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भैयाथान/सूरजपुर@ खाते में पैसा दिखा तो ‘कैश प्लान’ क्यों बना? भैयाथान सहकारी बैंक में समिति की रकम पर उठे सवाल

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  • समितियों के खाते में करोड़ों, समिति का पैसा,कैश का रास्ता और धान का हिसाब—भैयाथान सहकारी बैंक में लेनदेन की पूरी पड़ताल जरूरी
  • फिर कैश में निकासी क्यों? भैयाथान सहकारी बैंक पर उठे सवाल…
  • धान खरीदी केंद्रों पर बैठकें,समितियों से कैश निकासी! भैयाथान बैंक शाखा प्रबंधक की भूमिका पर सवाल…
  • समिति के पैसे का ‘कैश कनेक्शन’! बड़े आहरण से खुली वित्तीय निगरानी की पोल धान खरीदी के नाम पर
  • समितियों की रकम का खेल? कैश निकासी ने बढ़ाई जांच की मांग…
  • बैंक खाते से कैश निकला,हिसाब कौन देगा? भैयाथान सहकारी समितियों के लेनदेन पर सवाल…
  • शिवप्रसाद नगर से शुरू हुआ सवाल,बाकी समितियों तक पहुंची आशंका…कहां जा रहा है कैश?
  • करोड़ों की समिति राशि और लगातार नकद आहरण…भैयाथान सहकारी बैंक में निगरानी पर बड़ा सवाल…
  • धान खरीदी का शॉर्टेज या समिति की रकम? कैश निकासी के पीछे,क्या है असली कहानी
  • समितियों के खाते ‘भरे’,बैंक शाखा से बाहर ‘बैठकें’…भैयाथान में वित्तीय लेनदेन पर सवाल…
  • कैश निकासी का हिसाब दो! समिति की रकम किस मद में गई,भैयाथान सहकारी बैंक से जवाब की मांग
  • धान खरीदी केंद्रों में बैठकें और बैंक शाखा से बाहर रहने के आरोप, सवाल…राशि खाते में ट्रांसफर होने के
  • बजाय कैश में क्यों निकली?


-ओंकार पाण्डेय-
भैयाथान/सूरजपुर,24 अगस्त 2026 (घटती-घटना)।
जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित की भैयाथान शाखा से जुड़ी समितियों के वित्तीय लेनदेन को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं, आरोप है कि धान खरीदी से जुड़ी कुछ समितियों के बचत खातों से बड़ी रकम नकद निकाली गई और इन आहरणों के उद्देश्य तथा उपयोग को लेकर पर्याप्त पारदर्शिता दिखाई नहीं दे रही है,मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि समितियों के वित्तीय लेनदेन की निगरानी में बैंक शाखा की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि समिति के खाते से पैसा निकाला गया या नहीं,बल्कि सवाल यह है कि इतनी बड़ी राशि नकद निकालने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी? यदि किसी संस्था को किसी व्यक्ति, मजदूर, सेवा प्रदाता या अन्य वैध भुगतानकर्ता को राशि देनी थी,तो क्या भुगतान बैंकिंग माध्यम से नहीं किया जा सकता था? यदि नकद भुगतान जरूरी था तो उसके पीछे किस मद का खर्च था,किसके आदेश पर राशि निकाली गई और बाद में उसका हिसाब किस दस्तावेज से किया गया?
शाखा प्रबंधक की भूमिका पर भी सवाल-इस मामले में भैयाथान शाखा के शाखा प्रबंधक श्यामलाल सिंह की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं,आरोप है कि शाखा प्रबंधक का ध्यान बैंक शाखा के नियमित कार्यों की तुलना में धान खरीदी केंद्रों से जुड़े कामकाज पर अधिक दिखाई देता है और वे लगातार खरीदी केंद्रों में बैठकें लेते हैं,हालांकि किसी अधिकारी का समिति या धान खरीदी केंद्र में जाना अपने आप में अनियमितता नहीं है। लेकिन यदि आरोप यह है कि बैठकों में समितियों के खातों में उपलब्ध राशि को निकालने या खर्च करने की रणनीति तैयार होती है,तो इसकी स्वतंत्र जांच आवश्यक है, फिलहाल यह आरोप है,प्रमाणित तथ्य नहीं, इसलिए जांच में बैंक रिकॉर्ड, समिति की बैठक कार्यवाही और भुगतान दस्तावेजों के आधार पर ही यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि वास्तव में कौन किस निर्णय में शामिल था।
बैंक प्रतिनिधि के रूप में निगरानी कितनी हुई?-सहकारी समितियों के बैंकिंग लेनदेन में बैंक शाखा की भूमिका केवल पैसा जमा करने और निकालने तक सीमित नहीं मानी जा सकती,ऐसे मामलों में बैंकिंग प्रक्रिया, अधिकृत हस्ताक्षर,भुगतान के दस्तावेज और खाते के संचालन से जुड़े नियमों का पालन महत्वपूर्ण होता है,इसलिए यदि किसी समिति के खाते से लगातार बड़ी रकम नकद निकाली गई, तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या आहरण के दौरान संबंधित दस्तावेजों और भुगतान के उद्देश्य की पर्याप्त जांच की गई? क्या बैंक रिकॉर्ड में आहरण का मद दर्ज था? क्या भुगतान के समर्थन में वाउचर उपलब्ध थे? क्या संबंधित समिति के प्रबंधक या अधिकृत अधिकारी ने राशि निकालने का निर्णय विधिवत लिया था? क्या इतनी बड़ी नकद निकासी सामान्य वित्तीय गतिविधि के अनुरूप थी? इन सवालों का जवाब बैंक और समिति के दस्तावेज ही दे सकते हैं।
धान के शॉर्टेज को ‘जीरो’ करने के लिए पैसा तो नहीं?-मामले में एक और गंभीर सवाल धान खरीदी के कथित शॉर्टेज से जुड़ा हुआ है,आरोप लगाए जा रहे हैं कि क्या समितियों के बचत खातों में उपलब्ध राशि का इस्तेमाल धान खरीदी के हिसाब-किताब में किसी कमी या शॉर्टेज को समायोजित करने के लिए किया गया? यदि ऐसा हुआ है तो मामला बेहद गंभीर हो सकता है,क्योंकि समिति की राशि का इस्तेमाल उसी उद्देश्य के लिए किया जाना चाहिए जिसके लिए वह उपलब्ध है, हालांकि फिलहाल इस आरोप की पुष्टि नहीं हुई है और इसे जांच का विषय ही माना जाना चाहिए,यदि प्रशासन या बैंक स्तर पर जांच होती है तो धान खरीदी के स्टॉक रजिस्टर,भौतिक सत्यापन, मिलान पत्रक,भुगतान विवरण और समिति के बैंक खातों का एक साथ परीक्षण किया जाना चाहिए, शासन की धान उपार्जन व्यवस्था में खरीदी, स्टॉक और राशि के मिलान से जुड़े रिकॉर्ड का संधारण महत्वपूर्ण है।
जांच हुई तो पांच रिकॉर्ड सबसे महत्वपूर्ण-यदि इस मामले की निष्पक्ष जांच की जाती है तो पांच स्तर के रिकॉर्ड सबसे महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं,पहला,संबंधित समितियों के बैंक स्टेटमेंट,दूसरा नकद आहरण के वाउचर और भुगतान रसीद,तीसरा,समिति की बैठक कार्यवाही एवं प्रस्ताव, चौथा, धान खरीदी का स्टॉक,शॉर्टेज और मिलान रिकॉर्ड, पांचवां नकद भुगतान प्राप्त करने वाले व्यक्तियों या संस्थाओं का सत्यापन,इन पांचों रिकॉर्ड का आपस में मिलान होने पर काफी हद तक स्पष्ट हो सकता है कि राशि वैध खर्च में गई या नहीं।
भैयाथान शाखा का पुराना रिकॉर्ड भी जांच के दायरे में आए-भैयाथान शाखा का नाम पहले भी वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामलों में सार्वजनिक रिपोर्टों में सामने आ चुका है,एक प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार शाखा भैयाथान में किसानों को गलत तरीके से ऋण देने और गबन का मामला दर्ज कराया गया था तथा संबंधित कर्मचारी के खिलाफ विभागीय जांच का उल्लेख किया गया था,एक अन्य रिपोर्ट में भैयाथान स्थित जिला सहकारी केंद्रीय बैंक शाखा से जुड़े किसानों के फसल बीमा की राशि में कथित हेराफेरी का मामला भी सामने आया था,इन पुराने मामलों को वर्तमान आरोपों से जोड़कर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा,लेकिन यही इतिहास इस बात को जरूर महत्वपूर्ण बनाता है कि वर्तमान शिकायत या आरोपों की जांच यदि होती है तो वह पूरी तरह दस्तावेज आधारित और स्वतंत्र हो।
