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अंबिकापुर/रायपुर@खाद्य विभाग का ‘सुपर अफसर’: एक दशक,कई जिले,अनगिनत प्रभार…आखिर राज क्या था?

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  • नितेश कुमार मिश्रा ने खबर पर दिया अपना पक्ष…कहा…‘प्रयोगशाला प्रभारी कभी नहीं रहा…शासन के आदेश पर हुई पदस्थापना’
  • 10 साल…कई जिले…एक ही अधिकारी!
  • अतिरिक्त प्रभार,प्रयोगशाला,पदोन्नति और विभागीय प्रभाव पर उठते सवाल…
  • सरकारें बदलती रहीं…लेकिन ‘सुपर अफसर’ नहीं बदले! कांग्रेस हो या भाजपा, एक दशक तक प्रभाव बरकरार रहने पर उठे सवाल…
  • एक अधिकारी…कई कुर्सियां…और अनगिनत सवाल,बलरामपुर से प्रयोगशाला तक,अतिरिक्त प्रभार और पदोन्नति की परतें खोलती पड़ताल
  • प्रयोगशाला से पदोन्नति तक प्रभाव के आरोप, विभागीय व्यवस्था और पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्न


-न्यूज डेस्क
अंबिकापुर/रायपुर,09 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। सरकारी सेवा में स्थानांतरण एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया मानी जाती है,अधिकांश अधिकारी समय-समय पर अलग-अलग जिलों,संभागों और मुख्यालयों में पदस्थ होते रहते हैं,लेकिन यदि कोई अधिकारी लगभग दस वर्षों तक एक ही संभाग के एक ही जिले व आसपास बना रहे, लगातार कई जिलों का अतिरिक्त प्रभार संभाले,महत्वपूर्ण प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी उसी के पास रहें और पदोन्नति के बाद भी उसका प्रभाव कम न हो,तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं,छत्तीसगढ़ के औषधि एवं खाद्य प्रशासन विभाग में ऐसा ही एक नाम लंबे समय से चर्चा में है—नितेश कुमार मिश्रा,समर्थक उन्हें अनुभवी अधिकारी बताते हैं,जबकि विभाग के भीतर और शिकायतकर्ताओं के बीच उनके कार्यकाल,पदस्थापन, अतिरिक्त प्रभार,प्रयोगशाला,पदोन्नति प्रक्रिया तथा विभागीय प्रभाव को लेकर अनेक प्रश्न उठाए जा रहे हैं, यही प्रश्न इस विशेष रिपोर्ट का विषय हैं। खबर प्रकाशित होने के बाद खाद्य सुरक्षा अधिकारी (अभिहित अधिकारी) नितेश कुमार मिश्रा ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उनके संबंध में प्रकाशित खबर में उनका पक्ष लिए बिना कई बातें प्रकाशित की गई हैं,उन्होंने स्पष्ट किया कि वे कभी भी राज्य की खाद्य प्रयोगशाला के प्रभारी नहीं रहे हैं,उनका कहना है कि यदि इस संबंध में कोई सवाल है तो तत्कालीन नियंत्रक अथवा विभागीय सचिव से जानकारी ली जानी चाहिए,क्योंकि उनकी पदस्थापना और उन्हें दिए गए दायित्व शासन स्तर से आदेशित होते रहे हैं, मिश्रा ने यह भी कहा कि पिछले 10 वर्षों के दौरान वे अपनी इच्छा से किसी एक स्थान या संभाग में नहीं रहे, बल्कि शासन और विभागीय अधिकारियों के आदेश के अनुसार उनकी पदस्थापनाएं और अतिरिक्त प्रभार तय होते रहे, उन्होंने कहा कि वर्तमान में भी एक अधिकारी के पास चार जिलों की जिम्मेदारी है,इसलिए केवल उनके ही लंबे समय तक विभिन्न जिलों का दायित्व संभालने को लेकर सवाल उठाना उचित नहीं है,उन्होंने इस संबंध में विभागीय स्तर पर वास्तविक स्थिति जानने के लिए तत्कालीन नियंत्रक अथवा सचिव से जानकारी लेने की बात कही।
प्रयोगशाला प्रभारी होने के आरोप पर आपत्ति
नितेश कुमार मिश्रा की सबसे प्रमुख आपत्ति इस बात को लेकर है कि उन्हें राज्य की खाद्य प्रयोगशाला का प्रभारी बताया गया है,उनका कहना है कि उन्होंने कभी प्रयोगशाला प्रभारी के रूप में कार्य नहीं किया,हालांकि,इस मामले में उपलब्ध दस्तावेजों को लेकर अलग दावा सामने आया है,जिनमें उनके प्रयोगशाला से संबंधित प्रभार का उल्लेख होने की बात कही गई है, ऐसे में अब वास्तविक स्थिति विभागीय आदेशों और पदस्थापना संबंधी अभिलेखों से ही स्पष्ट हो सकती है, मिश्रा का कहना है कि यदि किसी दस्तावेज में उन्हें प्रयोगशाला का प्रभारी बताया गया है तो उस दस्तावेज की वैधानिक स्थिति और आदेश जारी करने वाले सक्षम अधिकारी से इसकी पुष्टि की जानी चाहिए,उनका कहना है कि उनके कार्यकाल और दायित्वों को लेकर अंतिम तथ्य विभागीय रिकॉर्ड से ही सामने आ सकते हैं।
प्रधानमंत्री के भोजन परीक्षण
वाले मामले पर भी दिया जवाब

प्रधानमंत्री के सूरजपुर दौरे के दौरान भोजन परीक्षण से संबंधित आदेश में‘सुमित त्रिपाठी’नामक व्यक्ति को नमूना सहायक के रूप में शामिल किए जाने के मामले पर भी नितेश कुमार मिश्रा ने प्रतिक्रिया दी,उन्होंने बताया कि इस प्रकरण की पुलिस जांच हो चुकी है और उनके अनुसार सूरजपुर एसडीओपी स्तर पर इसकी जांच की गई है, हालांकि,उपलब्ध शिकायत और संबंधित दस्तावेजों में सुमित त्रिपाठी को नमूना सहायक के रूप में दर्शाए जाने तथा वास्तविक रूप से उस व्यक्ति की पहचान एवं विभागीय स्थिति को लेकर सवाल अब भी बने हुए हैं, विशेष रूप से यदि किसी व्यक्ति की उपस्थिति से संबंधित अभिलेख में उसके हस्ताक्षर नहीं हैं अथवा वह स्वयं वहां मौजूद नहीं होने की बात सामने आती है, तो यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि उस व्यक्ति का नाम भोजन परीक्षण संबंधी ड्यूटी आदेश में नमूना सहायक के रूप में किस आधार पर शामिल किया गया था? यही वह बिंदु है जिसकी स्वतंत्र रूप से दस्तावेजों के आधार पर पुष्टि किया जाना आवश्यक है।
दिसंबर 2015 से शुरू हुई यात्रा
उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार नितेश कुमार मिश्रा दिसंबर 2015 में खाद्य सुरक्षा अधिकारी नियुक्त हुए, उनकी पहली पदस्थापना बलरामपुर जिले में हुई, इसके बाद विभागीय आदेशों के अनुसार उन्हें समय-समय पर सरगुजा,सूरजपुर और कोरिया जिलों का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया, एक अधिकारी के पास मूल पदस्थापना के साथ कई जिलों की जिम्मेदारी रहना अपने आप में असामान्य नहीं है, लेकिन जब यह स्थिति वर्षों तक बनी रहे तो यह चर्चा का विषय बन जाती है,सवाल उठता है कि क्या विभाग में अन्य अधिकारी उपलब्ध नहीं थे, या फिर किसी विशेष प्रशासनिक कारण से बार-बार अतिरिक्त प्रभार एक ही अधिकारी को दिया जाता रहा?
दस साल तक सरगुजा संभाग के इर्द-गिर्द
विभागीय सूत्रों के अनुसार वर्ष 2015 से लगभग 2025 तक नितेश कुमार मिश्रा का कार्यक्षेत्र लगभग पूरा सरगुजा संभाग ही रहा,बलरामपुर में मूल पदस्थापना रहते हुए वे अलग-अलग समय पर सरगुजा, सूरजपुर और कोरिया के अतिरिक्त प्रभार भी संभालते रहे,विभागीय गलियारों में इस पर व्यंग्य भी सुनाई देता है,कुछ कर्मचारी कहते हैं कि जैसे मिठाई की दुकान पर बर्रे (ततैये) लगातार मंडराते रहते हैं, वैसे ही वे वर्षों तक सरगुजा संभाग के इर्द-गिर्द ही बने रहे, यह एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी है, लेकिन इसके पीछे विभागीय असंतोष की झलक भी दिखाई देती है।
सरकार बदली,लेकिन पदस्थापन का सिलसिला नहीं बदला?-इस दौरान प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा—दोनों दलों की सरकारें रहीं,मंत्री बदले,वरिष्ठ अधिकारी बदले,लेकिन आलोचकों का कहना है कि नितेश कुमार मिश्रा की प्रशासनिक स्थिति में कोई विशेष बदलाव नहीं आया,विभागीय चर्चाओं में यह प्रश्न अक्सर उठता है कि क्या यह महज संयोग था या फिर विभागीय स्तर पर कोई ऐसी व्यवस्था थी,जिसके कारण वे लगातार प्रभावशाली जिम्मेदारियों में बने रहे, इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है,लेकिन यही कारण है कि उनके कार्यकाल को लेकर सवाल लगातार उठते रहे हैं।
प्रमोशन के बाद भी गृह क्षेत्र के निकट पदस्थापना-जब नितेश कुमार मिश्रा को पदोन्नति मिली और वे जिला खाद्य सुरक्षा अभिहित अधिकारी बने,तब भी उनकी पदस्थापना उनके गृह क्षेत्र अंबिकापुर के निकट मानी जाने वाली जगह पर हुई,आलोचकों का कहना है कि यदि कोई अधिकारी लगभग पूरा सेवा काल अपने गृह क्षेत्र के आसपास ही बिताए, तो विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि ऐसी पदस्थापनाओं का आधार क्या था।
खाद्य प्रयोगशाला में अर्चना तिवारी की पदस्थापना और पदोन्नति पर भी उठ रहे सवाल खाद्य विभाग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवालों के बीच राज्य की एकमात्र खाद्य प्रयोगशाला में कार्यरत नमूना सहायक अर्चना तिवारी (यदि दस्तावेज़ों में अर्चना मिश्रा अंकित है तो उसी नाम का उल्लेख करें) का मामला भी चर्चा का विषय बना हुआ है,विभागीय सूत्रों का दावा है कि मूल रूप से बिलासपुर में पदस्थ रही नमूना सहायक को बाद में राज्य खाद्य प्रयोगशाला में संलग्न (अटैच) किया गया,आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि शिकायतों के बावजूद उन्हें प्रयोगशाला में बनाए रखा गया और अब उन्हें खाद्य सुरक्षा अधिकारी के पद पर पदोन्नति दिलाने की तैयारी चल रही है,सूत्रों के अनुसार, पिछले लगभग दस वर्षों से खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की नियमित भर्ती नहीं हुई है,इसी दौरान नमूना सहायकों की पदोन्नति का कोटा 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत किए जाने के बाद विभाग में पदोन्नति की नई प्रक्रिया शुरू हुई है,आरोप लगाने वालों का कहना है कि इसी प्रक्रिया का लाभ कुछ चुनिंदा लोगों को दिलाने की कोशिश की जा रही है, आलोचकों का आरोप है कि यदि किसी नमूना सहायक को खाद्य सुरक्षा अधिकारी बनाया जाता है तो यह सुनिश्चित होना चाहिए कि पूरी प्रक्रिया राजपत्र में प्रकाशित नियमों, सेवा शर्तों और न्यायालयों में लंबित मामलों के अनुरूप हो, यदि नियमों की अनदेखी कर पदोन्नति दी जाती है, तो इससे भविष्य में फिर नए कानूनी विवाद खड़े हो सकते हैं, सूत्र यह भी दावा करते हैं कि इस पूरी प्रक्रिया में तत्कालीन वरिष्ठ अधिकारियों और विभाग के प्रभावशाली अधिकारियों की भूमिका की चर्चा विभागीय गलियारों में होती रही है, हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
बाकी आरोपों पर आपत्ति नहीं,प्रयोगशाला प्रभार पर ही सवाल…
नितेश कुमार मिश्रा ने बातचीत में मुख्य रूप से प्रयोगशाला प्रभारी होने संबंधी उल्लेख पर आपत्ति जताई,वहीं, उनके पक्ष को प्रकाशित करते हुए यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि उनके द्वारा अन्य आरोपों पर कुछ नहीं कहा, और किन आरोपों को वे स्वीकार या अस्वीकार करते हैं, यह अलग-अलग विभागीय दस्तावेजों और उनके आधिकारिक जवाब से ही स्पष्ट होगा,मिश्रा का कहना है कि 10 वर्षों तक एक ही जिले में रहने अथवा अलग-अलग जिलों का प्रभार संभालने का निर्णय उनका व्यक्तिगत नहीं था। उनके अनुसार वे जहां भी पदस्थ रहे,वह शासन अथवा विभागीय अधिकारियों के आदेश के आधार पर रहा,इसलिए यदि किसी अधिकारी की लंबे समय तक एक क्षेत्र में पदस्थापना को लेकर सवाल हैं तो इसका जवाब पदस्थापना आदेश जारी करने वाले शासन और विभागीय स्तर से लिया जाना चाहिए।
अब दस्तावेज बनाम दावे से तय होगी वास्तविक तस्वीर
