- करोड़ों की आरडीएसएस योजना पर सवाल,घंटों बिजली गुल,गुणवत्ता और निगरानी पर उठे गंभीर प्रश्न
- बिजली सुधार योजना बनी मुसीबत,सूरजपुर में रोज घंटों कटौती,आरडीएसएस कार्यों पर सवालों की बौछार
- ठेकेदार चला रहा व्यवस्था,अधिकारी मौन? आरडीएसएस कार्यों के बीच चरमराई बिजली व्यवस्था
- खंभे-तार तो लग रहे, लेकिन अंधेरे में डूबा शहर…आरडीएसएस योजना की जमीनी हकीकत पर सवाल
- करोड़ों खर्च,फिर भी बिजली संकट बरकरार,आरडीएसएस कार्यों से ज्यादा बढ़ी जनता की परेशानी
- आरडीएसएस योजना में गुणवत्ता पर सवाल, घंटों बिजली गुल…अब श्रम मानकों पर भी उठे प्रश्न
- 20 दिनों से खंभे-तार और ट्रांसफार्मर लगाने के कार्य के बीच शहर झेल रहा अघोषित बिजली
- कटौती,गुणवत्ता,स्थल चयन और निगरानी पर उठे गंभीर सवाल
- 4 से 8 घंटे तक बिजली गुल रहने से आम जनता,व्यापारी,छात्र और मरीज परेशान
- करोड़ों की योजना के बावजूद उपभोक्ताओं को नहीं मिल रही राहत
- विभागीय समन्वय और परियोजना की निगरानी पर स्थानीय लोगों ने उठाए सवाल
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,07 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। बिजली व्यवस्था को मजबूत बनाने और उपभोक्ताओं को बेहतर एवं निर्बाध विद्युत आपूर्ति उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई आरडीएसएस योजना सूरजपुर जिले में इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है, योजना का उद्देश्य पुराने विद्युत ढांचे का आधुनिकीकरण, जर्जर तारों का प्रतिस्थापन,नए विद्युत पोल एवं ट्रांसफार्मर स्थापित करना तथा भविष्य की बढ़ती मांग के अनुरूप वितरण व्यवस्था को मजबूत बनाना है,लेकिन जिले में योजना के क्रियान्वयन को लेकर जिस प्रकार की शिकायतें सामने आ रही हैं,उससे यह सवाल उठने लगे हैं कि आखिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी उपभोक्ताओं को राहत क्यों नहीं मिल रही? पिछले लगभग 20 दिनों से शहर और आसपास के क्षेत्रों में लगातार बिजली बाधित रहने की शिकायतें सामने आ रही हैं,कई मोहल्लों में प्रतिदिन चार,पांच,छह और कभी-कभी आठ घंटे तक बिजली आपूर्ति प्रभावित रहने से आमजन का धैर्य जवाब देने लगा है,लोगों का कहना है कि बिजली बंद करने से पहले न तो कोई सार्वजनिक सूचना जारी की जाती है और न ही यह बताया जाता है कि बिजली कब तक बहाल होगी। परिणामस्वरूप व्यापार,शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और घरेलू जीवन सभी प्रभावित हो रहे हैं।
20 दिनों से चल रहा कार्य,लेकिन व्यवस्था लगातार बिगड़ती जा रही…
आरडीएसएस योजना के तहत जिले में बड़े पैमाने पर नए बिजली पोल, जर्जर तारों का प्रतिस्थापन और नए ट्रांसफार्मर लगाए जा रहे हैं, यह कार्य एक निजी कार्यदायी एजेंसी के माध्यम से कराया जा रहा है तथा परियोजना की निगरानी के लिए अलग अधिकारी भी नियुक्त किए गए हैं, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले लगभग 20 दिनों से चल रहे कार्यों के दौरान बिजली व्यवस्था लगातार बिगड़ती जा रही है, उपभोक्ताओं का प्रश्न है कि यदि योजना का उद्देश्य व्यवस्था सुधारना है,तो निर्माण कार्य के दौरान भी उपभोक्ताओं को न्यूनतम असुविधा सुनिश्चित करने की व्यवस्था क्यों नहीं बनाई गई?
स्थल चयन पर उठ रहे सवाल
योजना के तहत लगाए जा रहे ट्रांसफार्मरों और बिजली खंभों के स्थल चयन को लेकर भी स्थानीय स्तर पर अनेक प्रश्न उठाए जा रहे हैं, लोगों का कहना है कि जिन क्षेत्रों में वर्षों से कम वोल्टेज,ओवरलोडिंग और ट्रांसफार्मर जलने जैसी समस्याएं बनी हुई हैं,वहां अपेक्षित क्षमता के ट्रांसफार्मर अब भी नहीं लगाए गए हैं,वहीं कुछ ऐसे स्थानों पर भी नए पोल और ट्रांसफार्मर लगाए जाने की चर्चा है,जहां उनकी तत्काल आवश्यकता कम बताई जा रही है,इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है,लेकिन नागरिकों ने विभाग से स्थल चयन के तकनीकी आधार को सार्वजनिक करने की मांग की है।
क्या 25 केवीए ट्रांसफार्मर भविष्य की जरूरत पूरी कर पाएंगे?
