
- आयुर्वेद परिषद चुनाव में ‘शासकीय बनाम गैर-सरकारी’ की जंग! डाक मतपत्र,दबाव और प्रशासनिक प्रभाव के आरोपों से घिरी निर्वाचन प्रक्रिया
- डाक मतपत्र से लेकर सरकारी दबाव तक सवालों की कतार,रजिस्ट्रार का पत्र आया तो मानो चुनावी व्यवस्था को भी याद आया कि मतदाता स्वतंत्र होता है!
- आयुर्वेद परिषद चुनावः वोट डॉक्टर देंगे या ‘प्रभावशाली व्यवस्था’ तय करेगी?
- डाक मतपत्र से दबाव तक…आयुर्वेद परिषद चुनाव पर उठे सवाल,मंत्री कार्यालय के निर्देश के बाद भी विवाद कायम
- आयुर्वेद परिषद चुनाव में घमासान : डाक मतपत्र,सरकारी प्रभाव और दबाव के आरोपों ने बढ़ाई बेचैनी
- ‘सरकारी प्रभाव’ के साये में आयुर्वेद परिषद चुनाव! डाक मतपत्र से लेकर मतदाताओं पर दबाव तक उठे सवाल
- आयुर्वेद परिषद चुनाव पर संकट के बादलः शिकायत,जांच के निर्देश और बहिष्कार तक पहुंचा विवाद
- मतपत्र किसके हाथ, वोट किसके प्रभाव में? आयुर्वेद परिषद चुनाव की निष्पक्षता पर बड़ा सवाल
-न्यूज डेस्क-
अंबिकापुर,19 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। चुनाव लोकतंत्र का वह उत्सव है,जिसमें मतदाता की उंगली पर स्याही लगती है और व्यवस्था की परीक्षा होती है,लेकिन छत्तीसगढ़ आयुर्वेद एवं यूनानी चिकित्सा पद्धति तथा प्राकृतिक चिकित्सा परिषद के चुनाव में मामला कुछ उल्टा दिखाई दे रहा है। यहां सवाल यह नहीं रह गया कि किस प्रत्याशी को कितने वोट मिलेंगे, बल्कि सवाल यह खड़ा हो गया है कि वोट वास्तव में मतदाता के हाथ तक पहुंच भी रहा है या रास्ते में ही किसी ‘व्यवस्था’ के हाथ लग जा रहा है? आमतौर पर चुनाव में ईवीएम को लेकर बहस होती है, बूथ की सुरक्षा पर सवाल उठते हैं और मतगणना पर नजर रहती है, लेकिन इस चुनाव ने लोकतांत्रिक प्रयोग को एक नया अध्याय दे दिया है—डाक मतपत्र का अध्याय, मतपत्र डाक से निकला,रास्ते में गया और फिर किसके हाथ पहुंचा,इस सवाल ने कई प्रत्याशियों को इतना परेशान कर दिया कि अब चुनाव से ज्यादा उन्हें चुनाव की व्यवस्था समझने में रुचि हो रही है,सरगुजा संभाग के प्रत्याशी डॉ. भुवन भास्कर साहू सहित कई प्रत्याशियों द्वारा निर्वाचन प्रक्रिया को लेकर शिकायतें की गई हैं,शिकायतों में मतदाताओं पर कथित दबाव,शासकीय पद के प्रभाव के इस्तेमाल,डाक मतपत्रों को एकत्र करने और चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने जैसे आरोप लगाए गए हैं,इन आरोपों की सत्यता अभी जांच का विषय है, लेकिन सवाल इतने गंभीर हैं कि उन्हें महज चुनावी हार-जीत की खीझ कहकर किनारे करना आसान नहीं होगा।
