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कोरिया@ शिलान्यास से शर्मनाक तक कोरिया उत्सव में श्रेय ऊपर, जवाबदेही नीचे

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तालियों का उत्सव,जिम्मेदारी का पतन: टूटी पट्टिकाओं ने खोली प्रशासन की पोल
मंच पर मुस्कान,मैदान में बेइज्जती: कोरिया दौरे के बाद प्रशासन कठघरे में
फोटो में फ्रंट रो, कार्रवाई में बैक सीट: किसे बचाया, किसे बनाया बलि का बकरा?
उद्घाटन भव्य,समापन विडंबना: विकास के बोर्ड धूल में, जिम्मेदारी फाइल में
श्रेय की होड़,जवाबदेही से भाग: कोरिया में प्रशासनिक संतुलन पर सवाल
तालियां सबकी,सजा एक की? कोरिया उत्सव के बाद उठे तीखे प्रश्न
-रवि सिंह-
कोरिया,22 फरवरी 2026(घटती-घटना)।
मुख्यमंत्री की धर्मपत्नी के दौरे से लेकर स्वयं मुख्यमंत्री के आगमन तक जिला प्रशासन ने जिस फुर्ती,सजगता और फोटो-प्रबंधन का परिचय दिया,वह किसी बड़े राष्ट्रीय आयोजन से कम नहीं था,मंच सजा,बैनर चमके, भाषण गूंजे और कैमरे इतने सक्रिय रहे मानो विकास का असली उद्घाटन लेंस के सामने ही होना हो, लेकिन समापन के बाद जो दृश्य सामने आया,उसने पूरे उत्सव को व्यंग्य में बदल दिया—मैदान में धूल फांकती, टूटी और बिखरी शिलान्यास पट्टिकाएं,जिस विकास को मंच से ऐतिहासिक बताया गया,वह मैदान में प्रतीकात्मक होकर रह गया।
बता दे की राजस्व विभाग किस तरह अन्य विभागों को कुचलता है,किस तरह वह अन्य विभागों को निचले दर्जे का और केवल उपयोगी मानता है इसका ताजा उदाहरण कोरिया जिले से देखने को मिल रहा है, बताया जा रहा है कोरिया जिले में मुख्यमंत्री के आगमन और तीन दिवसीय उत्सव के आयोजन समापन उपरांत अब गलतियों के लिए जनपद सीईओ बैकुंठपुर को पद से हटाकर जिला संलग्न किया जा रहा है,उनकी जगह अब कलेक्टर कोरिया की पसंद का प्रभारी सीईओ जिम्मेदारी सम्हाल सकता है,बताया जा रहा है कि शासन से सीधे नियुक्त जनपद सीईओ सोनहत और बैकुंठपुर दोनों ही कलेक्टर कोरिया को नापसंद थे और जिसके कारण वह उनसे नाराज चल रही थीं और सोनहत सीईओ को हटा चुकी कलेक्टर को बैकुंठपुर सीईओ को हटाने का मौका अपने मन पसंद प्रभारी सीईओ को लाने का मौका नहीं मिल रहा था और इस मौके की तलाश आखिर कार पूरी की गई और जनपद सीईओ को बेवजह अब हटा दिया गया, जनपद सीईओ को कोरिया उत्सव में लापरवाही,कार्य उदासीनता के लिए हटाया गया है,और यह ऐसी उदासीनता है जो लागू अन्य विभागों पर होनी चाहिए लेकिन इसे जनपद सीईओ पर लागू किया गया, मुख्यमंत्री द्वारा शिलान्यास किए गए पट्टीकाओं का मैदान में पड़े मिलना,टूट जाना और पांव के नीचे आना गलती और चूक मानी गई है,वैसे क्या पूरे आयोजन का जिम्मेदार जनपद सीईओ को बनाया गया था यह सवाल शेष रह गया इस कार्यवाही के दौरान,वैसे आयोजन स्थल वाले मैदान में शिला पट्टिकाओं की टूटी स्थिति कांग्रेस नेता ने सामने लाई उसके पहले पूरा जिला प्रशासन अपनी पीठ सफल आयोजन के लिए थपथपा रहा था जिसमें पदोन्नति की आस थी,पुरस्कार की अभिलाषा थी,आयोजन का श्रेय राजस्व विभाग को था लेकिन जैसे ही कार्यवाही की बात सामने आई वैसे ही बलि का बकरा सीईओ जनपद को बनाया गया,शेष जो असल जिम्मेदार थे उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी कर मामले में कार्यवाही संतुलन साबित किया गया,पूरे मामले में राजस्व विभाग को बचाने खेल हुआ यह अब सामने है।
पट्टिकाएं कई विभागों की, कार्रवाई सिर्फ जनपद सीईओ पर क्यों?- कांग्रेस नेता द्वारा वायरल किए गए वीडियो ने पूरे घटनाक्रम को एक नया मोड़ दे दिया, वीडियो में साफ दिखाई दे रहा है कि मैदान में पड़ी और टूटी शिलान्यास पट्टिकाएं केवल एक विभाग की नहीं, बल्कि कई विभागों से संबंधित थीं। सवाल स्वाभाविक है—जब पट्टिकाएं सामूहिक थीं तो जवाबदेही एकल कैसे हो गई? यदि आयोजन बहु-विभागीय था, शिलान्यास विभिन्न योजनाओं के थे और जिम्मेदारी साझा थी, तो कार्रवाई भी साझा क्यों नहीं दिखी? चर्चा यह भी है कि जिस अधिकारी पर सीधी जिम्मेदारी थी उसे केवल “कारण बताओ नोटिस” देकर औपचारिकता पूरी कर ली गई, जबकि जनपद सीईओ को हटाकर संतुलन स्थापित करने की कोशिश की गई, जिले में यह फुसफुसाहट भी है कि जहां “एवजीदार मजेदार” नहीं था, वहां नोटिस काफी था; और जहां व्यवस्था बदली जानी थी, वहां कार्रवाई जरूरी हो गई, अब सवाल यह है—क्या यह महज प्रशासनिक चूक है, या फिर पहले से तय पटकथा का हिस्सा?
