

- 50 से ज्यादा खबरों के बाद भी पुल अधूरा,रपटा भी बहा…जनता का सवाल-अब कब बनेगा रास्ता?
- स्थायी पुल की फाइल चलती रही, रपटा तीन दिन की बारिश में चल बसा!
- वीडियो में राजनीति,नदी में बहा रपटा… लेकिन ग्रामीणों का सवाल अब भी कायम…पुल कब बनेगा?
- भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता दीप नारायण साहू ने ग्रामीणों की परेशानी और 15 लाख के रपटा की
- गुणवत्ता पर उठाए सवाल
- मंत्री समर्थकों ने वीडियो जारी कर बताया…स्थायी पुल बजट में शामिल, प्रक्रिया जारी,लेकिन 14 महीने बाद भी जमीन पर निर्माण शुरू नहीं…
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,19 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। गोबरी नदी पर 30 जून 2025 को ध्वस्त हुए पुल का मामला अब केवल एक टूटे हुए पुल या बह चुके वैकल्पिक रपटा तक सीमित नहीं रह गया है,करीब 14 महीने से ग्रामीणों की आवाजाही प्रभावित है, स्थायी पुल का निर्माण अभी जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा और जिस वैकल्पिक व्यवस्था के भरोसे बरसात में ग्रामीणों को राहत देने की कोशिश की गई थी,करीब 15 लाख रुपये की लागत वाला वह रपटा भी तेज बारिश में क्षतिग्रस्त होकर बह गया,अब इस पूरे मामले में राजनीति के दो रंग सोशल मीडिया पर सामने आए हैं। एक ओर इसी क्षेत्र के निवासी और भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता बताए जा रहे दीप नारायण साहू ने टूटे हुए रपटा पुल पर खड़े होकर वीडियो जारी किया और स्थानीय ग्रामीणों की परेशानी सामने रखी, दूसरी ओर उनके वीडियो के बाद मंत्री समर्थकों की ओर से एक जवाबी वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया, जिसमें क्षेत्रीय विधायक एवं मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े के प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि स्थायी पुल के निर्माण को इस वर्ष के बजट में शामिल किया जा चुका है और शासन स्तर पर अंतिम स्वीकृति की प्रक्रिया चल रही है,दिलचस्प बात यह है कि दोनों पक्षों के वीडियो सामने आने के बाद भी मूल सवाल जस का तस खड़ा है—30 जून 2025 को मुख्य पुल टूटने के बाद 14 महीने में स्थायी पुल निर्माण की प्रक्रिया आखिर किस चरण तक पहुंची और ग्रामीणों को स्थायी राहत कब मिलेगी?
दीप नारायण साहू ने सवाल उठाया, मंत्री पर व्यक्तिगत आरोप नहीं…
दीप नारायण साहू ने अपने वीडियो में जिस तरह से अपनी बात रखी,उसमें उन्होंने क्षेत्रीय समस्या को प्रमुखता दी,उन्होंने कहा कि वह भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता हैं और इसी क्षेत्र के निवासी भी हैं,जिस मार्ग से ग्रामीण रोजाना आवागमन करते हैं,उसी मार्ग की समस्या को लेकर उन्होंने सवाल उठाया है, वीडियो में साहू ने बताया कि उन्होंने इस समस्या का उल्लेख मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े के सामने भी किया था,उनके अनुसार उन्होंने मंत्री से तीन बार इस विषय में चर्चा की, लेकिन उन्हें कोई सार्थक जवाब या कार्रवाई की जानकारी नहीं मिली,इसके बाद उन्होंने टूटे हुए रपटा स्थल पर पहुंचकर अपनी बात वीडियो के माध्यम से रखी,उनका मुख्य सवाल 15 लाख रुपये की लागत से बने रपटा की निर्माण तकनीक को लेकर था, उन्होंने आशंका जताई कि जिस स्थान पर पानी का बहाव अधिक था,वहां पर्याप्त संख्या में ह्यूम पाइप नहीं लगाए गए,उनका कहना था कि यदि अतिरिक्त ह्यूम पाइप लगाए जाते और नीचे की ओर पर्याप्त गहराई में पानी निकासी की व्यवस्था की जाती तो संभवतः रपटा ज्यादा समय तक टिक सकता था, हालांकि इन तकनीकी आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है,रपटा टूटने के वास्तविक कारणों का निर्धारण तकनीकी जांच से ही हो सकता है।
