- धान की बोरी कम हुई तो रिजवान पर एफआईआर चली…कागज ओड़गी पहुंचा…फिर रास्ते में गायब!
- साधना निलंबित हैं…फिर भी कलेक्टर की बैठक में हाजिर…सहकारिता विभाग में नियमों का अपना ‘रूट’!
- सावारावां में धान की कमी पर कार्रवाई के लिए एफआईआर का पत्र शाखा प्रबंधक, जिला सहकारी केंद्रीय बैंक ओड़गी को भेजे जाने का दावा…
- सूत्रों का आरोप…कागज दबा दिया गया, शिवप्रसादनगर की साधना की कथित बैठक में मौजूदगी ने बढ़ाए सवाल…
- बर्खास्तगी के बाद बहाली,फिर निलंबन की स्थिति अब भी स्पष्ट नहीं,एक तरफ धान की कमी की भरपाई का मौका
- दूसरी तरफ एफआईआर की प्रक्रिया पर सवाल…सहकारिता विभाग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे गंभीर प्रश्न
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,01 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। सहकारिता विभाग में धान खरीदी से जुड़े मामलों में कार्रवाई और जवाबदेही का सवाल लगातार गहराता जा रहा है,सावारावां समिति में धान की कमी सामने आने के बाद धान खरीदी प्रभारी रिजवान के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू होने की जानकारी सामने आई है,बताया जा रहा है कि एफआईआर के लिए तैयार किया गया पत्र/दस्तावेज जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित,ओड़गी के शाखा प्रबंधक को दिया गया था लेकिन सूत्रों का दावा है कि यह कागज आगे पुलिस कार्रवाई के लिए बढ़ने के बजाय शाखा स्तर पर ही दबा दिया गया और एफआईआर दर्ज नहीं हो सकी,इस दावे की आधिकारिक पुष्टि अभी आवश्यक है। इधर शिवप्रसादनगर समिति की धान खरीदी प्रभारी साधना कुशवाहा का मामला भी अब इसी सवाल से जुड़ गया है,साधना को निलंबित किए जाने की जानकारी है,उनके संबंध में बर्खास्तगी के बाद बहाली और फिर निलंबन की कार्रवाई को लेकर भी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है,इसके बावजूद प्राप्त जानकारी के अनुसार वह जिला मुख्यालय में कलेक्टर द्वारा बुलाई गई बैठकों में बार-बार उपस्थित हो रही हैं,अब सवाल सीधा है यदि साधना कुशवाहा अभी भी निलंबित हैं तो कलेक्टर की बैठक में उनकी उपस्थिति किस हैसियत से हो रही है? और यदि उनका निलंबन समाप्त कर दिया गया है तो उसका आदेश सार्वजनिक क्यों नहीं है? दूसरी तरफ सावारावां में सवाल है की यदि रिजवान के विरुद्ध एफआईआर कराने का निर्णय हो चुका था और पत्र शाखा प्रबंधक तक पहुंच चुका था तो अपराध दर्ज क्यों नहीं हुआ? यानी एक तरफ एफआईआर का कागज, दूसरी तरफ निलंबन का आदेश दोनों ही अब जवाब मांग रहे हैं।
धान की कमी पूरी करने का अवसर भी चर्चा में-सावारावां मामले में यह भी जानकारी सामने आई है कि धान की कमी पाए जाने के बाद संबंधित पक्ष को कमी पूरी करने का अवसर दिया गया,यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एक तरफ एफआईआर की प्रक्रिया शुरू होने की बात कही जा रही थी, दूसरी तरफ कमी पूरी करने का अवसर दिया गया,अब यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि यह अवसर किस अधिकारी के आदेश पर,किस नियम के तहत और किस प्रक्रिया के अनुसार दिया गया,क्या कमी की भरपाई होने के बाद भी एफआईआर की प्रक्रिया जारी रहनी थी? क्या विभागीय और आपराधिक कार्रवाई अलग-अलग थी? क्या कमी पूरी होने के बाद स्टॉक का दोबारा सत्यापन हुआ? क्या उसकी रिपोर्ट तैयार हुई? और यदि कमी पूरी हो गई तो क्या इससे पहले की कथित अनियमितता स्वतः समाप्त हो जाती है? इन सवालों का जवाब संबंधित विभाग को देना होगा।
निलंबित प्रबंधक और फिर भी कमी शून्य करने की कवायद-सावारावां समिति के प्रबंधक के निलंबित होने की जानकारी भी सामने आई है,इसके बावजूद धान की कमी को शून्य करने की कवायद चलने की बात कही जा रही है,यदि कर्मचारी निलंबित है तो यह जानना जरूरी है कि कमी पूरी करने की प्रक्रिया की निगरानी कौन कर रहा है,क्या किसी अन्य अधिकारी को जिम्मेदारी दी गई? क्या समिति के स्टॉक का दोबारा भौतिक सत्यापन हुआ? क्या रिकॉर्ड और वास्तविक स्टॉक का मिलान किया गया? क्या कमी पूरी होने के बाद विभाग ने लिखित रूप से उसे स्वीकार किया? इन सभी सवालों के जवाब बिना दस्तावेज के नहीं मिल सकते।