धर्मपत्नी से मुख्यमंत्री तक: कार्यक्रमों में प्रशासन की लड़खड़ाहट- मुख्यमंत्री के आगमन से पहले उनकी धर्मपत्नी का दौरा हुआ, भीड़ जुटाने की तैयारी हुई, स्वागत की औपचारिकताएं पूरी की गईं। लेकिन जैसे ही वे मंच पर पहुंचीं, भीड़ का बड़ा हिस्सा पलायन करता नजर आया। मंच से कटाक्ष भी हुआ—जो प्रशासनिक तैयारी पर अप्रत्यक्ष टिप्पणी माना गया, उस समय प्रशासन ने स्थिति को सामान्य बताकर किनारा किया। पर वही असंगति आगे भी दिखी, मुख्यमंत्री के आगमन के दौरान भी कई अवसरों पर व्यवस्थागत चूक सामने आई—भीड़ प्रबंधन, समन्वय, और अंततः शिलान्यास पट्टिकाओं की दुर्दशा, लगातार दो महत्वपूर्ण दौरों में सामने आई असंगतियां यह संकेत देती हैं कि समस्या किसी एक अधिकारी या एक घटना तक सीमित नहीं थी। सवाल उठता है—क्या प्रशासन कार्यक्रमों की चमक में उलझा रहा और व्यवस्थाओं की बुनियाद कमजोर रह गई?
प्रमोशन की राजनीति या प्रशासनिक प्रदर्शन?- सूत्रों की मानें तो मुख्यमंत्री की धर्मपत्नी से लेकर मुख्यमंत्री तक के दौरे की रूपरेखा प्रशासनिक स्तर पर अत्यंत सक्रियता से तैयार की गई थी। इसे केवल आयोजन नहीं, बल्कि “प्रदर्शन” के रूप में भी देखा जा रहा है—जहां वरिष्ठ अधिकारियों के लिए यह अवसर था अपनी कार्यकुशलता प्रदर्शित करने का, मंचीय उपस्थिति, प्रोटोकॉल प्रबंधन और फोटो फ्रेम में सक्रियता—सब कुछ व्यवस्थित दिखा। लेकिन जैसे ही दोनों की रवानगी हुई, वास्तविक स्थिति सामने आने लगी, घूघरा में भीड़ का अभाव, वन विभाग विश्राम गृह में देर रात विवाद की चर्चा, और अंततः मैदान में बिखरी शिलान्यास पट्टिकाएं—इन सबने उस “सफल आयोजन” की परतें उधेड़ दीं, जिसे प्रशासन उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रहा था, व्यंग्य यही कहता है—”जब तक वीआईपी रहे, सब व्यवस्थित रहा; जाते ही व्यवस्था भी साथ चली गई।”
राजस्व विभाग क्या फोटोग्राफी तक की जिम्मेदारी के लिए तैनात था,श्रेय के लिए उपलब्ध था?- पूरे मामले में पहला सवाल यह है कि क्या आयोजन में सफलता के लिए राजस्व विभाग जिम्मेदार माना जाता और असफलता के लिए किसी को भी बलि का बकरा बनाया जाता या पहले से तय था? सवाल इसलिए क्योंकि जब वन विभाग के विश्राम गृह में पहली बार चूक हुई जो राजस्व विभाग की अतिथि सत्कार चूक थी तब मामले में कोई कार्यवाही नहीं हुई और एक मंत्री वरिष्ठ के साथ देर रात हुई बहस माफी से निपटा ली गई वहीं जब मैदान में शिलान्यास शिला पट्टिकाओं की स्थिति सामने आई जनपद सीईओ को सीधे निपटा दिया गया, क्या यह न्याय का ऐसा पहलू है जहां राजस्व विभाग का दूध भात है?
