Breaking News

सूरजपुर/कुदरगढ़@रोपवे बना ‘सपनों का सफर’! घोषणा,अनुबंध और भूमिपूजन के बाद भी श्रद्धालुओं का इंतजार

Share

  • पहले बिना ट्रस्ट पर आर्थिक बोझ के रोपवे लगाने का प्रस्ताव,फिर बदला मॉडल करोड़ों की राशि और अनुबंध के बीच अब निर्माण की गति पर उठ रहे सवाल
  • एक साल पहले ‘घटती घटना’ ने चेताया था…अब जमीन पर निर्माण की बारी
  • 8 जून 2025 को उठे सवाल आज भी कायम, अनुबंध से भूमिपूजन तक पहुंची परियोजना के बाद भी रोपवे का इंतजार
  • पहले समझौता बदला,फिर टेंडर और अनुबंध हुआ, अब निर्माण की रफ्तार पर सवाल, आखिर कब पूरा होगा कुदरगढ़ रोपवे?
  • घटती-घटना’ की पुरानी खबर से वर्तमान तक, तब समझौता बदलने पर सवाल था, अब करोड़ों की परियोजना की प्रगति पर नजर
  • वर्चस्व से विकास तक उलझा कुदरगढ़ रोपवे? पुरानी खबर के सवालों के बाद अब करोड़ों की परियोजना की जमीनी हकीकत पर नजर