सरकारी डॉक्टरों का प्रभाव : सेवा नियम और चुनावी नियम आमने-सामने?-विवाद का दूसरा पहलू इससे भी ज्यादा गंभीर है,कुछ प्रत्याशियों का आरोप है कि शासकीय संस्थानों में पदस्थ कुछ अधिकारी और चिकित्सक अपने पद एवं प्रभाव का इस्तेमाल कर मतदाताओं को किसी विशेष प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करने के लिए प्रभावित कर रहे हैं,आरोपों में तबादले, सीआर खराब होने अथवा प्रशासनिक कार्रवाई का भय दिखाए जाने जैसी बातें भी सामने आई हैं, यदि यह आरोप गलत हैं तो जांच में साफ हो जाएंगे। लेकिन यदि सही हैं तो सवाल केवल चुनाव का नहीं,बल्कि सरकारी पद की मर्यादा का भी है, क्योंकि सरकारी नौकरी का मतलब यह तो नहीं हो सकता कि कार्यालय में फाइल के साथ मतदाता की पसंद भी घूमे। अधिकारी का पद प्रशासन चलाने के लिए होता है, किसी प्रत्याशी की चुनावी रणनीति चलाने के लिए नहीं, यही वजह है कि शिकायतकर्ताओं की नजर में यह चुनाव अब ‘शासकीय बनाम गैर-सरकारी’ चिकित्सकों की लड़ाई जैसा रूप लेता जा रहा है।
रजिस्ट्रार का पत्रः आखिर चुनावी व्यवस्था को यह बात बतानी क्यों पड़ी?
सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब 13 अगस्त 2026 को निर्वाचन अधिकारी एवं रजिस्ट्रार डॉ. संजय शुक्ला की ओर से शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालयों के प्राचार्यों, अधीक्षकों और जिला आयुष अधिकारियों को पत्र जारी किए जाने की जानकारी सामने आई, पत्र में शासकीय संस्थानों में कार्यरत शिक्षकों एवं चिकित्सकों द्वारा मतदाताओं पर दबाव डालकर मतपत्र एकत्र किए जाने की शिकायतों का उल्लेख किया गया, भय, दबाव अथवा प्रलोभन से मतपत्र एकत्र करने को निर्वाचन प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करने वाला कृत्य बताया गया, अब सवाल यह है कि यदि सब कुछ सामान्य था तो ऐसा पत्र जारी करने की जरूरत ही क्यों पड़ी? और यदि शिकायतें इतनी गंभीर थीं कि रजिस्ट्रार कार्यालय को शासकीय संस्थानों को बाकायदा आगाह करना पड़ा, तो क्या केवल पत्र जारी कर देने से मामला खत्म हो जाएगा? यह कुछ ऐसा ही है जैसे सड़क पर ट्रैफिक जाम देखकर बोर्ड लगा दिया जाए—‘जाम न लगाएं।’ सवाल यह है कि जाम लगाने वाले पर कार्रवाई कौन करेगा?