14 महीने में बजट तक पहुंचा मामला,अब आगे कितना इंतजार? 30 जून 2025 को पुल टूटने के बाद ग्रामीणों ने एक वर्ष से अधिक समय तक परेशानी झेली,दैनिक घटती-घटना ने भी इस मुद्दे को लगातार उठाया और पिछले एक वर्ष में इस मामले पर 50 से अधिक खबरें और फॉलोअप प्रकाशित किए,इन खबरों में पुल टूटने से लेकर वैकल्पिक रपटा,उसकी एप्रोच रोड,डब्ल्यूएमएम कार्य,निर्माण गुणवत्ता और बरसात में रपटा की परीक्षा तक लगातार सवाल उठाए गए,अब रपटा भी बह चुका है, ऐसे में ग्रामीणों के लिए यह जानना जरूरी है कि स्थायी पुल का काम कब शुरू होगा,यदि 14 महीने में मामला अभी बजट और स्वीकृति की प्रक्रिया में है, तो आगे निविदा और निर्माण में कितना समय लगेगा? क्या अगली बरसात से पहले पुल तैयार हो जाएगा? यदि नहीं,तो अगले बरसात के लिए सुरक्षित वैकल्पिक व्यवस्था कौन करेगा?
’प्राकृतिक’ कह देने से सवाल खत्म नहीं होते-रपटा तेज बारिश में बह गया,मंत्री समर्थकों के वीडियो में इसे भारी बारिश और तेज बहाव से जोड़कर प्राकृतिक घटना बताया गया, लेकिन यहां भी एक तकनीकी सवाल बचा रहता है,यदि यह क्षेत्र हर वर्ष बरसात में तेज जलप्रवाह से प्रभावित होता है और विभाग को पहले से पता था कि नदी में पानी का बहाव बढ़ सकता है,तो अस्थायी रपटा किस अधिकतम जलप्रवाह को सहने के लिए डिजाइन किया गया था? यदि वह केवल सामान्य बारिश के लिए था, तो क्या ग्रामीणों को यह जानकारी दी गई थी? और यदि उद्देश्य ही यह था कि स्थायी पुल बनने तक ग्रामीणों का आवागमन बरसात में बाधित न हो,तो वैकल्पिक व्यवस्था को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप पर्याप्त मजबूत बनाना किसकी जिम्मेदारी थी? इन सवालों का जवाब किसी राजनीतिक वीडियो से नहीं, बल्कि स्वीकृत ड्राइंग,तकनीकी डिजाइन,लागत अनुमान, ह्यूम पाइप की संख्या,निरीक्षण रिपोर्ट और निर्माण गुणवत्ता की जांच से मिलेगा।
सवाल विभाग से…क्या नदी के बहाव का सही आकलन हुआ था?
दीप नारायण साहू के वीडियो का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि उन्होंने सवाल केवल जनप्रतिनिधि से नहीं, बल्कि निर्माण विभाग से भी किया, उनका कहना था कि नदी के बहाव को देखते हुए निर्माण में पानी की निकासी की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए थी, यहीं से मामला तकनीकी जांच की मांग तक पहुंचता है, यदि रपटा का डिजाइन सामान्य जलप्रवाह को ध्यान में रखकर बनाया गया था, तो क्या उसमें असामान्य या तेज बारिश के दौरान आने वाले पानी का आकलन किया गया था? यदि किया गया था तो कितनी क्षमता के जलप्रवाह के लिए डिजाइन तैयार किया गया था? कितने ह्यूम पाइप स्वीकृत थे और वास्तव में कितने लगाए गए? क्या निर्माण के बाद तकनीकी निरीक्षण हुआ था? इन सवालों का जवाब दस्तावेजों और स्थल निरीक्षण से ही सामने आ सकता है।
जवाबी वीडियो में मंत्री समर्थकों ने कहा…‘बड़े प्रोजेक्ट में समय लगता है’
