
- खेतों में फसलों की जगह प्लास्टिक और कांच का कचरा, नालियों का गंदा पानी बना किसानों की सबसे बड़ी मुसीबत
- स्वच्छ भारत के दावों पर सवाल, प्रशासन और जनता दोनों की लापरवाही से उपजाऊ जमीन हो रही बर्बाद
-राजन पाण्डेय-
सोनहत/कोरिया,07 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। एक ओर केंद्र और राज्य सरकारें स्वच्छ भारत मिशन,पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय बढ़ाने के बड़े-बड़े दावे कर रही हैं,वहीं दूसरी ओर कोरिया जिले के सोनहत विकासखंड में विकास की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है,जो इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है,सड़क किनारे लोगों की सुविधा के लिए बनाई गई नालियां अब किसानों के लिए अभिशाप बन चुकी हैं। नालियों से बहकर आने वाला प्लास्टिक,कांच की टूटी बोतलें, डिस्पोजल, पॉलीथिन और अन्य ठोस कचरा सीधे खेतों में पहुंच रहा है, जिससे उपजाऊ जमीन धीरे-धीरे कचराघर में तब्दील होती जा रही है।
नाली बनी कचरा पहुंचाने का माध्यम, खेतों में फैल रहा प्लास्टिक का साम्राज्य- सोनहत क्षेत्र में सड़क किनारे बनी नालियों की नियमित सफाई नहीं होने और कचरा प्रबंधन की उचित व्यवस्था के अभाव में प्रतिदिन बड़ी मात्रा में घरेलू कचरा बहकर किसानों के खेतों में पहुंच रहा है,नालियों के निकास सीधे खेतों की ओर होने से बारिश और बहाव के दौरान प्लास्टिक,कांच,बोतलें और अन्य अपशिष्ट उपजाऊ भूमि पर जमा हो जाते हैं, क्षेत्र से सामने आई तस्वीरें बताती हैं कि खेतों में अब फसलों से ज्यादा प्लास्टिक की परत दिखाई दे रही है, खेतों की मेड़ और तारबंदी के पास कचरे का ढेर जमा हो चुका है, जिससे खेती करना लगातार कठिन होता जा रहा है।
खेती पर संकट,किसानों की बढ़ी चिंता-स्थानीय किसानों का कहना है कि हर बारिश के बाद उनके खेतों में नया कचरा जमा हो जाता है,बुवाई से पहले खेत साफ करने में कई दिन लग जाते हैं,फिर भी पूरी तरह सफाई नहीं हो पाती,प्लास्टिक मिट्टी की उर्वरता कम कर रही है,जिससे उत्पादन पर भी असर पड़ने लगा है,किसानों का कहना है कि यह केवल सफाई की समस्या नहीं,बल्कि उनकी आजीविका पर सीधा हमला है,यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में खेती करना और कठिन हो जाएगा।
कांच के टुकड़ों से बढ़ा खतरा, मवेशियों की जान भी जोखिम में- नालियों के साथ खेतों में पहुंच रहे कांच के टुकड़े किसानों और मवेशियों दोनों के लिए खतरा बन गए हैं। खेतों में काम करते समय कई किसानों के पैर कांच से कट चुके हैं,वहीं खेतों में चरने वाले मवेशी चारे के साथ पॉलीथिन और प्लास्टिक निगल लेते हैं,जिससे उनके बीमार होने और मौत तक की आशंका बनी रहती है,पशु चिकित्सकों के अनुसार मवेशियों के पेट में प्लास्टिक जमा होने से गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न होती हैं, जो कई बार जानलेवा साबित होती हैं।
स्वच्छ भारत मिशन के दावों पर उठ रहे सवाल-ग्रामीणों का कहना है कि सरकार स्वच्छता अभियान पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है,लेकिन जमीनी स्तर पर कचरा प्रबंधन की स्थिति बेहद खराब है, यदि नालियों की नियमित सफाई होती और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की प्रभावी व्यवस्था बनाई जाती,तो किसानों को इस समस्या का सामना नहीं करना पड़ता,लोगों का कहना है कि नालियों का निर्माण तो कर दिया गया,लेकिन उनके पानी और कचरे के सुरक्षित निस्तारण की कोई व्यवस्था नहीं बनाई गई।
किसानों ने उठाई ये प्रमुख मांगें…
खेतों की ओर खुलने वाले नालों का रुख बदला जाए।
खेतों में जमा प्लास्टिक और कचरे की तत्काल सफाई कराई जाए।
नियमित नाली सफाई की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
ठोस अपशिष्ट प्रबंधन एवं कचरा संग्रहण की स्थायी व्यवस्था बनाई जाए।
किसानों को हुए नुकसान का आकलन कर उचित मुआवजा दिया जाए।
ग्रामीणों के बीच स्वच्छता और कचरा प्रबंधन को लेकर विशेष जनजागरूकता अभियान चलाया जाए।
अब प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती- यह मामला केवल गंदगी का नहीं,बल्कि पर्यावरण संरक्षण, कृषि उत्पादन और किसानों की आजीविका से जुड़ा हुआ है, यदि समय रहते नालियों के निकास की व्यवस्था नहीं बदली गई और ठोस कचरा प्रबंधन को प्रभावी नहीं बनाया गया,तो सोनहत के उपजाऊ खेत धीरे-धीरे बंजर होने लगेंगे,किसानों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र समाधान नहीं निकला तो वे प्रशासन के खिलाफ आंदोलन करने को बाध्य होंगे,अब देखने वाली बात होगी कि स्वच्छ भारत के दावों के बीच जिम्मेदार विभाग इस गंभीर समस्या का स्थायी समाधान निकालते हैं या यह मुद्दा भी अन्य शिकायतों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा।
प्रशासन और जनप्रतिनिधियों पर उपेक्षा के आरोप
ग्रामीणों का आरोप है कि इस गंभीर समस्या की जानकारी कई बार स्थानीय अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को दी गई, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकला, किसानों का कहना है कि हर वर्ष यही स्थिति बनती है, लेकिन कार्रवाई केवल आश्वासन तक सीमित रह जाती है।
जनता की भी जिम्मेदारी कम नहीं
इस समस्या का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है, बड़ी संख्या में लोग घरेलू कचरा, प्लास्टिक, डिस्पोजल, बोतलें और अन्य अपशिष्ट सीधे नालियों में फेंक देते हैं। यही कचरा पानी के साथ बहकर किसानों के खेतों तक पहुंच जाता है, विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक आम नागरिक स्वयं जागरूक नहीं होंगे और नालियों को कूड़ेदान की तरह उपयोग करना बंद नहीं करेंगे, तब तक केवल प्रशासनिक कार्रवाई से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं होगा।
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