मंत्री कार्यालय भी पहुंची शिकायत, अब फाइल की चाल पर नजर
मामला केवल रजिस्ट्रार कार्यालय तक नहीं रुका। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री कार्यालय ने भी शिकायत का संज्ञान लिया,11 अगस्त 2026 के पत्र में संचालक, आयुष को मतपत्र वितरण,प्रशासनिक पद के कथित दुरुपयोग और मतदाताओं पर अनुचित दबाव जैसे आरोपों की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच कर आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए जाने की जानकारी सामने आई है,अब यहां लोकतंत्र का अगला अध्याय शुरू होता है, शिकायत से जांच, जांच से रिपोर्ट और रिपोर्ट से कार्रवाई, लेकिन असली सवाल यह है कि यह प्रक्रिया कितनी तेज होगी? कहीं ऐसा न हो कि चुनाव पहले पूरा हो जाए और जांच बाद में उस फाइल को खोजती रह जाए जिसमें जांच की जांच लिखी हो,प्रत्याशियों की चिंता यही है कि जब चुनाव की प्रक्रिया चल रही हो, तब शिकायतों का समाधान भी चुनाव की समयसीमा के भीतर होना चाहिए।
‘मतपत्र संग्रह अभियान’ कौन चला रहा था?-शिकायतों में एक और गंभीर आरोप यह है कि कुछ स्थानों पर डाक मतपत्रों को एकत्र किए जाने की कोशिश हुई, यदि मतदाता स्वयं अपना मतपत्र भरकर भेजता है तो यह उसकी स्वतंत्र चुनावी प्रक्रिया है,लेकिन यदि कोई व्यक्ति कई मतदाताओं के मतपत्र इकट्ठा करने लगे तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि वह व्यक्ति आखिर चुनाव लड़ रहा है या डाकघर की वैकल्पिक शाखा चला रहा है? यहां भी निष्कर्ष निकालने से पहले जांच जरूरी है, लेकिन यदि ऐसे दस्तावेज या प्रमाण उपलब्ध हैं तो निर्वाचन अधिकारी के लिए उनकी जांच करना अनिवार्य हो जाता है।
प्रत्याशियों ने कहा…पहले चुनाव बचाइए, फिर परिणाम गिनिए…
विवाद इतना बढ़ा कि विभिन्न संभागों के कई प्रत्याशियों ने संयुक्त ज्ञापन देकर वर्तमान चुनाव को नियमावली के प्रावधानों के तहत अमान्य अथवा शून्य घोषित करने तथा स्वतंत्र प्रशासनिक अधिकारी की निगरानी में नए सिरे से चुनाव कराने की मांग की है,13 अगस्त 2026 के संयुक्त ज्ञापन में रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, बस्तर,सरगुजा और कवर्धा संभाग से जुड़े प्रत्याशियों के हस्ताक्षर होने की जानकारी सामने आई है,डॉ. शिव नारायण द्विवेदी,डॉ. सोमेश कुशवाहा,डॉ. सत्य संस्कार बले,डॉ. योगेश कुमार शर्मा,डॉ. आलोक कुमार,डॉ. शिशिरकांत शुक्ला,डॉ. आशीष पाल,डॉ. भुवन भास्कर साहू और डॉ. रुखसार खान सहित अन्य प्रत्याशियों की ओर से चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं, यहां मामला किसी एक प्रत्याशी की शिकायत नहीं रह जाता, जब अलग-अलग संभागों से आवाजें उठने लगें तो व्यवस्था को कम से कम इतना तो पूछना ही चाहिए कि धुआं आखिर किस तरफ से उठ रहा है?
डाक मतपत्र है या ‘घूमता हुआ गोपनीय पैकेट’?
शिकायत के साथ सामने आए दस्तावेजों ने सबसे बड़ा सवाल डाक मतपत्रों की डिलीवरी को लेकर खड़ा किया है, मतपत्र वाले लिफाफे पर साफ तौर पर ‘गोपनीय’ और ‘पंजीकृत डाक’ लिखा है,यानी इसे सामान्य चिट्ठी समझकर किसी के भी हाथ में पकड़ा देने का मामला नहीं होना चाहिए। लेकिन शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों में अलग-अलग मतदाताओं के लिए भेजे गए मतपत्रों की प्राप्ति को लेकर एक जैसे हस्ताक्षरों पर सवाल उठाया गया है, अब लोकतंत्र का गणित बड़ा सरल है—एक मतदाता, एक मतपत्र, लेकिन अगर कई मतदाताओं