शाखा प्रबंधक से भी पूछे जाने चाहिए सीधे सवाल-यदि जांच बैठती है तो शाखा प्रबंधक श्यामलाल सिंह से भी कुछ सीधे सवाल पूछे जाने चाहिए,समितियों के खातों से बड़ी नकद निकासी की जानकारी उन्हें थी या नहीं? यदि थी तो क्या उन्होंने संबंधित खर्च का दस्तावेज देखा? क्या किसी समिति के खाते से लगातार नकद आहरण पर आपत्ति दर्ज की गई? क्या समितियों के बैंक खातों की नियमित निगरानी की गई? क्या धान खरीदी केंद्रों में हुई बैठकों का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड है? क्या किसी समिति के खाते से निकली राशि के उपयोग की पुष्टि की गई? इन सवालों के जवाब आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मामला सामान्य वित्तीय प्रक्रिया का है या इसमें किसी गंभीर अनियमितता की संभावना है।
समिति प्रबंधकों की भूमिका भी जांच से बाहर नहीं-केवल बैंक शाखा प्रबंधक की भूमिका की जांच करना भी पर्याप्त नहीं होगा, समिति के प्रबंधक, अधिकृत अधिकारी, समिति के पदाधिकारी और भुगतान प्रक्रिया से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका भी देखी जानी चाहिए, यदि राशि समिति के अधिकृत खाते से विधिवत निकली और समिति के निर्णय के आधार पर वैध खर्च में इस्तेमाल हुई तो संबंधित लोगों के पास उसका दस्तावेजी प्रमाण होना चाहिए, लेकिन यदि राशि निकली और उसका उपयोग स्पष्ट नहीं है, भुगतानकर्ता का पता नहीं है या वाउचर और बैंक रिकॉर्ड में अंतर है, तो फिर जिम्मेदारी तय करने की जरूरत होगी।
अब सवाल…आरोपों का नहीं…रिकॉर्ड का है…
पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि फिलहाल किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करना उचित नहीं होगा,आरोपों की सच्चाई बैंक स्टेटमेंट, समिति के दस्तावेज और धान खरीदी के रिकॉर्ड से ही सामने आ सकती है, यदि रिकॉर्ड साफ है तो जांच के बाद आरोप स्वतः कमजोर पड़ जाएंगे,लेकिन यदि रिकॉर्ड में विसंगति मिलती है तो जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए,सहकारी समितियों की राशि किसी व्यक्ति की निजी रकम नहीं होती,यह संस्था की संपत्ति होती है और इसका उपयोग संस्था के हित में होना चाहिए,इसलिए समिति के खाते से होने वाला प्रत्येक बड़ा लेनदेन पारदर्शी और दस्तावेज आधारित होना जरूरी है।
अब जांच की मांग…हर समिति का स्टेटमेंट सार्वजनिक जांच के दायरे में आए…
भैयाथान शाखा से जुड़ी समितियों के हालिया वित्तीय लेनदेन की निष्पक्ष जांच ही इन सवालों का समाधान कर सकती है,जांच में केवल शिवप्रसादनगर समिति ही नहीं,बल्कि शाखा के अंतर्गत आने वाली सभी संबंधित धान खरीदी समितियों के खातों की समीक्षा की जानी चाहिए,कितनी राशि जमा हुई? कितनी निकली? कितनी नकद निकली? किस मद में खर्च हुई? किसे भुगतान हुआ? और क्या उस भुगतान का दस्तावेज उपलब्ध है? इन सवालों के जवाब मिल गए तो तस्वीर साफ हो जाएगी,फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—समितियों के खाते में पैसा किसानों और संस्था के हित के लिए है,तो फिर बड़ी रकम कैश में निकालने की जरूरत क्यों पड़ रही है? यदि हर निकासी का हिसाब मौजूद है तो उसे सामने लाने में किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए,और यदि हिसाब अस्पष्ट है, तो जांच से पीछे हटने के बजाय स्वतंत्र ऑडिट और दस्तावेजी सत्यापन ही सबसे बेहतर रास्ता होगा,अब मामला आरोपों से आगे बढ़कर रिकॉर्ड की जांच का है…और रिकॉर्ड अगर बोलता है, तो फिर किसी सफाई की जरूरत नहीं पड़ती।
शिवप्रसादनगर समिति के स्टेटमेंट ने खड़े किए सवाल…
मामले में शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र से जुड़े बैंक स्टेटमेंट को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं,आरोप है कि समिति के खाते से नकद राशि निकाले जाने की प्रविष्टियां सामने आईं,लेकिन राशि किस प्रयोजन के लिए निकाली गई और उसका अंतिम उपयोग कहां हुआ,इसकी स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं होने की बात कही जा रही है,यदि किसी समिति के खाते से बड़ी रकम नकद निकाली जाती है तो सामान्य तौर पर उसके पीछे संबंधित भुगतान का आधार,स्वीकृति, वाउचर,बिल,भुगतान प्राप्तकर्ता और खर्च का मद स्पष्ट होना चाहिए,खासकर सहकारी संस्था की राशि होने के कारण यह देखना जरूरी हो जाता है कि पैसा संस्था के हित में खर्च हुआ या नहीं,यही कारण है कि शिवप्रसाद नगर के स्टेटमेंट के बाद अब अन्य समितियों के बैंक खातों की भी जांच की मांग उठ रही है।
क्या बाकी समितियों में भी हुआ ऐसा आहरण?
सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि क्या नकद आहरण का मामला केवल एक समिति तक सीमित है या भैयाथान शाखा से जुड़ी अन्य समितियों के खातों में भी इसी तरह के लेनदेन हुए हैं, बताया जा रहा है कि कुछ समितियों के बचत खातों में बड़ी रकम उपलब्ध है,ऐसे में इन खातों के हालिया लेनदेन की जांच बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है,यदि अलग-अलग समितियों में एक जैसे तरीके से बड़ी रकम नकद निकाली गई है तो यह महज संयोग है या किसी सुनियोजित वित्तीय प्रक्रिया का हिस्सा,इसकी पड़ताल जरूरी होगी,जांच में प्रत्येक समिति का बैंक स्टेटमेंट निकालकर यह देखा जा सकता है कि पिछले कुछ समय में कितनी रकम जमा हुई, कितनी निकाली गई,कितनी राशि नकद निकली और कितनी राशि बैंक ट्रांसफर के माध्यम से भुगतान की गई।
‘कैश’ क्यों? यही सबसे बड़ा सवाल…
आज अधिकांश संस्थागत भुगतान बैंकिंग माध्यम से किए जा सकते हैं,ऐसे में किसी समिति के खाते से बड़ी राशि नकद निकालने की स्थिति में सवाल उठना स्वाभाविक है,यदि मजदूरों की मजदूरी देनी थी तो भुगतान की सूची क्या है? यदि परिवहन का खर्च था तो वाहन मालिकों की सूची और बिल कहां हैं? यदि हम्माली या अन्य खरीदी खर्च था तो उसका मदवार विवरण क्या है? यदि किसी सेवा प्रदाता को भुगतान किया गया तो उसका बैंक खाता या भुगतान रसीद कहां है? और यदि नकद भुगतान वास्तव में किया गया है तो प्रत्येक भुगतानकर्ता की पहचान और प्राप्ति प्रमाण भी जांच का हिस्सा होना चाहिए, कैश आहरण अपने आप में गड़बड़ी का प्रमाण नहीं है,लेकिन बड़ी नकद निकासी का स्पष्ट और दस्तावेजी हिसाब होना जरूरी है।
क्या किसी ‘मैनेजमेंट’ के लिए समिति का पैसा इस्तेमाल हुआ?
स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि कहीं समिति की राशि का उपयोग किसी प्रभावशाली व्यक्ति,अधिकारी या अन्य स्तर पर ‘मैनेजमेंट’ के लिए तो नहीं किया गया? ऐसे आरोप गंभीर हैं और बिना प्रमाण किसी व्यक्ति पर लगाए नहीं जा सकते। लेकिन यदि समिति के खातों से बड़ी मात्रा में नकद राशि निकली है और उसके उपयोग का स्पष्ट हिसाब नहीं मिलता,तो जांच एजेंसियों के लिए यह बिंदु भी महत्वपूर्ण हो सकता है कि राशि वास्तव में कहां खर्च हुई,इसके लिए केवल समिति प्रबंधक से स्पष्टीकरण लेना पर्याप्त नहीं होगा,नकद निकासी के बाद राशि किसके पास गई, किसे भुगतान हुआ और किस उद्देश्य से भुगतान हुआ—इसकी दस्तावेजी पुष्टि आवश्यक होगी।


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