दीप नारायण साहू के वीडियो के बाद मंत्री समर्थकों की ओर से सोशल मीडिया पर एक दूसरा वीडियो सामने आया, इस वीडियो में कहा गया कि बिना पूरी सच्चाई जाने आरोप लगाना आसान है, वीडियो में बताया गया कि ग्रामीणों की परेशानी को देखते हुए तत्काल राहत देने के लिए करीब 15 लाख रुपये की लागत से अस्थायी रपटा बनाया गया था, जवाबी वीडियो में यह भी कहा गया कि भारी बारिश और तेज बहाव के कारण अस्थायी ढांचा टूट गया और इसे प्राकृतिक स्थिति बताया गया, इसके साथ ही वीडियो में यह दावा किया गया कि गंगोटी से सूरजपुर मार्ग पर गोबरी नदी में स्थायी पुल निर्माण को इस वर्ष के बजट में शामिल किया जा चुका है और मंत्री शासन से अंतिम स्वीकृति के लिए प्रयासरत हैं, यह दावा यदि संबंधित सरकारी दस्तावेजों से पुष्ट होता है तो निश्चित रूप से स्थायी समाधान की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक चरण माना जाएगा,लेकिन यहीं दूसरा बड़ा सवाल भी पैदा होता है की बजट में शामिल होना और पुल का जमीन पर बन जाना एक ही बात नहीं है, बजट प्रावधान के बाद प्रशासकीय स्वीकृति, तकनीकी स्वीकृति, निविदा, ठेका प्रक्रिया, कार्यादेश और वास्तविक निर्माण जैसे कई चरण होते हैं, इसलिए ग्रामीणों के लिए असली सवाल यह है कि इन प्रक्रियाओं में अभी कौन-सा चरण पूरा हुआ है और निर्माण स्थल पर काम कब शुरू होगा?
एक वीडियो में सवाल,दूसरे वीडियो में जवाब…लेकिन ग्रामीणों का सवाल फिर भी बाकी…
पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि दीप नारायण साहू ने अपने वीडियो में मंत्री को अपमानित या व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाने के बजाय अपनी परेशानी और विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए,उन्होंने स्वयं को भाजपा कार्यकर्ता बताते हुए यह भी कहा कि यदि जनता अपने जनप्रतिनिधि से अपनी समस्या नहीं कहेगी तो किससे कहेगी,इसके बावजूद उनके वीडियो के जवाब में मंत्री समर्थकों का वीडियो सामने आया,यहीं से राजनीतिक बहस शुरू हो गई, लेकिन लोकतंत्र में किसी जनप्रतिनिधि के क्षेत्र का व्यक्ति,चाहे वह किसी भी राजनीतिक दल का समर्थक हो,अपने क्षेत्र की समस्या पर सवाल उठाता है तो उसका जवाब तथ्यों के साथ दिया जाना चाहिए,इसी तरह यदि किसी आरोप में तथ्यात्मक त्रुटि है तो उसका खंडन दस्तावेजों के साथ होना चाहिए,व्यक्तिगत या राजनीतिक बहस से ग्रामीणों की समस्या का समाधान नहीं होगा।
मंत्री का बचाव करने से ज्यादा जरूरी है काम की स्थिति बताना
मंत्री समर्थकों के जवाबी वीडियो में यदि यह बताया गया है कि स्थायी पुल बजट में शामिल है,तो यह महत्वपूर्ण जानकारी है,लेकिन इससे अगला सवाल और मजबूत होता है लो अब तक क्या हुआ और आगे कब होगा? यदि अंतिम स्वीकृति बाकी है तो वह कब तक मिलेगी? निविदा कब जारी होगी? कार्यादेश कब होगा? निर्माण कब शुरू होगा? पुल कब तक पूरा होगा? और तब तक ग्रामीण किस रास्ते से सुरक्षित आवागमन करेंगे? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक किए जाने चाहिए, क्योंकि ग्रामीणों को यह जानने में दिलचस्पी नहीं है कि सोशल मीडिया पर कौन किसके समर्थन में वीडियो बना रहा है, उनकी चिंता यह है कि उन्हें रोज अपने घर, खेत,स्कूल,अस्पताल और बाजार तक पहुंचने के लिए सुरक्षित रास्ता कब मिलेगा।
स्थायी पुल बनने तक वैकल्पिक व्यवस्था जरूरी
यह भी समझना होगा कि स्थायी पुल बनने में समय लग सकता है,बड़े पुल का निर्माण तत्काल संभव नहीं होता,लेकिन जब तक स्थायी पुल नहीं बनता,तब तक वैकल्पिक मार्ग ऐसी स्थिति में होना चाहिए कि बरसात में ग्रामीणों का संपर्क दोबारा न टूटे,पहले मुख्य पुल टूटा,एक वर्ष बाद वैकल्पिक रपटा बनाया गया,रपटा कुछ ही समय बाद तेज बारिश में बह गया,अब स्थिति फिर वहीं पहुंच गई जहां से कहानी शुरू हुई थी,अर्थात न स्थायी पुल तैयार है,न वैकल्पिक व्यवस्था सुरक्षित बची है।
दैनिक घटती-घटना के सवालों की भी हुई पुष्टि?
