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नई दिल्ली@हैदराबाद में नीट परीक्षा से पहले छात्रा की मौत,सुसाइड नोट से खुलासा

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नई दिल्ली,21 जून 2026। शिक्षा और करियर की दौड़ के बीच मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा फिर से चर्चा का विषय बन गया है। हैदराबाद के मियापुर इलाके में एक बेहद दुखद घटना सामने आई है, जहाँ 19 वर्षीय छात्रा शेख सना ने नीट-यूजी परीक्षा के तनाव के कारण आत्महत्या कर ली। वह मियापुर के जयबेरी कल्पना अपार्टमेंट में अपनी बहनों के साथ रहती थी और लंबे समय से नीट परीक्षा की तैयारी में जुटी थी। उसके पिता कुवैत में कार्यरत हैं और मां घटना के कुछ दिन पहले ही किसी कार्यवश शहर से बाहर गई थीं। पढ़ाई के अत्यधिक दबाव और परीक्षा में असफलता के डर ने इस युवा छात्रा को इतना विचलित कर दिया कि उसने मौत को गले लगाना बेहतर समझा। पुलिस के अनुसार, घटनास्थल से एक सुसाइड नोट बरामद हुआ है, जिसमें सना ने स्पष्ट लिखा है कि उसकी मौत के लिए कोई भी अन्य व्यक्ति जिम्मेदार नहीं है। यह नोट उसकी अंदरूनी मानसिक पीड़ा और अकेलेपन को दर्शाता है। मियापुर थाना पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए शव को कब्जे में लिया और पोस्टमार्टम के लिए गांधी हॉस्पिटल भेजा। इस घटना ने पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ा दी है। हालांकि पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है, लेकिन यह सवाल अनुत्तरित है कि आखिर क्यों एक मेधावी छात्र का सपना इस कदर बोझ बन जाता है कि वह अपनी जान तक दे देता है।
परीक्षा के प्रशासनिक पहरे और मानसिक स्वास्थ्य की जंग
यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि यह घटना ठीक उस समय सामने आई है, जब आज 21 जून 2026 को नीट-यूजी की पुनः परीक्षा का आयोजन देशभर में किया जा रहा है। एक ओर जहां जिला प्रशासन ने परीक्षा को नकलमुक्त, पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के लिए चाक-चौबंद इंतजाम किए हैं, बायोमेट्रिक सत्यापन और सीसीटीवी कैमरों से कड़ी निगरानी रखी जा रही है, वहीं दूसरी ओर इन सब के बीच एक युवा जिंदगी का बुझ जाना शिक्षा प्रणाली के गहरे संकट को उजागर करता है। आज दोपहर 2 बजे से शाम 5ः15 बजे तक होने वाली इस परीक्षा के लिए लाखों छात्र केंद्र पहुंचे हैं, लेकिन सना जैसे कई छात्र ऐसे हैं जो परीक्षा की तैयारी के साथ-साथ गंभीर अवसाद (डिप्रेशन) से भी जूझ रहे होते हैं।
शिक्षा तंत्र और परिवार को समझने की जरूरत
इस घटना ने समाज के सामने कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षाएं न केवल शैक्षणिक योग्यता का परीक्षण करती हैं, बल्कि ये छात्रों की मानसिक मजबूती की भी अग्निपरीक्षा बन गई हैं। परिवार की उम्मीदों का बोझ और समाज का दबाव अक्सर छात्रों को ऐसी चरम स्थिति तक धकेल देता है। प्रशासनिक तैयारी चाहे कितनी भी कड़ी क्यों न हो, जब तक हम शिक्षा के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता नहीं देंगे, तब तक ऐसी दुखद घटनाओं को रोकना मुश्किल है। यह समय है कि न केवल शिक्षा संस्थान, बल्कि अभिभावक भी अपने बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के प्रति अधिक संवेदनशील बनें और उन्हें यह अहसास दिलाएं कि जीवन किसी भी परीक्षा से कहीं अधिक मूल्यवान है।


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