-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर/कुदरगढ़,25 अगस्त 2026 (घटती-घटना)।
कुदरगढ़मां कुदरगढ़ी का दरबार केवल सूरजपुर जिले ही नहीं, बल्कि पूरे सरगुजा संभाग के प्रमुख आस्था केंद्रों में गिना जाता है,पहाड़ी पर विराजमान मां के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं को लंबी चढ़ाई और सैकड़ों सीढि़यां पार करनी पड़ती हैं,सामान्य श्रद्धालु तो किसी तरह माता के दरबार तक पहुंच जाते हैं,लेकिन बुजुर्गों,दिव्यांगों,छोटे बच्चों और शारीरिक रूप से कमजोर श्रद्धालुओं के लिए यह चढ़ाई आज भी बड़ी चुनौती है,यही वजह है कि कुदरगढ़ में रोपवे निर्माण की मांग वर्षों से उठती रही है। रोपवे को लेकर लंबे समय तक सरकार और ट्रस्ट के सामने सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक संसाधनों की रही,इसी बीच ऐसा प्रस्ताव सामने आया,जिसमें बिना सरकारी अथवा ट्रस्ट की बड़ी राशि खर्च किए निजी कंपनी द्वारा रोपवे निर्माण किए जाने की बात कही गई,कंपनी अपनी पूंजी से निर्माण करती और निर्धारित अवधि तक रोपवे संचालन से प्राप्त किराये के माध्यम से अपनी लागत तथा रखरखाव का खर्च निकालती,इसके बाद रोपवे को ट्रस्ट को सौंपे जाने अथवा नए समझौते के विकल्प की बात सामने आई,इस प्रस्ताव को लेकर उम्मीद जगी कि वर्षों से लंबित श्रद्धालुओं की सुविधा आखिरकार बिना सरकारी खजाने पर बड़ा बोझ डाले पूरी हो सकेगी,मुख्यमंत्री की मौजूदगी में इस दिशा में अनुबंध/एमओयू की प्रक्रिया आगे बढ़ने की जानकारी भी सामने आई, इसके बाद लोगों को लगा कि अब कुदरगढ़ की पहाड़ी पर रोपवे केवल कागजों में नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देगा,लेकिन इसके बाद परियोजना की दिशा बदल गई।
पहले मॉडल पर क्यों लगा विराम?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब एक कंपनी अपने खर्च पर रोपवे लगाने को तैयार थी,तब उस व्यवस्था को आगे क्यों नहीं बढ़ाया गया? क्या प्रस्तावित अनुबंध की शर्तें ट्रस्ट के हित में नहीं थीं? यदि नहीं थीं तो इसकी कमियां क्या थीं? और यदि शर्तें स्वीकार्य थीं तो बाद में उसे बदलने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इन्हीं सवालों ने कुदरगढ़ रोपवे परियोजना को लेकर विवाद को जन्म दिया है, ट्रस्ट से जुड़े लोगों और स्थानीय सूत्रों के अनुसार बाद में रोपवे निर्माण की प्रक्रिया को दूसरे मॉडल में ले जाया गया, इसके बाद दूसरी कंपनी के साथ अनुबंध किए जाने और अग्रिम राशि दिए जाने की चर्चा सामने आई,दावा किया जा रहा है कि लगभग दो करोड़ रुपये की अग्रिम राशि भी दी जा चुकी है, यहीं से परियोजना का मामला और गंभीर हो जाता है।
दो करोड़ की अग्रिम राशि के बाद भी काम शुरू क्यों नहीं?
यदि वास्तव में ट्रस्ट द्वारा करीब दो करोड़ रुपये की अग्रिम राशि संबंधित कंपनी को दी जा चुकी है,तो सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि उस भुगतान के बाद जमीन पर काम कितना आगे बढ़ा? एग्रीमेंट में यदि निर्माण की समय-सीमा निर्धारित थी, तो वह समय-सीमा क्या थी? क्या कंपनी ने समय पर कार्य प्रारंभ किया? यदि नहीं किया तो ट्रस्ट ने अब तक क्या कार्रवाई की? क्या अनुबंध में विलंब के लिए जुर्माने अथवा अनुबंध समाप्त करने का प्रावधान है? इन सवालों का जवाब ट्रस्ट के वित्तीय और प्रशासनिक रिकॉर्ड से ही स्पष्ट हो सकता है, स्थानीय लोगों का कहना है कि रोपवे की घोषणा और निर्माण की प्रक्रिया को लेकर कई बार उम्मीद जगी,लेकिन परियोजना को जमीन पर गति नहीं मिल सकी। श्रद्धालुओं को आज भी उसी पहाड़ी रास्ते और सीढि़यों से होकर माता के दरबार तक पहुंचना पड़ रहा है।
नेताओं के वर्चस्व की चर्चा ने बढ़ाई राजनीतिक गर्मी- कुदरगढ़ रोपवे को लेकर एक और चर्चा स्थानीय स्तर पर लगातार होती रही है, सूत्रों का दावा है कि परियोजना को लेकर ट्रस्ट और स्थानीय राजनीतिक प्रभाव से जुड़े लोगों के बीच वर्चस्व का सवाल भी सामने आया,यह भी चर्चा रही कि जिस समय बिना ट्रस्ट की बड़ी राशि खर्च किए रोपवे लगाने का मॉडल तैयार हुआ था, उस समय योजना का श्रेय कुछ लोगों को मिलने लगा। इसके बाद परियोजना के मॉडल में बदलाव की स्थिति बनी,हालांकि वर्चस्व की लड़ाई या किसी व्यक्ति को निजी/आंतरिक लाभ पहुंचाने के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, इसलिए इन आरोपों की वास्तविकता जानने के लिए ट्रस्ट की बैठकों की कार्यवाही, प्रस्ताव,अनुबंध और निर्णय प्रक्रिया सामने आना जरूरी है,यदि वास्तव में केवल राजनीतिक अथवा व्यक्तिगत श्रेय की प्रतिस्पर्धा के कारण किसी ऐसी योजना को बदला गया,जिससे ट्रस्ट पर आर्थिक बोझ बढ़ा,तो यह गंभीर प्रशासनिक प्रश्न होगा, लेकिन यदि पहले प्रस्ताव को तकनीकी,कानूनी अथवा आर्थिक कारणों से निरस्त किया गया था,तो ट्रस्ट को उन कारणों को सार्वजनिक करना चाहिए।
यदि पहला मॉडल गलत था तो मुख्यमंत्री के सामने अनुबंध क्यों?-इस पूरे घटनाक्रम में सबसे असहज करने वाला प्रश्न मुख्यमंत्री की मौजूदगी में हुए समझौते को लेकर है,यदि किसी मॉडल को मुख्यमंत्री के समक्ष प्रस्तुत किया गया,उस पर सहमति बनी और अनुबंध/एमओयू की प्रक्रिया आगे बढ़ी,तो बाद में उसमें परिवर्तन क्यों किया गया? क्या मुख्यमंत्री के समक्ष रखी गई परियोजना और बाद में अपनाई गई परियोजना में कोई अंतर था? क्या ट्रस्ट की बैठक में पुराने प्रस्ताव को निरस्त करने का विधिवत प्रस्ताव पारित हुआ? क्या पुराने समझौते को खत्म करने से किसी पक्ष पर वित्तीय अथवा कानूनी दायित्व आया? यदि ये सभी निर्णय नियमों के अनुसार लिए गए तो ट्रस्ट को इन्हें सार्वजनिक करने में संकोच नहीं होना चाहिए।