दैनिक घटती-घटना ने रपटा बनने के बाद ही उसकी मजबूती और बरसात में क्षमता को लेकर सवाल उठाए थे,7 जुलाई 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट में यह सवाल प्रमुखता से उठाया गया था कि पहली बरसात इस रपटा की वास्तविक परीक्षा होगी, कुछ ही समय बाद रपटा क्षतिग्रस्त हो गया,इससे अखबार द्वारा उठाए गए सवालों की प्रासंगिकता और बढ़ गई है,हालांकि निर्माण में तकनीकी खामी थी या रपटा असाधारण जलप्रवाह की वजह से क्षतिग्रस्त हुआ,इसका अंतिम निष्कर्ष विशेषज्ञ जांच के बाद ही निकलेगा।
अब राजनीति नहीं, समयबद्ध कार्रवाई चाहिए…
इस पूरे मामले में दोनों पक्षों के वीडियो सामने आ चुके हैं,एक पक्ष ने समस्या बताई,दूसरे पक्ष ने सरकार और मंत्री के प्रयास बताए,लेकिन ग्रामीणों की समस्या अभी भी वहीं है,इसलिए अब सबसे जरूरी है कि सरकार और संबंधित विभाग सार्वजनिक रूप से यह बताए कि स्थायी पुल निर्माण की फाइल किस स्तर पर है और उसकी समयसीमा क्या है,यदि बजट में प्रावधान हो चुका है तो उसकी प्रति सार्वजनिक की जा सकती है,यदि प्रशासकीय स्वीकृति मिल चुकी है तो आदेश जारी किया जा सकता है। यदि निविदा प्रक्रिया शुरू हो चुकी है तो उसकी जानकारी दी जा सकती है, और यदि अभी इनमें से कोई प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है तो ग्रामीणों को वास्तविक स्थिति बताई जानी चाहिए।
अंतिम सवाल…पुल कब बनेगा?
गोबरी नदी का पुल 30 जून 2025 को टूटा था,इसके बाद एक वर्ष से अधिक समय बीत गया,स्थायी समाधान अभी भी प्रक्रिया में है,वैकल्पिक व्यवस्था के लिए बनाया गया करीब 15 लाख रुपये का रपटा भी बारिश में बह गया,अब सवाल किसी व्यक्ति के वीडियो का नहीं है,सवाल किसी मंत्री के समर्थन या विरोध का भी नहीं है,सवाल उन ग्रामीणों का है जिनका रास्ता टूटा है, सवाल उस बच्चे का है जिसे स्कूल पहुंचना है,सवाल उस मरीज का है जिसे अस्पताल जाना है,सवाल उस किसान का है जिसे अपनी उपज बाजार तक ले जानी है,सवाल उस परिवार का है जिसे रोज इसी रास्ते से गुजरना है,और सबसे बड़ा सवाल यही है,जब 30 जून 2025 को पुल टूट गया था,तो अगस्त 2026 तक भी स्थायी पुल जमीन पर क्यों नहीं आया? बजट में शामिल होना राहत की शुरुआत हो सकती है,लेकिन ग्रामीणों के लिए राहत का अंत तभी होगा जब मजबूत स्थायी पुल बनकर तैयार होगा और उस पर सुरक्षित आवागमन शुरू होगा,तब तक सोशल मीडिया के वीडियो चाहे जितने बनें,सवाल वही रहेगा ‘पुल कब बनेगा और तब तक जनता जाएगी कैसे? ‘
घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur