- 20 दिन पहले छात्र ने मीडिया के सामने खोली थी छात्रावास की अव्यवस्थाओं की पोल
- छात्रावास की अव्यवस्थाओं पर बोला छात्र…20 दिन बाद फांसी के फंदे पर मिला
- खबर छपने के बाद पहुंचे थे अधिकारी,लेकिन क्या बदली कोई व्यवस्था?
- घर जाने की जिद कर रहा था छात्र,अनुमति नहीं मिली : सूत्र
- अधीक्षक अवकाश पर,प्रभारी व्यवस्था संभाल रहे थे : घटना के बाद पहुंचे…
- सवाल बड़ाः अव्यवस्थाओं पर बोलना क्या छात्र के लिए ‘अपराध’ बन गया?
- छात्रावास में व्यवस्था नहीं,सन्नाटा…11 वीं के छात्र ने लगाई फांसी…
- अव्यवस्थाओं का खुलासा किया,फिर चुप हो गया हमेशा के लिए…
- निरीक्षण हुआ, आश्वासन मिला…लेकिन एक छात्र की जिंदगी चली गई…
- व्यवस्था पर सवाल उठाने की कीमत? आदिवासी छात्र की संदिग्ध मौत…
- घर जाने की जिद,अनुमति नहीं…फिर छात्र ने लगा ली फांसी…
- अधीक्षक अवकाश पर,प्रभारी व्यवस्था…और छात्र की जिंदगी खत्म
- फाइलों में सब ‘संतोषजनक’,छात्रावास में एक छात्र की मौत…

-रवि सिंह-
सोनहत,14 मार्च 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिले के वनांचल विकासखंड सोनहत से आई एक खबर ने न सिर्फ एक परिवार का चिराग बुझा दिया,बल्कि आदिवासी छात्रावासों की व्यवस्था पर भी कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, यहां स्थित एक आदिवासी छात्रावास में रहकर पढ़ाई कर रहे 11वीं कक्षा के एक छात्र ने अपने ही कमरे में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। घटना जितनी दुखद है,उससे कहीं अधिक चिंताजनक उसके पीछे उठ रहे सवाल हैं, सवाल सिर्फ एक छात्र की मौत का नहीं है, बल्कि उस पूरे सिस्टम का है जो अक्सर कागजों में ‘सुव्यवस्थित’ और जमीन पर ‘भगवान भरोसे’ चलता दिखाई देता है, सूत्रों के अनुसार छात्र पिछले दो दिनों से काफी गुमसुम था और बार-बार घर जाने की जिद कर रहा था, बताया जा रहा है कि उसे घर जाने की अनुमति नहीं दी गई थी,यदि यह बात सच साबित होती है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या एक छात्र की मानसिक स्थिति को समझना छात्रावास प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं होती? यह घटना जितनी दुखद है,उससे कहीं अधिक चिंताजनक उसके पीछे उठ रहे सवाल हैं, क्योंकि यह सिर्फ एक आत्महत्या की घटना नहीं रह गई है,बल्कि छात्रावासों में व्याप्त अव्यवस्थाओं,प्रशासनिक लापरवाही और कथित दबाव की पूरी कहानी सामने लाने लगी है।

20 दिन पहले छात्र ने बताई थी छात्रावास की सच्चाई– सूत्रों के अनुसार यह वही छात्र था जिसने लगभग 20 दिन पहले मीडिया के सामने छात्रावास में व्याप्त अव्यवस्थाओं की जानकारी दी थी,उसने भोजन व्यवस्था, सुविधाओं की कमी और छात्रावास की स्थिति को लेकर कई बातें सामने रखी थीं, खबर प्रकाशित होने के बाद प्रशासनिक हलचल भी हुई थी, वरिष्ठ अधिकारी छात्रावास पहुंचे थे,निरीक्षण किया गया, छात्रों से बातचीत हुई और व्यवस्थाओं को सुधारने का आश्वासन भी दिया गया,लेकिन सवाल यह है कि क्या उस निरीक्षण के दौरान समस्या को समझने की कोशिश हुई या फिर समस्या बताने वाले छात्र को ही समस्या मान लिया गया?
क्या बयान देने के कारण छात्र पर पड़ा दबाव?
सूत्रों का कहना है कि छात्र द्वारा मीडिया में बयान दिए जाने से कुछ अधिकारी नाराज थे, खबर प्रकाशित होने के बाद जब अधिकारी छात्रावास पहुंचे तो क्या उस छात्र से अलग से पूछताछ हुई? क्या उसे फटकारा गया? क्या उसे दबाव में लिया गया? इन सवालों के जवाब अभी सामने नहीं आए हैं, लेकिन यह जरूर कहा जा रहा है कि छात्र उस घटना के बाद से मानसिक रूप से परेशान दिखाई दे रहा था।