कई उपभोक्ताओं ने यह भी सवाल उठाया है कि जहां विद्युत भार पहले से अधिक है,वहां 25 केवीए क्षमता वाले ट्रांसफार्मर लगाने का निर्णय कितना व्यावहारिक है, विद्युत क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि ट्रांसफार्मर की क्षमता का निर्धारण वर्तमान लोड के साथ-साथ भविष्य की मांग को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए,यदि क्षमता का सही आकलन नहीं किया गया तो कुछ समय बाद फिर ओवरलोडिंग और बार-बार फॉल्ट की समस्या सामने आ सकती है।
आरडीएसएस योजना में किसकी क्या जिम्मेदारी?
स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार परियोजना के विभिन्न चरणों के लिए अलग-अलग स्तर पर जिम्मेदारियां निर्धारित हैं, परियोजना के क्रियान्वयन,तकनीकी समन्वय, स्थल चयन,गुणवत्ता नियंत्रण और निरीक्षण की जिम्मेदारी विभिन्न अधिकारियों और तकनीकी कर्मचारियों के बीच विभाजित होती है। स्थानीय लोगों ने परियोजना से जुड़े कार्यपालन अभियंता (परियोजना) मुकेश कुमार धुर्व,लाइनमैन (परियोजना) जी.एन. तिवारी तथा सहायक अभियंता बी.एस. मरकाम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं,उनका कहना है कि निर्माण कार्यों की नियमित निगरानी,गुणवत्ता परीक्षण और स्थल निरीक्षण को और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है। इन आरोपों पर संबंधित अधिकारियों का पक्ष लिया जाना शेष है।
व्यापारी,छात्र और मरीज सबसे ज्यादा प्रभावित
बिजली कटौती का सबसे अधिक असर छोटे व्यापारियों पर पड़ रहा है,कंप्यूटर आधारित कार्य,ऑनलाइन भुगतान,प्रिंटिंग,फोटो कॉपी, वेल्डिंग,मोबाइल रिपेयरिंग सहित अनेक व्यवसाय प्रभावित हो रहे हैं,छात्रों की ऑनलाइन पढ़ाई और परीक्षा की तैयारी बाधित हो रही है, अस्पतालों और निजी क्लीनिकों में भी बिजली बाधित होने से मरीजों को असुविधा होती है, विशेषकर जहां बैकअप व्यवस्था सीमित है।
मेंटेनेंस के नाम पर रोज घंटों कटौती, आखिर कब तक?
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि विभाग लगभग रोज किसी न किसी हिस्से में बिजली बंद कर कार्य कराने की बात कहता है, यदि यह कार्य वास्तव में नेटवर्क सुधार के लिए हो रहे हैं तो उनकी जानकारी पहले से सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती? लोगों का आरोप है कि बिना पूर्व सूचना घंटों बिजली बंद रखना उपभोक्ताओं के अधिकारों की अनदेखी है, सोमवार को भी शहर के पुराना बस स्टैंड, पुराना अस्पताल, बाजार पारा सहित अनेक क्षेत्रों में लगभग आठ घंटे तक बिजली आपूर्ति बाधित रही, समाचार लिखे जाने तक कई क्षेत्रों में बिजली बहाल नहीं हो सकी थी, व्यापारियों के प्रतिष्ठान प्रभावित हुए, विद्यार्थियों की पढ़ाई बाधित हुई, मरीजों को परेशानी हुई और घरेलू उपभोक्ताओं के दैनिक कार्य ठप पड़ गए।
सबसे बड़ा सवाल-यदि डीई को जानकारी नहीं थी, तो व्यवस्था कौन देख रहा था?
