतना है की विवादित प्रमाण-पत्र से नियुक्त ओएसडी संजय मरकाम व नियम विरुद्ध तरीके से बने प्रभारी डीपीएम प्रिंस जायसवाल के मामले की जांच का समाचार हम अखबार में प्रकाशित कर रहे थे…और यह मांग हम नहीं पूर्व सरकार से लेकर वर्तमान सरकार तक के कार्यकाल में दिव्यांग संघ इस मामले की जांच चाह रहा है ताकि सही दिव्यांगों का इसका लाभ मिल सके।
सवाल तो बनता है मंत्री जी… कि आखिर जांच कराने से इतना तकलीफ क्यों हो रही है…दूध का दूध पानी का पानी हो जाने दीजिये…?
मंत्री जी को आखिर सूरजपुर के प्रभारी डीपीएम साथ ही अपने ओएसडी के प्रमाण पत्रों की जांच साथ ही प्रभारी डीपीएम के उन कारनामों की जांच जिनमे भ्रष्टाचार के आरोप हैं से क्यों आपत्ति है? क्या सही क्या गलत यह जांच के बाद तय होने दीजिए। प्रभारी डीपीएम की डिग्री फर्जी है इसकी शिकायत की जांच क्यों नहीं हो रही है? ओएसडी फर्जी दिव्यांग प्रमाण-पत्र के आधार पर नौकरी कर रहा है? क्यों जांच नहीं हो रही है। क्या यह अधिकार खास लोगों को ही है? यदि फर्जी डिग्री और फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र से नौकरी जायज है तो यह अधिकार सभी को प्रदेश में प्रदान करें स्वास्थ्य मंत्री जी…क्यों कोई लाखों करोड़ों खर्च करे मेहनत करे जब मुफ्त ही उसे पद मिलता है?
यही सच है…सच लिखना गुनाह क्यों माना जा रहा है?
सुशासन के रक्षक विष्णु देव साय जी के सलाहकारों को स्वास्थ्य मंत्री ने व्यक्तिगत (इन दोनों पर जांच ना हो ) कारणों से गलत जानकारी देकर सरगुजा में लोकतंत्र को कुचलने में सरगुजा कलेक्टर विलास भोसकर को विश्वास में लेकर राज्य शासन के सुशासन के वादे को सवालो के कटघरे में खड़ा कर दिया… सुनवाई के कानूनी अधिकार से भी वंचित करने के लिये कोई ऐसा षड्यंत्र नही था जो नही किया गया हो…जिला प्रशासन सरगुजा के द्वारा…।
क्यों..जून 2024 से विज्ञापन बंद…पूछने पर मंत्री जी का मौखिक शिकायत था मयंक श्रीवास्तव साहब का उत्तर था?
विरोध स्वरूप कलम बंद कर दिये और पूछे की आप ही बताओ कि क्या छापे…फिर क्या था…कर दिये अत्याचार और अविनाश सिंह घटती-घटना के संपादक के संपत्ति को कुचल कर कानून का हवाला देने में कलेक्टर साहब पूरा कागजी व्यवस्था कर लिये…पर सुनवाई के अधिकार से वंचित करने के लिये 5-6 जेसीबी…1 हाइड्रा…200-300 लोग भेज कर करवा दिये बुलडोजर कार्यवाही…जवाब और सवाल बहुत है…?
इन दोनों के प्रमाण-पत्र के जांच में आपत्ति क्यों…सरकार को?
प्रभारी डीपीएम व स्वास्थ्य मंत्री के ओएसडी के प्रमाण पत्र के जांच से आपत्ति क्यों है यदि आपत्ति नहीं है तो तत्काल उन्हें हटाकर जांच क्यों नहीं किया जा रहा? जांच कार्यवाही न होने को लेकर कई सवाल खड़े हैं कमियों को छापने वाले पत्रकार भी सरकार से टकरा रहे हैं और सरकार भी पत्रकारों पर अत्याचार करने को तैयार है पर जांच कार्यवाही में तत्परता क्यों नहीं दिखाई जा रही यह भी एक सवाल है?


सरगुजा कलेक्टर विलास भोसकर संदीपान आखिर आप क्यों कानून के नियमो को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करने को मजबूर हो गये?
दैनिक घटती-घटना कार्यालय साथ ही संपादक के प्रतिष्ठान को कलेक्टर सरगुजा ने अल सुबह जमीदोज कर दिया जो 28 जुलाई की सुबह थी,संपादक को कानून के अनुसार न समय दिया गया पर्याप्त न ही इस कार्यवाही के दौरान यह भी ध्यान रखा गया की बरसात के दिन में बेदखली की कार्यवाही नहीं की जाती है वहीं यह भी ध्यान नहीं रखा गया की जिसके विरुद्ध कार्यवाही हो रही है उसके पिता का देहांत हुआ है और अभी हिन्दू रीति रिवाज अनुसार उसके यहां दशकर्म का भी कार्यक्रम नहीं संपन्न हुआ है ऐसे में वह कैसे बेदखली के खिलाफ कहीं दौड़भाग कर सकेगा,कुल मिलाकर यदि देखा जाए तो कलेक्टर सरगुजा की पूरी कार्यवाही ऐसी नज़र आई जिसमे नियमों को इसलिए तोड़ा-मरोड़ा गया जिससे दैनिक घटती-घटना समाचार पत्र कार्यालय साथ ही संपादक का प्रतिष्ठान जमींदोज किया जा सके। अब इस मामले में कलेक्टर सरगुजा से एक ही सवाल है की आखिर वह क्यों इतने मजबूर हो गए? किसके कहने पर वह एक समाचार पत्र की आवाज दबाने निकल पड़े और कौन उन्हे अपनी उंगलियों पर नचा ले गया? जिसके कारण वह न्याय के विपरीत जाकर दुर्भावना से काम कर गए। वैसे इस मामले में शिकायतकर्ता एक संविदा स्वास्थ्य अधिकारी था जिसकी डिग्री भी फर्जी है ऐसा आरोप है वहीं उसके ऊपर कोरोना महामारी के दौरान मरीजों को मिलने वाली निशुल्क स्वास्थ्य सुविधाओं के भी बंदरबांट का आरोप है वहीं आज भी वह लोगों के स्वास्थ्य सुविधाओं में से की कटौती कर अपनी सुविधा जुटाता है और वही है जो कलेक्टर सरगुजा को भी अपनी गिरफ्त में कर ले गया उन्हे गलत करने मजबूर कर ले गया वहीं सरकार और स्वास्थ्य मंत्रालय उसकी गिरफ्त में पहले से ही था क्योंकि चाचा मंत्री हैं और तभी उसकी नौकरी बची है। और इसके पीछे का कारण है उसके खिलाफ समाचार का प्रकाशन जिससे आहत था वह और उसने ही रणनीति बनाई, जिस रणनीति पर चलने सरकार के साथ साथ आई पी एस मयंक श्रीवास्तव भी मजबूर हुए कलेक्टर सरगुजा भी मजबूर हुए वहीं जिला प्रशासन सरगुजा तो शरणागत रहा जब तक संविदा स्वास्थ्य अधिकारी के अनुसार कार्यवाही प्रेस कार्यालय पर नहीं हो गई।
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