छात्र दो दिनों से गुमसुम था,घर जाने की कर रहा था जिद
सूत्रों के अनुसार घटना से पहले छात्र दो दिनों से काफी चुप और परेशान दिखाई दे रहा था,बताया जाता है कि वह लगातार घर जाने की जिद कर रहा था,लेकिन उसे छुट्टी नहीं दी गई,महत्वपूर्ण बात यह है कि वह बोर्ड परीक्षा का परीक्षार्थी भी नहीं था। ऐसे में छुट्टी देने में कोई बड़ी शैक्षणिक बाधा भी नहीं थी, अब सवाल उठ रहा है कि आखिर उसे घर जाने की अनुमति क्यों नहीं दी गई? क्या छात्र किसी मानसिक दबाव में था? क्या वह छात्रावास के माहौल से निकलना चाहता था?
मोबाइल फोन भी बना चर्चा का विषय
सूत्रों के अनुसार छात्र के पास छात्रावास में उसका निजी मोबाइल फोन भी था, कई छात्रावासों में मोबाइल रखने पर प्रतिबंध रहता है,ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि क्या अधीक्षक को इसकी जानकारी थी? यदि जानकारी नहीं थी तो निगरानी व्यवस्था कमजोर थी और यदि जानकारी थी तो नियमों का पालन क्यों नहीं कराया गया?
अधीक्षक अवकाश पर,प्रभारी व्यवस्था के भरोसे छात्रावास
घटना के समय छात्रावास अधीक्षक अवकाश पर बताए जा रहे हैं,सूत्रों के अनुसार छात्रावास की व्यवस्था प्रभारी के भरोसे चल रही थी और घटना के बाद ही प्रभारी मौके पर पहुंचे,जिले में कई छात्रावास इसी तरह प्रभारी व्यवस्था से संचालित हो रहे हैं। स्थायी अधीक्षक कहीं और पदस्थ होते हैं और काम कहीं और करते हैं।
छात्रावासों में प्रभार का खेल?
सूत्रों का कहना है कि जिले में छात्रावासों के प्रभार को लेकर भी एक अलग व्यवस्था चल रही है, चर्चा है कि कुछ अधीक्षक मनचाही जगह काम करने के लिए ऊंची बोली लगाते हैं और उसी आधार पर उन्हें छात्रावास का प्रभार मिल जाता है, यानी छात्रावास अब शिक्षा का केंद्र कम और प्रभार की बोली का मैदान ज्यादा बनते जा रहे हैं।
पदोन्नति के छह माह बाद भी मूल संस्था से दूर अधीक्षक
सूत्रों के अनुसार कई अधीक्षकों की पदोन्नति हुए लगभग छह माह हो चुके हैं, लेकिन अभी तक उन्हें उनकी मूल संस्था में नहीं भेजा गया, स्थिति यह है कि कुछ अधीक्षक मनचाही जगहों पर काम कर रहे हैं, जबकि उनकी जगह अन्य लोग प्रभार संभाल रहे हैं, बताया जाता है कि इस व्यवस्था में दो तरफा वसूली की भी चर्चा है, एक ओर पदोन्नत अधीक्षक मनचाही जगह बने रहने के लिए भुगतान करता है और दूसरी ओर उसकी जगह काम करने वाला भी व्यवस्था बनाए रखने के लिए भुगतान करता है।
छात्र सुविधाओं का टोटा, अधीक्षकों की जीवनशैली अलग-जिले के छात्रावासों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है,कई छात्रावासों में भोजन,स्वच्छता,बिस्तर और पढ़ाई की मूलभूत सुविधाओं की कमी की शिकायतें सामने आती रहती हैं, लेकिन यदि अधीक्षकों की जीवनशैली देखी जाए तो वह इन कठिनाइयों से प्रभावित होती दिखाई नहीं देती, यही कारण है कि लोग सवाल उठाने लगे हैं कि छात्रावास व्यवस्था आखिर किसके लिए चल रही है,छात्रों के लिए या व्यवस्था संभालने वालों के लिए?
कार्यालय से छात्रावास तक, कमी सिर्फ छात्रों की सुविधाओं में
छात्रावास योजना का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर और दूरदराज क्षेत्रों के छात्रों को शिक्षा का अवसर देना है, छात्र दूर-दूर से आकर छात्रावासों में रहते हैं और पढ़ाई करते हैं, लेकिन सूत्रों का कहना है कि कार्यालय से लेकर छात्रावास तक व्यवस्था की कमी शायद ही कहीं दिखाई देती हो कमी यदि है तो केवल छात्रों की सुविधाओं में।
सहायक आयुक्त पांच घंटे बाद पहुंचीं
सूत्रों के अनुसार छात्रावास की जिला स्तरीय जिम्मेदार अधिकारी सहायक आयुक्त घटना के लगभग पांच घंटे बाद मौके पर पहुंचीं, इतनी गंभीर घटना के बाद जिम्मेदार अधिकारी का देर से पहुंचना भी कई सवाल खड़े कर रहा है,यह स्थिति यह भी दर्शाती है कि कई बार जिम्मेदारी कार्यालय की फाइलों तक सीमित रह जाती है।
क्या जिम्मेदारी केवल वसूली तक सीमित है?
सूत्रों का कहना है कि जिले में छात्रावासों से मासिक और वार्षिक वसूली की परंपरा लंबे समय से जारी है, लेकिन जब बात छात्रों की सुविधाओं और व्यवस्थाओं को सुधारने की आती है तो वही तत्परता दिखाई नहीं देती, अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल वसूली तक सीमित है या फिर छात्रों की सुरक्षा और सुविधाओं की व्यवस्था करना भी उनका कर्तव्य है?
एक छात्र चला गया, लेकिन सवाल छोड़ गया
जिस छात्र ने अपनी जान गंवाई वह अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसकी मौत कई गंभीर सवाल छोड़ गई है, क्या अव्यवस्थाओं के खिलाफ आवाज उठाना उसके लिए भारी पड़ गया? क्या उसे दबाव और घुटन का सामना करना पड़ा? क्या छात्रावास व्यवस्था वास्तव में छात्रों के हित में काम कर रही है? इन सवालों के जवाब अब जांच के बाद ही सामने आएंगे, लेकिन इतना जरूर है कि इस घटना ने छात्रावासों की बंद दीवारों के भीतर चल रही कई परतों को उजागर कर दिया है, और सबसे बड़ा सवाल अब भी बाकी है, क्या अव्यवस्थाओं के खिलाफ बोलने की कीमत एक छात्र को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी?
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