के मतपत्र एक ही व्यक्ति के हाथ में पहुंच गए हों, तो फिर गणित थोड़ा कठिन हो जाता है,सवाल है की मतपत्र किसने लिया? क्या वह अधिकृत व्यक्ति था? क्या डाक विभाग ने पहचान सत्यापित की? क्या संबंधित चिकित्सकों ने स्वयं अपने मतपत्र प्राप्त किए? और यदि किसी अन्य व्यक्ति ने मतपत्र लिए तो उसकी अनुमति किसने दी? इन सवालों का जवाब किसी राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि डाक विभाग के मूल रिकॉर्ड, डिलीवरी रजिस्टर,हस्ताक्षर और संबंधित मतदाताओं के बयान से मिलेगा, यानी इस चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण ‘गवाह’ कोई नेता नहीं,बल्कि डाक वितरण रजिस्टर बन गया है।
आरोप सही या गलत-जांच के बिना फैसला संभव नहीं…
इस पूरी कहानी में सबसे जरूरी सावधानी यही है कि शिकायत और आरोप को दोष सिद्धि नहीं माना जा सकता,संभव है कि डाक वितरण में कोई तकनीकी या प्रक्रियागत गलती हुई हो, यह भी संभव है कि कुछ आरोप चुनावी प्रतिस्पर्धा के कारण लगाए गए हों, इसलिए किसी अधिकारी,कर्मचारी या प्रत्याशी को बिना जांच दोषी ठहराना उचित नहीं होगा,लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है,जब दस्तावेज सामने हों,मंत्री कार्यालय संज्ञान ले चुका हो और रजिस्ट्रार कार्यालय स्वयं दबाव एवं मतपत्र संग्रह की शिकायतों को लेकर पत्र जारी कर चुका हो, तब जांच को टालना भी सवाल पैदा करेगा।
अब सात सवाल,जिनसे भाग नहीं सकती व्यवस्था, पूरे विवाद का सार…सात सवालों में समेटा जा सकता है…
पहला, अलग-अलग मतदाताओं के मतपत्र किसने प्राप्त किए?
दूसरा,क्या सभी मतपत्र संबंधित चिकित्सकों तक व्यक्तिगत रूप से पहुंचे?
तीसरा,डाक विभाग ने प्राप्तकर्ता की पहचान किस आधार पर सुनिश्चित की?
चौथा,क्या किसी अधिकारी या कर्मचारी ने मतदाताओं पर दबाव बनाया?
पांचवां,क्या किसी व्यक्ति ने कई मतपत्र एकत्र किए?
छठा,शिकायत मिलने के बाद संबंधित रिकॉर्ड सुरक्षित किए गए या नहीं?
सातवां,क्या जांच पूरी होने तक चुनाव परिणाम अथवा विवादित मतपत्रों के संबंध में कोई विशेष सुरक्षा व्यवस्था की जाएगी?
इन सवालों का जवाब मिल गया तो आधा विवाद अपने आप खत्म हो जाएगा।
चुनाव की असली जीत किसकी होगी?-आयुर्वेद परिषद चुनाव में जीत किसी डॉक्टर,किसी समूह या किसी खेमे की हो सकती है, लेकिन असली जीत तब होगी जब चुनाव के बाद कोई मतदाता यह न कहे कि उसका वोट उसके हाथ से पहले किसी और के हाथ में पहुंच गया था, लोकतंत्र में मतपत्र की कीमत कागज की कीमत से नहीं, मतदाता के अधिकार से तय होती है,इसलिए एक मतपत्र भी यदि संदिग्ध तरीके से वितरित हुआ है तो उसकी जांच जरूरी है,फिलहाल परिषद चुनाव की कहानी कुछ ऐसी हो गई है—उम्मीदवार मैदान में हैं,मतदाता परेशान हैं,डाक विभाग के रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो गए हैं,रजिस्ट्रार पत्र लिख रहे हैं और मंत्री कार्यालय जांच के निर्देश दे चुका है,अब जरूरत है कि फाइलों की रफ्तार भी मतपत्रों जितनी तेज हो,क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह नहीं होती जब कोई हार जाता है,सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब हारने वाला यह मानने लगे कि उसका वोट उससे पहले ही कहीं और तय हो चुका था,इसलिए इस चुनाव में अब सवाल केवल यह नहीं कि कौन जीतेगा? बड़ा सवाल यह है—क्या चुनाव भी जीतेगा?
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