घटना के दौरान जब विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों से संपर्क किया गया तो विभागीय समन्वय की स्थिति भी सवालों के घेरे में आ गई, कार्यपालन स्तर के अधिकारी ने बताया कि उन्हें स्वयं इस कटौती की जानकारी नहीं थी और वे संबंधित सहायक अभियंता से बात करेंगे, यदि जिले के जिम्मेदार अधिकारी को ही यह जानकारी नहीं कि शहर के बड़े हिस्से में घंटों से बिजली बंद है, तो यह केवल तकनीकी समस्या नहीं बल्कि प्रशासनिक समन्वय की कमी का भी संकेत माना जा रहा है।
गोपालपुर फीडर परिवर्तन पर भी उठे सवाल
सूरजपुर नगर पालिका के वार्ड क्रमांक-1 गोपालपुर की बिजली आपूर्ति व्यवस्था में हुए परिवर्तन को लेकर भी लोगों में असंतोष दिखाई दे रहा है, स्थानीय नागरिकों का कहना है कि वर्षों तक यह क्षेत्र शहर के विद्युत नेटवर्क से जुड़ा रहा। अब इसे दूसरे फीडर से जोड़ने के निर्णय के बाद लोगों को नई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, विभाग का कहना है कि यह निर्णय तकनीकी कारणों और लोड प्रबंधन के लिए लिया गया, जबकि नागरिक मांग कर रहे हैं कि इस निर्णय के तकनीकी कारणों को सार्वजनिक किया जाए।
गुणवत्ता नियंत्रण सबसे बड़ा प्रश्न
योजना के अंतर्गत लगाए जा रहे बिजली खंभों,तारों और ट्रांसफार्मरों की गुणवत्ता को लेकर भी चर्चा हो रही है,स्थानीय लोगों का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर हो रहे कार्यों में स्वतंत्र गुणवत्ता परीक्षण आवश्यक है,यदि सामग्री की गुणवत्ता या निर्माण प्रक्रिया में किसी प्रकार की कमी रह गई तो कुछ वर्षों बाद यही परियोजना फिर मरम्मत और अतिरिक्त खर्च का कारण बन सकती है, विशेषज्ञों का भी मानना है कि किसी भी विद्युत परियोजना में केवल निर्माण कार्य पूरा कर देना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि सामग्री की गुणवत्ता, सुरक्षा मानकों का पालन और तकनीकी परीक्षण समान रूप से महत्वपूर्ण होते हैं।
जनता पूछ रही है-करोड़ों की योजना का लाभ आखिर कब मिलेगा?
उपभोक्ताओं का कहना है कि सरकार ने करोड़ों रुपये इसलिए खर्च किए हैं ताकि बिजली व्यवस्था मजबूत हो, लेकिन यदि निर्माण कार्यों के दौरान ही लगातार अघोषित कटौती होगी और कार्यों की गुणवत्ता पर प्रश्न उठेंगे, तो योजना का उद्देश्य प्रभावित होगा, लोग चाहते हैं कि विभाग पारदर्शिता के साथ यह बताए कहां-कहां कार्य हो रहे हैं? कितने समय तक बिजली बंद रहेगी? किन तकनीकी मानकों पर ट्रांसफार्मर लगाए जा रहे हैं? गुणवत्ता परीक्षण कौन कर रहा है? कार्य पूरा होने के बाद उसकी तकनीकी जांच कब होगी?
क्या होनी चाहिए कार्रवाई? स्थानीय नागरिकों ने मांग की है कि…
पूरे आरडीएसएस कार्यों का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कराया जाए।
सामग्री की गुणवत्ता की थर्ड पार्टी जांच कराई जाए।
ट्रांसफार्मरों एवं पोल के स्थल चयन की समीक्षा की जाए।
अघोषित बिजली कटौती की जवाबदेही तय की जाए।
कार्यों की प्रगति और शटडाउन की पूर्व सूचना सार्वजनिक की जाए।
उपभोक्ताओं की शिकायतों के समाधान के लिए प्रभावी नियंत्रण कक्ष बनाया जाए।
क्या आरडीएसएस कार्य में कम उम्र के दिखने वाले श्रमिकों से भी लिया जा रहा काम?
आरडीएसएस परियोजना के तहत चल रहे कार्यों के दौरान एक तस्वीर सामने आई है, जिसमें एक कम उम्र का दिखाई देने वाला व्यक्ति कार्यस्थल पर श्रम करता हुआ नजर आ रहा है,यदि यह व्यक्ति वास्तव में 18 वर्ष से कम आयु का है और परियोजना से जुड़े कार्य में नियोजित है,तो यह श्रम कानूनों के अनुपालन पर गंभीर सवाल खड़े करता है, स्थानीय लोगों का आरोप है कि परियोजना के दौरान श्रमिकों की आयु,सुरक्षा उपकरणों के उपयोग और श्रम मानकों के पालन की पर्याप्त निगरानी नहीं की जा रही। ऐसे में यह आवश्यक है कि संबंधित विभाग,श्रम विभाग तथा कार्यदायी एजेंसी इस मामले की जांच कर स्पष्ट करें कि तस्वीर में दिखाई दे रहा व्यक्ति कौन है? उसकी आयु क्या है? क्या वह कंपनी या उसके ठेकेदार के लिए कार्य कर रहा था? यदि हाँ,तो क्या सभी श्रम एवं सुरक्षा नियमों का पालन किया गया? यदि जांच में यह पाया जाता है कि किसी नाबालिग से प्रतिबंधित या अवैध रूप से श्रम कराया गया, तो संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई का प्रावधान है।
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