कुदरगढ़ के श्रद्धालुओं को आखिर कब मिलेगी सुविधा?-कुदरगढ़ में हर साल नवरात्रि और अन्य अवसरों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं,भीड़ के समय पहाड़ी पर चढ़ना और उतरना अपने आप में चुनौती बन जाता है,बुजुर्गों और दिव्यांग श्रद्धालुओं की परेशानी और बढ़ जाती है,ऐसे में रोपवे कोई विलासिता की परियोजना नहीं,बल्कि श्रद्धालुओं की सुविधा से जुड़ी महत्वपूर्ण आवश्यकता है,लेकिन जिस सुविधा के लिए वर्षों से मांग उठ रही है, उसके निर्माण में यदि घोषणा से लेकर अनुबंध और अनुबंध से लेकर भुगतान तक बार-बार बदलाव होता रहेगा,तो परियोजना का भविष्य स्वाभाविक रूप से सवालों के घेरे में आएगा।
दैनिक घटती घटना ने पहले भी उठाया था सवाल- कुदरगढ़ रोपवे को लेकर दैनिक घटती घटना ने 8 जून 2025 को भी प्रमुखता से खबर प्रकाशित की थी, उस समय प्रकाशित खबर की मुख्य हेडिंग थी— ‘क्या मां के दरबार कुदरगढ़ में रोप-वे निर्माण में दो नेता के वर्चस्व की लड़ाई डाल सालती है खलल?’ खबर में ट्रस्ट की बैठक में रोपवे निर्माण के लिए ठेकेदार के साथ हुए अनुबंध को निरस्त करने की तैयारी,श्रद्धालुओं की सुविधा के बजाय ट्रस्ट की कमाई को लेकर उठ रहे सवाल, मुख्यमंत्री की उपस्थिति में हुए अनुबंध और बाद में उसे निरस्त करने की तैयारी जैसे मुद्दे प्रमुखता से उठाए गए थे, उस पूर्व प्रकाशित रिपोर्ट में यह भी सवाल उठाया गया था कि जब एक कंपनी अपने खर्च पर रोपवे लगाने को तैयार थी और वह निर्धारित अवधि तक रोपवे से मिलने वाले किराये से अपनी लागत तथा रखरखाव खर्च निकालने वाली थी,तब उस मॉडल को बदलने की जरूरत क्यों पड़ी? रिपोर्ट में यह आरोप/चर्चा भी सामने रखी गई थी कि ट्रस्ट के भीतर दो प्रभावशाली पक्षों के बीच वर्चस्व की लड़ाई के कारण परियोजना प्रभावित हो रही है, हालांकि उस समय भी यह स्पष्ट किया गया था कि किसी व्यक्ति को निजी या आंतरिक लाभ पहुंचाने संबंधी दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
उसी खबर में एक और महत्वपूर्ण सवाल पूछा गया था- जब ट्रस्ट को फायदा नहीं हो रहा था तो फिर उन्होंने अनुबंध क्यों किया? रिपोर्ट के अनुसार मुख्यमंत्री की मौजूदगी में अनुबंध की तस्वीर सार्वजनिक होने के बाद श्रद्धालुओं को लगा था कि रोपवे निर्माण का रास्ता साफ हो गया है,लेकिन कुछ ही समय बाद अनुबंध को लेकर आपत्ति और उसे निरस्त करने की चर्चा सामने आने लगी। इसी कारण यह सवाल उठाया गया था कि यदि समझौता ट्रस्ट के हित में नहीं था तो उसे पहले स्वीकार क्यों किया गया और यदि वह उचित था तो बाद में उसे बदलने की जरूरत क्यों पड़ी? पूर्व प्रकाशित खबर में ट्रस्ट के निर्माण समिति के अध्यक्ष भीमसेन अग्रवाल द्वारा कुदरगढ़ के विकास के लिए रोपवे की योजना आगे बढ़ाने की भूमिका का भी उल्लेख किया गया था,वहीं ट्रस्ट अध्यक्ष रामसेवक पैकरा के नेतृत्व में बाद की निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए यह पूछा गया था कि क्या परियोजना को लेकर श्रेय और वर्चस्व की राजनीति श्रद्धालुओं की सुविधा पर भारी पड़ रही है, इन आरोपों की पुष्टि के लिए ट्रस्ट की बैठक की कार्यवाही और संबंधित दस्तावेज जरूरी हैं।
दैनिक घटती घटना में प्रकाशित खबर अब इस पूरे मामले की टाइमलाइन का अहम हिस्सा-उस खबर में उठाए गए सवालों के बाद सामने आए नए घटनाक्रम यह जानने का आधार देते हैं कि क्या पहले उठाए गए संदेह दूर हुए या परियोजना की प्रक्रिया ने नए सवाल खड़े कर दिए,इसलिए अब ट्रस्ट को पुराने और वर्तमान दोनों समझौतों की शर्तें सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए,उस समय भी मूल सवाल यही था कि श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए वर्षों से प्रस्तावित रोपवे आखिर कब जमीन पर उतरेगा,आज स्थिति यह है कि परियोजना के विभिन्न चरणों से संबंधित घोषणाएं, अनुबंध और भूमिपूजन जैसी प्रक्रियाएं सामने आने के बावजूद वास्तविक निर्माण की स्थिति को लेकर सवाल कायम हैं,यही कारण है कि इस बार सवाल को केवल आरोपों तक सीमित रखने के बजाय दस्तावेजों के आधार पर जवाब मांगना जरूरी है,अप्रैल 2025 की सरकारी घोषणा, अगस्त 2025 की निविदा और अनुबंध प्रक्रिया, सितंबर 2025 का भूमिपूजन और फरवरी 2026 में बजट प्रावधान—इन सभी घटनाक्रमों के बीच परियोजना की वास्तविक प्रगति का एक स्पष्ट टाइमलाइन ट्रस्ट और प्रशासन को सार्वजनिक करना चाहिए,विशेष रूप से यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि 13 माह की बताई गई निर्माण अवधि किस तारीख से प्रभावी हुई,कार्यारंभ की औपचारिक तारीख क्या है और अब तक कितने प्रतिशत निर्माण का लक्ष्य पूरा हुआ है, अगस्त 2025 की रिपोर्ट में 13 माह की समयसीमा और अग्रिम राशि के बाद 21 दिन में औपचारिक कार्यारंभ की शर्त बताई गई थी।
ट्रस्ट को सामने रखना चाहिए पूरा हिसाब- कुदरगढ़ ट्रस्ट यदि इस विवाद को समाप्त करना चाहता है तो उसे केवल बयान जारी करने के बजाय पूरा दस्तावेजी हिसाब सार्वजनिक करना चाहिए, ट्रस्ट को स्पष्ट करना चाहिए—
पहलाः शुरुआती रोपवे प्रस्ताव में कंपनी की भूमिका क्या थी?
दूसराः कंपनी अपने खर्च पर निर्माण करने को तैयार थी या नहीं?
तीसराः उस प्रस्ताव को क्यों निरस्त किया गया?
चौथाः नए ठेकेदार का चयन किस प्रक्रिया से हुआ?
पांचवांः कुल अनुबंध राशि कितनी है?
छठाः अग्रिम के रूप में कितनी राशि दी गई?
सातवांः दो करोड़ रुपये के भुगतान का स्रोत और स्वीकृति किस बैठक में हुई?
आठवांः काम शुरू करने की अंतिम तारीख क्या थी?
नौवांः अब तक काम शुरू नहीं होने पर कंपनी के विरुद्ध क्या कार्रवाई की गई?
दसवांः यदि अनुबंध समाप्त होता है तो अग्रिम राशि की वापसी कैसे होगी?

