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कोरिया/सूरजपुर@ रसौकी में विकास के दावों की खुली तस्वीर…मरीज को कंधे पर बैठाकर नदी पार कराया, बाइक भी ग्रामीणों ने उठाकर पहुंचाई दूसरी ओर

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पूर्व विधायक पारसनाथ राजवाड़े का दावा…सड़क-पुल के लिए करोड़ों की स्वीकृति के बावजूद काम अधूरा…बरसात में तीन जगह नदी पार करने को मजबूर ग्रामीण…
-राजन पाण्डेय-
कोरिया/सूरजपुर,01 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)।
छत्तीसगढ़ में गांव-गांव तक सड़क,पुल और बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने के दावों के बीच सूरजपुर जिले के दूरस्थ रसौकी गांव से सामने आया एक वीडियो विकास की जमीनी तस्वीर पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है,वीडियो में एक बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीण उसे कंधे पर बैठाकर नदी पार कराते दिखाई दे रहे हैं,हालात इतने मुश्किल हैं कि मरीज को दूसरी तरफ ले जाने के बाद उसकी बाइक को भी ग्रामीणों ने कंधे पर उठाकर नदी पार कराई। यह तस्वीर केवल किसी एक परिवार की परेशानी नहीं,बल्कि बरसात के मौसम में रसौकी और आसपास के गांवों में रहने वाले ग्रामीणों की वर्षों पुरानी समस्या को सामने लाती है,पुल नहीं होने के कारण जब नदी का जलस्तर बढ़ता है तो सड़क और नदी के बीच का फर्क मिट जाता है और ग्रामीणों के लिए अस्पताल,स्कूल,बाजार और ब्लॉक मुख्यालय तक पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं रहता,हालिया रिपोर्टों में भी रसौकी के बरगा नदी के कारण बरसात में संपर्क बाधित होने और गांव के कई दिनों तक अलग-थलग पड़ने की स्थिति सामने आई है,अगस्त 2026 की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारी बारिश के दौरान रसौकी में कई दिनों तक आवागमन प्रभावित हुआ था और ग्रामीणों का तहसील व जिला मुख्यालय से संपर्क कट गया था।
मरीज को अस्पताल ले जाना भी बन जाता है संघर्ष-ग्रामीणों के अनुसार हाल ही में गांव के एक व्यक्ति की तबीयत खराब हुई, उसे अस्पताल ले जाने की जरूरत थी,लेकिन नदी का जलस्तर बढ़ा होने के कारण वाहन सीधे दूसरी ओर नहीं जा सकता था,ऐसे में ग्रामीणों ने मरीज को कंधे पर बैठाया और पानी के बीच से नदी पार कराई,मरीज को नदी के दूसरी तरफ पहुंचाने के बाद उसकी बाइक भी ग्रामीणों ने उठाकर पार कराई,इसके बाद ही उसे वाहन के माध्यम से अस्पताल ले जाना संभव हुआ, यह दृश्य स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर भी गंभीर सवाल खड़ा करता है,जिस क्षेत्र में किसी गंभीर मरीज के लिए हर मिनट महत्वपूर्ण होता है,वहां यदि पहले नदी पार कराने की व्यवस्था करनी पड़े तो आपातकालीन चिकित्सा सेवा कितनी प्रभावी हो पाएगी, यह सहज ही समझा जा सकता है।
30 किलोमीटर के रास्ते में अभी भी अधूरा सफर-ग्रामीणों के मुताबिक रसौकी से बिहारपुर की ओर जाने वाला मार्ग लगभग 30 किलोमीटर का है,इसमें करीब 20 किलोमीटर हिस्से में सड़क निर्माण हो चुका है,लेकिन शेष हिस्से में कच्चे रास्ते और नदी की बाधा अब भी बनी हुई है,हालांकि उपलब्ध सार्वजनिक सरकारी/समाचार रिकॉर्ड में बिहारपुर से रसौकी तक बारहमासी पक्की सड़क के लिए वर्ष 2023-24 में प्रशासनिक स्वीकृति और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत काम का उल्लेख मिलता है,जनवरी 2024 की रिपोर्ट में कहा गया था कि इस सड़क के बनने से निमडांड,अवंतिकापुर,उमझर,रसौकी सहित नौ गांवों के करीब 3778 ग्रामीणों को बारहमासी सड़क की सुविधा मिलनी थी और अस्पताल, ब्लॉक तथा जिला मुख्यालय तक पहुंच आसान होनी थी,लेकिन हालिया बारिश के दौरान रसौकी के संपर्क बाधित होने की खबरें यह संकेत देती हैं कि सड़क और पुल की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
23.46 करोड़ की स्वीकृति का दावा, फिर काम कहां अटका?-मामले में राजनीतिक सवाल भी अब सामने आ गया है, पूर्व भटगांव विधायक पारसनाथ राजवाड़े का दावा है कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार के दौरान उनके प्रयासों से रसौकी से नवाटोला तक करीब 12 किलोमीटर सड़क,पुल और पुलियों के निर्माण के लिए 23 करोड़ 46 लाख रुपये की स्वीकृति मिली थी,पूर्व विधायक का आरोप है कि सरकार बदलने के बाद काम रोक दिया गया और इसका खामियाजा आज ग्रामीण भुगत रहे हैं,हालांकि उपलब्ध ऑनलाइन रिकॉर्ड में 2022 के अनुपूरक बजट से जुड़े एक प्रकाशन में बिहारपुर-नावाटोला मुख्य मार्ग में रसौकी तक सड़क निर्माण के लिए 20 करोड़ रुपये की स्वीकृति का उल्लेख मिलता है, इसलिए 23.46 करोड़ रुपये की स्वीकृति संबंधी दावे की आधिकारिक स्वीकृति आदेश/कार्यादेश से अलग से पुष्टि किया जाना जरूरी है, यही वह बिंदु है जहां राजनीति से ज्यादा महत्वपूर्ण दस्तावेज हो जाते हैं…स्वीकृति कितनी थी, किस योजना के तहत थी,किस हिस्से के लिए थी, टेंडर हुआ या नहीं, कार्यादेश जारी हुआ या नहीं और यदि कार्यादेश हुआ तो काम पूरा क्यों नहीं हुआ?
मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े के विधानसभा क्षेत्र में उठे सवाल-रसौकी क्षेत्र भटगांव विधानसभा क्षेत्र में आता है,जिसका प्रतिनिधित्व वर्तमान में मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े करती हैं,ऐसे में इस वीडियो के सामने आने के बाद राजनीतिक सवाल उठना स्वाभाविक है,लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें कांग्रेस या भाजपा की राजनीति से ज्यादा अपने गांव की सड़क और पुल की चिंता है,उनका सीधा सवाल है…बरसात में यदि मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए कंधे का सहारा लेना पड़े तो विकास की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए? उनकी मांग है कि सड़क और पुल का निर्माण राजनीतिक श्रेय का विषय न बनकर जनजीवन की आवश्यकता के रूप में देखा जाए।
सड़क-पुल का मतलब सिर्फ आवागमन नहीं-रसौकी जैसे दूरस्थ क्षेत्र में सड़क और पुल का निर्माण केवल वाहन चलाने की सुविधा नहीं देता,इसका सीधा संबंध स्वास्थ्य,शिक्षा,रोजगार,कृषि और आपातकालीन सेवाओं से है,सड़क नहीं होने का अर्थ है कि किसान अपनी उपज बाजार तक आसानी से नहीं पहुंचा पाएंगे,पुल नहीं होने का अर्थ है कि बरसात में बच्चे स्कूल नहीं पहुंच पाएंगे,और सबसे गंभीर स्थिति तब बनती है जब मरीज को अस्पताल ले जाने के लिए ग्रामीणों को खुद मानव स्ट्रेचर बनना पड़े,यही वजह है कि वायरल वीडियो को केवल सोशल मीडिया का दृश्य मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता,यह उस क्षेत्र की कनेक्टिविटी की वास्तविक समस्या की ओर ध्यान खींचता है।
अब सरकार और प्रशासन से चाहिए स्पष्ट जवाब-रसौकी की समस्या पर अब सबसे जरूरी है कि प्रशासन मौके का निरीक्षण करे और सड़क-पुल परियोजनाओं की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करे, यदि 23.46 करोड़ रुपये की स्वीकृति का दावा सही है तो संबंधित स्वीकृति आदेश, कार्यादेश, टेंडर और वर्तमान स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए,यदि राशि स्वीकृत होने के बावजूद काम शुरू नहीं हुआ तो इसके कारण बताए जाने चाहिए,इसी तरह यदि बिहारपुर-रसौकी सड़क के लिए पूर्व में स्वीकृति और निर्माण प्रक्रिया शुरू हुई थी,तो वर्तमान में वह किस चरण में है,इसका स्पष्ट जवाब ग्रामीणों को मिलना चाहिए,क्योंकि सवाल अब केवल रसौकी की सड़क का नहीं है,सवाल यह है कि जिस प्रदेश में विकास की योजनाओं और करोड़ों की स्वीकृतियों की घोषणा होती है, उसी प्रदेश के एक गांव में बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को उसे कंधे पर बैठाकर नदी क्यों पार करानी पड़ रही है? और जब नदी पार करने के बाद बाइक भी कंधे पर उठानी पड़े,तो यह तस्वीर किसी एक विभाग की नहीं,बल्कि सड़क,पुल,स्वास्थ्य और प्रशासनिक प्राथमिकताओं की पूरी व्यवस्था से जवाब मांगती है।
एंबुलेंस गांव तक पहुंचेगी कैसे?
ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के दिनों में सड़क की स्थिति खराब होने के साथ नदी का जलस्तर बढ़ जाता है,ऐसे समय में 108 जैसी आपातकालीन सेवा के गांव तक पहुंचने में भी परेशानी होने की बात सामने आती है,यदि किसी गर्भवती महिला,बुजुर्ग या गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति को तत्काल अस्पताल ले जाना पड़े तो परिवार और ग्रामीणों को पहले नदी पार कराने की व्यवस्था करनी पड़ती है,यही कारण है कि ग्रामीणों की मांग केवल सड़क निर्माण तक सीमित नहीं है,वे चाहते हैं कि नदी पर स्थायी पुल बने,ताकि बारिश के दिनों में भी गांव का संपर्क बना रहे।
रसौकी-उमझर मार्ग बना सबसे बड़ी समस्या…
रसौकी क्षेत्र के ग्रामीणों के अनुसार रसौकी से उमझर के बीच बरंगा नदी कई स्थानों पर मार्ग को प्रभावित करती है,नदी के रास्ते और भूगोल के कारण बरसात में ग्रामीणों को अलग-अलग स्थानों से नदी पार करनी पड़ती है,सामाजिक कार्यकर्ता अवध यादव और ग्रामीण महेश यादव के अनुसार बरसात में ब्लॉक मुख्यालय की ओर जाने वाले रास्ते में ग्रामीणों को नदी को अलग-अलग स्थानों पर तीन बार तक पार करना पड़ता है,यानी सड़क केवल खराब नहीं है,बल्कि कई जगह नदी मार्ग को काट देती है,यही वजह है कि बरसात के दिनों में यह इलाका सामान्य ग्रामीण क्षेत्र के बजाय लगभग अलग-थलग क्षेत्र में बदल जाता है।
सरकार बदली तो क्या विकास कार्य भी बदल जाते हैं?
पूर्व विधायक पारसनाथ राजवाड़े का सवाल है कि यदि किसी सड़क और पुल के निर्माण के लिए राशि स्वीकृत हुई थी तो सरकार बदलने के बाद काम क्यों रोका गया,उनका तर्क है कि सरकारें बदलती रहती हैं,लेकिन सड़क और पुल किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं होते, ये जनता की जरूरत हैं,इसलिए यदि पूर्व सरकार के कार्यों को केवल राजनीतिक कारणों से रोका गया है तो इसका खामियाजा जनता को नहीं भुगतना चाहिए,यह आरोप राजनीतिक है और इसकी पुष्टि के लिए संबंधित विभाग से स्वीकृति,निविदा,कार्यादेश और भुगतान से जुड़े रिकॉर्ड सामने आना जरूरी है।
दूसरी ओर वर्तमान सरकार के विकास कार्यों का भी रिकॉर्ड मौजूद
यह भी महत्वपूर्ण है कि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में भी सूरजपुर जिले में सड़क और पुल निर्माण के लिए स्वीकृतियां जारी हुई हैं,अगस्त 2025 में छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग ने सूरजपुर में सड़क और पुल निर्माण के लिए 26.03 करोड़ रुपये से अधिक की स्वीकृति की जानकारी दी थी,इसमें ओड़गी क्षेत्र के चोंगा से भोडवानीपारा-मौहारीपारा तक पुल-पुलियों सहित सड़क निर्माण के लिए 6.04 करोड़ रुपये से अधिक की स्वीकृति भी शामिल थी,इससे स्पष्ट है कि क्षेत्र में सड़क-पुल निर्माण के लिए सरकारी स्तर पर स्वीकृतियां जारी होती रही हैं,लेकिन रसौकी के ग्रामीणों का सवाल है कि उनके गांव तक स्थायी संपर्क कब पहुंचेगा।


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