मिश्रा के पक्ष के सामने आने के बाद मामले में एक नया पहलू जुड़ गया है, एक तरफ अधिकारी का कहना है कि वे कभी खाद्य प्रयोगशाला के प्रभारी नहीं रहे, जबकि उपलब्ध बताए जा रहे दस्तावेजों में उनके प्रभार का उल्लेख होने का दावा किया जा रहा है,इसी तरह प्रधानमंत्री के भोजन परीक्षण से जुड़े आदेश में नमूना सहायक के रूप में दर्ज ‘सुमित त्रिपाठी’ की वास्तविक पहचान,पद एवं उस दिन की उपस्थिति भी जांच का विषय बनी हुई है,इसलिए इस पूरे मामले में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय अब शासन के पदस्थापना आदेश, प्रभार आदेश,भोजन परीक्षण की ड्यूटी सूची,उपस्थिति संबंधी रिकॉर्ड,पुलिस जांच रिपोर्ट और संबंधित अधिकारियों के आधिकारिक बयान सामने आना अधिक महत्वपूर्ण है,यही दस्तावेज यह स्पष्ट कर सकते हैं कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और किन बिंदुओं पर केवल प्रशासनिक प्रक्रिया को लेकर भ्रम की स्थिति बनी है।
एक साथ कई जिम्मेदारियां…
विभागीय सूत्रों का दावा है कि वर्ष 2024-25 के दौरान नितेश कुमार मिश्रा ने मूल पद के साथ-साथ सहायक आयुक्त (प्रभारी) तथा राज्य की एकमात्र खाद्य प्रयोगशाला के प्रभारी जैसी जिम्मेदारियां भी संभालीं, यदि ऐसा है तो यह प्रश्न उठता है कि क्या विभाग में अन्य अधिकारी उपलब्ध नहीं थे? यदि थे, तो महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां बार-बार एक ही अधिकारी को क्यों सौंपी गईं?
उड़नदस्ता और कंट्रोलर शर्मा का कार्यकाल
वर्ष 2023 में तत्कालीन कंट्रोलर शर्मा के कार्यकाल में खाद्य पदार्थों की जांच और प्रवर्तन कार्रवाई के लिए एक विशेष उड़नदस्ता (फ्लाइंग स्क्वॉड) गठित किया गया था, विभागीय सूत्रों के अनुसार नितेश कुमार मिश्रा भी इस टीम का हिस्सा थे,कुछ शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि उड़नदस्ता की कार्यप्रणाली को लेकर बाद में शिकायतें हुईं,आरोपों के अनुसार कथित अनियमितताओं और वसूली जैसे मुद्दे उठे, हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है,यह भी स्पष्ट नहीं है कि इन शिकायतों पर विभागीय जांच हुई या नहीं और यदि हुई तो उसका निष्कर्ष क्या रहा,यदि शिकायतें निराधार थीं, तो विभाग को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, यदि शिकायतों में तथ्य थे,तो जिम्मेदारी किसकी तय हुई…यह भी सार्वजनिक होना चाहिए।
उड़नदस्ता,कंट्रोलर शर्मा और कार्रवाई का सवाल-विभागीय सूत्रों के अनुसार वर्ष 2023 में तत्कालीन कंट्रोलर शर्मा के कार्यकाल में खाद्य पदार्थों की जांच और प्रवर्तन कार्रवाई को प्रभावी बनाने के उद्देश्य से एक विशेष उड़नदस्ता (फ्लाइंग स्क्वॉड) का गठन किया गया था,इस दल में खाद्य सुरक्षा अधिकारी नितेश कुमार मिश्रा को भी शामिल किया गया था,सूत्रों का दावा है कि उड़नदस्ता बनने के बाद कई जिलों में कार्रवाई हुई,लेकिन इसके साथ ही कथित अनियमितताओं और अवैध वसूली की शिकायतें भी उच्च स्तर तक पहुंचीं, आरोप लगाने वालों का कहना है कि यदि शिकायतें सही थीं,तो उन पर क्या जांच हुई और उसका परिणाम क्या निकला,यह आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया,विभागीय गलियारों में यह चर्चा भी होती रही कि कथित शिकायतों का असर अंततः उड़नदस्ता की कार्यप्रणाली पर पड़ा और बाद में कंट्रोलर शर्मा को हटा दिया गया जिसके साथ व्यवस्था समाप्त हो गई,हालांकि यह स्पष्ट नहीं हो सका कि इसके पीछे वास्तविक प्रशासनिक कारण क्या थे? यदि शिकायतें निराधार थीं तो विभाग को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, और यदि शिकायतों में तथ्य थे तो जिम्मेदारी किसकी तय हुई—यह भी सार्वजनिक होना चाहिए।
दैनिक घटती-घटना का पक्षः नितेश कुमार मिश्रा का पक्ष इसलिए प्रकाशित किया जा रहा है ताकि खबर में लगाए गए आरोपों के साथ संबंधित अधिकारी का जवाब भी पाठकों के सामने रहे,जिन बिंदुओं पर उनके बयान और उपलब्ध दस्तावेजों में अंतर दिखाई देता है, उनकी स्वतंत्र विभागीय जांच और आधिकारिक रिकॉर्ड से पुष्टि आवश्यक है।


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