अब शिवप्रसादनगर की साधना कुशवाहा का मामला-दूसरी ओर शिवप्रसादनगर समिति की धान खरीदी प्रभारी साधना कुशवाहा का मामला भी लंबे समय से सवालों में है,उनके विरुद्ध निलंबन की कार्रवाई किए जाने की जानकारी सामने आई है,साथ ही उनके संबंध में बर्खास्तगी के बाद बहाली को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं,यदि बर्खास्तगी हुई थी तो बहाली किस आदेश से हुई? किस अधिकारी ने बहाली की? किन परिस्थितियों में बहाली की गई? क्या विभागीय जांच में कोई निर्णय आया? क्या आरोप समाप्त किए गए? या बहाली के बाद फिर निलंबन की कार्रवाई की गई? इन सवालों का स्पष्ट जवाब अभी सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।
निलंबन के बाद कलेक्टर की बैठक में मौजूदगी ने बढ़ाया विवाद-मामले का सबसे नया और गंभीर पहलू साधना कुशवाहा की कलेक्टर द्वारा बुलाई गई बैठकों में कथित उपस्थिति है,प्राप्त जानकारी के अनुसार वह जिला मुख्यालय में आयोजित बैठकों में बार-बार उपस्थित हो रही हैं,यदि उनका निलंबन प्रभावी है तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि उन्हें बैठक में किस हैसियत से बुलाया गया। क्या कलेक्टर कार्यालय ने उन्हें आधिकारिक रूप से आमंत्रित किया? क्या सहकारिता विभाग ने उन्हें बैठक में भेजा? क्या बैठक में उनकी उपस्थिति केवल जानकारी देने के लिए थी? क्या निलंबित कर्मचारी को ऐसी बैठक में उपस्थित रहने की अनुमति देने वाला कोई आदेश है? या फिर उनके निलंबन की स्थिति बदल चुकी है?
निलंबन जारी है तो आदेश दिखाइए, बहाली हुई है तो वह भी बताइए-इस पूरे मामले का समाधान बेहद सरल है, यदि साधना कुशवाहा अभी भी निलंबित हैं तो उनका वर्तमान निलंबन आदेश सामने रखा जाए और यह बताया जाए कि उन्हें कलेक्टर की बैठक में किस अधिकार से शामिल किया गया,यदि उनका निलंबन समाप्त हो चुका है तो निलंबन समाप्ति या बहाली का आदेश सार्वजनिक किया जाए,यदि वह केवल बैठक में जानकारी देने के लिए अधिकृत थीं तो उस अनुमति का पत्र सामने रखा जाए,इससे पूरा विवाद खत्म हो सकता है, लेकिन जब रिकॉर्ड सामने नहीं आता तो सवाल बढ़ते जाते हैं।
क्या निलंबन सिर्फ कागज पर रह गया?-यहीं से सहकारिता विभाग की कार्यप्रणाली पर व्यंग्यात्मक सवाल खड़ा होता है,‘‘कागज कहता है…निलंबित,बैठक कहती है…हाजिर’’,तो फिर जनता किसे सही माने? अगर कर्मचारी कार्य से पृथक है तो बैठक में क्यों? और अगर बैठक में आना जरूरी है तो निलंबन की वास्तविक सीमा क्या है? क्या निलंबन का अर्थ सिर्फ इतना है कि कर्मचारी अपने पुराने पद पर नहीं बैठेगा, लेकिन जरूरत पड़ने पर जिला मुख्यालय की बैठकों में उपस्थित हो सकता है? यदि ऐसा नियम है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
बर्खास्तगी से बहाली तक की फाइल भी सार्वजनिक हो-साधना कुशवाहा के मामले में बर्खास्तगी और बहाली की स्थिति स्पष्ट करना भी जरूरी है,यदि किसी कर्मचारी को बर्खास्त किया गया और बाद में बहाल किया गया तो यह सामान्य प्रशासनिक घटना नहीं है,उसके पीछे आदेश,कारण और सक्षम अधिकारी की स्वीकृति होनी चाहिए,फिर यदि उसी कर्मचारी को निलंबित किया गया तो निलंबन का आधार भी स्पष्ट होना चाहिए,यानी पूरा घटनाक्रम एक समयरेखा में सामने आना चाहिए बर्खास्तगी ? बहाली ? निलंबन ? वर्तमान स्थिति ? कलेक्टर बैठक में उपस्थिति, तभी यह पता चलेगा कि वास्तव में प्रशासनिक स्तर पर क्या हुआ।
शिवप्रसादनगर समिति में दोबारा प्रभार पर भी सवाल- पूरे प्रकरण में एक और आरोप यह भी है कि पूर्व में अनियमितता अथवा वित्तीय गड़बड़ी के मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को शिवप्रसादनगर समिति का प्रभार दोबारा सौंपा गया,यदि यह तथ्य रिकॉर्ड से प्रमाणित होता है तो इसकी भी जांच होनी चाहिए, किस अधिकारी ने प्रभार सौंपा? क्या सक्षम अनुमति ली गई? क्या पूर्व कार्रवाई का रिकॉर्ड देखा गया? क्या कोई विभागीय रोक थी? यदि संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई लंबित थी तो फिर उसे दोबारा महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने का औचित्य क्या था?
