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नई दिल्ली@12 वर्षों में लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं को पहुंचा

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भारी नुकसान,सुधार में लगेगा लंबा समय : सोनिया गांधी

नई दिल्ली,07 नवम्बर 2026।कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने केंद्र की मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि पिछले 12 वर्षों में देश के लोकतांत्रिक ढांचे,संवैधानिक संस्थाओं और सामाजिक ताने-बाने को भारी नुकसान पहुंचा है। उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार के सत्ता से जाने के बाद भी लोकतांत्रिक व्यवस्था और संस्थाओं को दोबारा मजबूत करने में लंबा समय लगेगा। इसके लिए सभी राजनीतिक दलों को गंभीरता से मिलकर प्रयास करने होंगे।
सोनिया गांधी ने अपनी आगामी पुस्तक ‘बिलॉन्गिंग : अ जर्नी ऑफ लव’ के प्रकाशन से पहले एक अंग्रेजी अखबार को दिए साक्षात्कार में ये विचार व्यक्त किए। हार्परकॉलिन्स इंडिया द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक 10 नवंबर को बाजार में आएगी, जबकि इसका औपचारिक लोकार्पण 16 नवंबर को होगा। पुस्तक में उन्होंने अपने निजी जीवन,भारत से जुड़ाव,राजनीतिक सफर,कांग्रेस की भूमिका और देश के मौजूदा राजनीतिक हालात पर विचार साझा किए हैं। उन्होंने कहा कि अब देश के लोगों को लोकतांत्रिक संस्थाओं और व्यवस्था को हुए नुकसान का एहसास होने लगा है। हालांकि,तमाम चुनौतियों के बावजूद वह देश के भविष्य को लेकर आशावादी हैं।
कांग्रेस की संभावनाएं बेहतर होने का दावा : कांग्रेस की मौजूदा स्थिति और चुनावी संभावनाओं पर सोनिया गांधी ने कहा कि वह पार्टी के भविष्य को लेकर निराश नहीं हैं। उनका आरोप है कि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को समान अवसर नहीं मिल रहे हैं। चुनाव आयोग सहित विभिन्न संस्थाओं पर सरकार का प्रभाव है और मुख्यधारा का मीडिया भी इससे अछूता नहीं है। उन्होंने धनबल और धर्म के इस्तेमाल से चुनावी मुकाबले को प्रभावित करने का आरोप भी लगाया। सोनिया गांधी ने कहा कि तमाम चुनौतियों और दबाव के बावजूद कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता गांवों तथा जिलों में संविधान के मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
हाल के महीनों में चुनावों में गड़बड़ी और चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के आरोप सामने आए हैं। अब आम लोग भी इन मुद्दों को लेकर जागरूक हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस समान विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर काम कर रही है और पार्टी की संभावनाएं लगातार बेहतर हो रही हैं।
आपातकाल को बताया स्वतंत्र भारत का काला अध्याय
सोनिया गांधी ने आपातकाल को स्वतंत्र भारत के इतिहास का काला अध्याय बताते हुए स्वीकार किया कि उस दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों पर रोक लगाई गई थी और बंदी प्रत्यक्षीकरण का अधिकार भी निलंबित कर दिया गया था। उन्होंने कहा कि बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने परिस्थितियों को समझते हुए मार्च 1977 में चुनाव कराने का फैसला किया था। आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों पर खेद जताते हुए उन्होंने माफी भी मांगी थी। सोनिया गांधी के इस साक्षात्कार में जहां केंद्र सरकार पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने के आरोप लगाए गए हैं, वहीं कांग्रेस की विचारधारा, भविष्य की राजनीतिक रणनीति और आपातकाल जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी खुलकर विचार रखे गए हैं।
विदेशी मूल के मुद्दे से
पहुंचा था गहरा आघात

सोनिया गांधी ने वर्ष 1999 में कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं शरद पवार,पीए संगमा और तारिक अनवर की ओर से उनके विदेशी मूल का मुद्दा उठाए जाने के घटनाक्रम को भी याद किया। उन्होंने कहा कि साथियों के इस रुख से उन्हें गहरा दुःख पहुंचा था। उन्हें विश्वास था कि उनके सहयोगी उन पर भरोसा करते हैं,लेकिन बाद में उन्हें महसूस हुआ कि ऐसा नहीं था। उन्होंने बताया कि उस बैठक में यह जानकर उन्हें धक्का लगा कि कुछ नेता उन्हें अब भी बाहरी मानते हैं। उस समय उनकी आंखों में आंसू आ गए थे और वह बैठक छोड़कर बाहर चली गई थीं।


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