अब सवाल केवल रोपवे का नहीं,जवाबदेही का है– कुदरगढ़ के श्रद्धालुओं को अब नई घोषणा नहीं चाहिए। उन्हें तारीख चाहिए, उन्हें यह जानना है कि रोपवे कब बनेगा, किस कंपनी द्वारा बनेगा, कितने पैसे में बनेगा और इसके निर्माण की जिम्मेदारी किसकी होगी, यदि पहले ऐसी व्यवस्था थी जिसमें ट्रस्ट को अपनी राशि खर्च नहीं करनी पड़ती और निजी कंपनी अपने निवेश से परियोजना खड़ी करने को तैयार थी, तो उस मॉडल को बदलने का कारण सामने आना चाहिए, और यदि वर्तमान व्यवस्था आर्थिक और तकनीकी रूप से बेहतर है, तो फिर निर्माण में देरी क्यों? कुदरगढ़ में रोपवे का सपना अब घोषणा, अनुबंध और बैठकों के बीच नहीं अटकना चाहिए, मां के दरबार तक पहुंचने के लिए श्रद्धालु वर्षों से सीढि़यां चढ़ रहे हैं, अब सवाल यह है कि क्या जिम्मेदार लोग भी इस परियोजना की फाइल की सीढि़यां चढ़ते-उतरते रहेंगे, या कभी रोपवे की केबिन सचमुच पहाड़ी पर चलती दिखाई देगी?
बड़े सवाल…
बिना ट्रस्ट पर बड़ा आर्थिक बोझ डाले रोपवे लगाने का प्रस्ताव क्यों बदला गया?
पुराने समझौते को निरस्त करने का वास्तविक कारण क्या था?
नए अनुबंध में कितनी राशि तय हुई और अब तक कितनी राशि दी गई?
दो करोड़ रुपये की अग्रिम राशि की सुरक्षा क्या है?
निर्धारित समय में काम शुरू नहीं हुआ तो जिम्मेदारी किसकी है?
क्या अनुबंध में समय-सीमा और पेनल्टी की शर्तें हैं?
यदि समझौता समाप्त हुआ तो अग्रिम राशि वापस मिलेगी या नहीं?
श्रद्धालुओं की सुविधा से जुड़ी परियोजना आखिर कब पूरी होगी?

और सबसे बड़ा सवाल—कुदरगढ़ रोपवे में बार-बार बदलते फैसलों का अंतिम लाभ किसे और आर्थिक जोखिम किसे उठाना पड़ेगा?
पांच करोड़ का अनुबंध,तीन करोड़ के भुगतान की चर्चा
परियोजना से जुड़े सूत्रों के अनुसार जिस कंपनी के साथ नया समझौता हुआ, उसके साथ लगभग पांच करोड़ रुपये के अनुबंध की चर्चा है, इसमें से करीब दो करोड़ रुपये अग्रिम भुगतान किए जाने और शेष लगभग तीन करोड़ रुपये के भुगतान को लेकर विवाद अथवा असहमति की स्थिति होने की बात कही जा रही है, हालांकि इस राशि और भुगतान की स्थिति की आधिकारिक पुष्टि संबंधित दस्तावेजों से होना आवश्यक है, यदि यह जानकारी सही है तो सवाल केवल रोपवे निर्माण में देरी का नहीं, बल्कि सार्वजनिक/ट्रस्ट राशि के वित्तीय प्रबंधन का भी है, जब कंपनी को दो करोड़ रुपये अग्रिम दिए गए, तो उसके बाद निर्माण कार्य क्यों नहीं बढ़ा? क्या शेष राशि का भुगतान नहीं होने के कारण काम रुका है? यदि ऐसा है तो भुगतान की शर्तें किसने तय की थीं? क्या ट्रस्ट के पास परियोजना को पूरा कराने के लिए पर्याप्त वित्तीय व्यवस्था थी? और सबसे महत्वपूर्ण— यदि अनुबंध की शर्तें पूरी नहीं होतीं तो अग्रिम दो करोड़ रुपये की सुरक्षा कैसे होगी? क्या दो करोड़ रुपये भी डूबने के खतरे में? यही वह सवाल है जिसने ट्रस्ट के आजीवन सदस्यों और स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ा दी है, यदि अनुबंध की निर्धारित अवधि समाप्त हो जाती है और काम पूरा नहीं होता, तो अग्रिम राशि का क्या होगा? क्या कंपनी राशि वापस करेगी? क्या ट्रस्ट उसे जब्त कर सकता है? क्या बैंक गारंटी अथवा सिक्योरिटी डिपॉजिट की व्यवस्था है? क्या अनुबंध में अग्रिम भुगतान की वापसी का स्पष्ट प्रावधान है? इन सवालों का जवाब सार्वजनिक होना चाहिए, क्योंकि यदि ट्रस्ट की राशि किसी परियोजना में अग्रिम के रूप में दी गई है तो वह केवल ट्रस्ट के पदाधिकारियों का मामला नहीं है, यह श्रद्धालुओं और उस धार्मिक संस्था से जुड़ा वित्तीय प्रश्न है, जिसकी प्राथमिक जिम्मेदारी धाम की व्यवस्था और श्रद्धालुओं की सुविधा सुनिश्चित करना है।


Share

Check Also

सूरजपुर@ टेट के खिलाफ शिक्षकों का शंखनाद,सूरजपुर में गूंजी ‘टेट मुक्ति’ की आवाज

Share शिक्षक संघर्ष मोर्चा ने निकाली रैली, पांच सूत्रीय मांगों को लेकर मुख्यमंत्री शिक्षा मंत्री …

Leave a Reply