‘संरक्षण तंत्र’ की चर्चा क्यों?- सावारावां में एफआईआर के लिए कागज जाने के बाद अपराध दर्ज न होना और शिव प्रसादनगर में निलंबन के बावजूद साधना की कथित बैठक में मौजूदगी—इन दोनों घटनाओं को लेकर क्षेत्र में अब तरह-तरह की चर्चाएं हैं, इसी बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या सहकारिता विभाग में पहुंच और संरक्षण का कोई तंत्र काम कर रहा है? यह आरोप है, प्रमाणित तथ्य नहीं, लेकिन यदि विभाग इस तरह की चर्चाओं को गलत मानता है तो उसे दस्तावेज सामने रखकर स्थिति स्पष्ट करने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।
क्या ‘गलती करो और बाद में मामला सेटल करो’ जैसी व्यवस्था है?-धान खरीदी समिति में अनियमितता का मामला किसानों और सरकारी संपत्ति से जुड़ा होता है,इसलिए यदि धान की कमी सामने आती है तो जिम्मेदारी तय करना जरूरी है,लेकिन यदि पहले एफआईआर की प्रक्रिया शुरू हो,फिर कमी पूरी करने का मौका मिले और बाद में एफआईआर ही दर्ज न हो,तो सवाल उठना स्वाभाविक है, इसी तरह यदि निलंबित कर्मचारी को महत्वपूर्ण बैठकों में उपस्थित होने की अनुमति मिलती है तो उस अनुमति का आधार भी स्पष्ट होना चाहिए,वरना जनता के बीच यह धारणा बनती है कि क्या यहां नियम से ज्यादा पहुंच काम करती है? इस धारणा को खत्म करने की जिम्मेदारी संबंधित विभाग की है।
जांच में किन दस्तावेजों की जरूरत?
मामले को पूरी तरह साफ करने के लिए निम्न रिकॉर्ड सामने लाए जाने चाहिए…
सावारावां समिति
धान की कमी की जांच रिपोर्ट।
रिजवान के विरुद्ध एफआईआर की अनुशंसा/पत्र।
शाखा प्रबंधक, जिला सहकारी केंद्रीय बैंक ओड़गी को भेजा गया पत्र।
पत्र की प्राप्ति का रिकॉर्ड।
थाने को भेजे गए दस्तावेज।
एफआईआर दर्ज नहीं होने की स्थिति में उसका कारण।
धान की कमी पूरी करने का आदेश।
दोबारा स्टॉक सत्यापन रिपोर्ट।
निलंबन आदेश और वर्तमान स्थिति।
शिवप्रसादनगर समिति
साधना कुशवाहा के विरुद्ध मूल कार्रवाई आदेश।
बर्खास्तगी आदेश, यदि जारी हुआ था।
बहाली आदेश, यदि जारी हुआ था।
वर्तमान निलंबन आदेश।
कलेक्टर की संबंधित बैठकों की उपस्थिति सूची।
बैठक में बुलाने का पत्र/अनुमति।
समिति का प्रभार सौंपने संबंधी आदेश।
अब कलेक्टर से भी जवाब की उम्मीद
इस मामले में जिला प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है,यदि साधना कुशवाहा निलंबित होने के बावजूद कलेक्टर की बैठकों में उपस्थित हुई हैं तो जिला प्रशासन को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए,कलेक्टर कार्यालय के पास बैठक की उपस्थिति का रिकॉर्ड होता है,इसी तरह संबंधित विभाग के पास निलंबन और बहाली के आदेश होने चाहिए,इसलिए सवाल का जवाब देना कठिन नहीं है।
क्षेत्रवासी कलेक्टर और मंत्री से मिलेंगे
मामले को लेकर क्षेत्रवासियों में नाराजगी की जानकारी सामने आ रही है, बताया जा रहा है कि वे जल्द ही जिला कलेक्टर और संबंधित विभाग के मंत्री से मुलाकात कर सावारावां और शिवप्रसादनगर समितियों के मामलों की निष्पक्ष जांच की मांग करेंगे,क्षेत्रवासियों की मांग है कि एफआईआर की स्थिति स्पष्ट हो,धान की कमी का पूरा हिसाब सामने आए,निलंबन और बहाली के आदेश सार्वजनिक किए जाएं तथा यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका नियम विरुद्ध पाई जाती है तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए,अब सवाल दो समितियों का नहीं, व्यवस्था की विश्वसनीयता का है सावारावां में रिजवान के खिलाफ एफआईआर के लिए कागज चलने और ओड़गी शाखा प्रबंधक तक पहुंचने का दावा है, लेकिन एफआईआर दिखाई नहीं देती,सूत्र आरोप लगा रहे हैं कि कागज दबा दिया गया,वहीं शिवप्रसादनगर में साधना कुशवाहा का निलंबन बताया जा रहा है,लेकिन कलेक्टर की बैठकों में उनकी कथित उपस्थिति सवाल खड़े कर रही है,एक तरफ सवाल है…‘रिजवान की एफआईआर का कागज कहां अटका?’दूसरी तरफ— ‘साधना निलंबित हैं तो कलेक्टर की बैठक में कैसे पहुंचीं?’ और तीसरा सवाल दोनों मामलों को जोड़ता है…सहकारिता विभाग में कार्रवाई वास्तव में नियम से हो रही है या फाइलों की गति के पीछे कोई और व्यवस्था काम कर रही है?
सावारावां में धान की कमी से शुरू हुआ मामला
सावारावां धान खरीदी समिति में खरीदी के दौरान धान की कमी पाए जाने की बात सामने आई थी,मामले को लेकर विभागीय स्तर पर जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हुई,जानकारी के अनुसार धान खरीदी प्रभारी रिजवान के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराने के लिए आवश्यक दस्तावेज तैयार किए गए,यह भी बताया जा रहा है कि एफआईआर के लिए संबंधित पत्र जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित ओड़गी के शाखा प्रबंधक को दिया गया था,यहीं से मामला एक नए सवाल में बदल गया,यदि शाखा प्रबंधक के पास एफआईआर कराने से संबंधित दस्तावेज पहुंचा था तो उसके बाद क्या हुआ? क्या उसे थाने भेजा गया? क्या पुलिस को दस्तावेज प्राप्त हुए? यदि प्राप्त हुए तो एफआईआर क्यों दर्ज नहीं हुई? और यदि शाखा प्रबंधक स्तर पर ही मामला रुका तो किस कारण से? इन सवालों का जवाब संबंधित दस्तावेजों और पत्राचार से ही मिल सकता है।
सूत्रों का दावा…एफआईआर का कागज दबा दिया गया
इस मामले में सूत्रों का दावा सबसे गंभीर है, सूत्रों के अनुसार रिजवान के खिलाफ एफआईआर कराने के लिए भेजा गया कागज शाखा प्रबंधक के स्तर पर दबा दिया गया,जिसके कारण मामला पुलिस तक आगे नहीं बढ़ सका,यह फिलहाल सूत्रों का दावा है और इसकी स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि जरूरी है,लेकिन यदि यह दावा सही साबित होता है तो सवाल केवल रिजवान तक सीमित नहीं रहेगा,तब यह जांच का विषय होगा कि एफआईआर की कार्रवाई रोकने का निर्णय किस स्तर पर लिया गया और उसके पीछे क्या कारण था,किसी मामले में अपराध दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू करने के बाद उसे रोकना सामान्य प्रशासनिक निर्णय नहीं माना जा सकता,यदि विभाग को लगता था कि एफआईआर आवश्यक नहीं है तो उसका कारण रिकॉर्ड में होना चाहिए,और यदि एफआईआर जरूरी थी तो फिर उसे आगे बढ़ाने में देरी क्यों हुई?
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