शिला पट्टिकाओं की जिम्मेदारी अन्य विभाग की,एसडीएम,नगरपालिका सीएमओ भी थे जिम्मेदार,फिर कार्यवाही क्यों सीईओ जनपद पर?- सवाल यह भी कि क्या सीईओ जनपद बैकुंठपुर सही मायने में बलि का बकरा बने, क्योंकि सूत्रों की माने तो कार्य विभाजन में शिला पट्टिकाओं की जिम्मेदारी अन्य विभाग की थी, एसडीएम बैकुंठपुर भी एक अन्य जिम्मेदार थे,लेकिन जब कार्यवाही की बात सामने आई, सीईओ को निपटाया गया, बताया तो यह भी जा रहा है कि एसडीएम ने सीधे सीईओ का ही नाम लेकर खुद को बरी कराने का प्रयास किया जबकि इतना बड़ा अनुविभाग नहीं है कि एसडीएम एक बार जाकर मैदान निरीक्षण नहीं कर सकते थे,वह नगर पालिका सीएमओ को नहीं कह सकते थे, नगर पालिका अधिकारी भी मामले में जिम्मेदार हैं यह कहना गलत नहीं होगा क्योंकि आयोजन में नगर पालिका को जिला जनपद से ऊपर का दर्जा मिला था।
सीईओ जनपद बैकुंठपुर को हटाने की पहले से थी तैयारी,अवसर को भुनाया गया?- वैसे तो लोगों का दावा है कि बैकुंठपुर जनपद सीईओ जिला प्रशासन की आंख की किरकिरी बने हुए थे, क्योंकि वह राज्य शासन से सीधे नियुक्त थे जबकि पुराने प्रभारी जनपद सीईओ को लेकर गोलबंदी जारी थी इसलिए इस मौके पर सीईओ बैकुंठपुर जनपद को निपटाया गया,अवसर समझकर पूरे मामले में अपने चहेते को उपकृत किया गया, सीईओ जनपद बैकुंठपुर की जगह मन पसंद प्रभारी की चाह में यह कार्यवाही की जानी बताई जा रही है,यह जिले की मुखिया की मंशा वाली कार्यवाही बताई जा रही है।
पूर्व मुख्यमंत्री के ओएसडी एसडीएम ने खुद को बचाया,सीईओ जनपद को निपटाया?- सवाल यह भी कि क्या पूर्व मुख्यमंत्री के ओएसडी एसडीएम ने सीईओ जनपद को निपटाया है,माना यही जा रहा है,मामला पूरी तरह एकतरफा निर्णय वाला है, क्योंकि सीईओ जनपद को कोई पूरे मामले का दोषी मानने तैयार नहीं है,इसका कारण भी है, आयोजन में नगर पालिका की भूमिका जनपद से अग्रणी थी, नगर पालिका के जनप्रतिनिधियों का क्रम मंच पर ऊपर था, इस हिसाब से भी बातें यही हो रही हैं कि क्या एसडीएम ने ही सीईओ को निपटाया जिसमे जिला प्रशासन की मंशा सहयोगी बनी।
नियमित सीईओ को आराम,प्रभारी पूर्व को कमान,पहले से तय फार्मूला हुआ सेट- सीईओ जनपद सोनहत किसी कारण से कार्यालय संलग्न हैं,अब मुख्यमंत्री दौरे के बाद दोषारोपण कर बैकुंठपुर सीईओ भी कार्यालय संलग्न किए गए वहीं अब दोनों जगह पूर्व प्रभारी सीईओ काम करेंगे,यह वैसे तो पहले से तय था लेकिन विडंबना यह है कि जिन्हें अब कार्यालय भेज दिया गया है वह नियमित हैं और जो अब हैं वह प्रभारी।
ऊपर से नीचे तक: जिम्मेदारी का सफर
मुख्यमंत्री स्तर: घोषणा और गौरव- मुख्यमंत्री के हाथों हुए शिलान्यास, तालियों की गूंज और विकास की बड़ी घोषणाएं—इन सबने आयोजन को राजनीतिक और प्रशासनिक महत्व दे दिया, मंच पर जिले के आला अधिकारी मौजूद थे, श्रेय साझा था, तस्वीरें सामूहिक थीं, पर सवाल उठता है—यदि शिलान्यास मुख्यमंत्री स्तर का था, तो उसकी सुरक्षा और गरिमा की जिम्मेदारी किस स्तर की मानी जाए?
जिला प्रशासन: श्रेय का केंद्र- पूरे आयोजन का संचालन जिला प्रशासन के हाथ में था, राजस्व विभाग की सक्रियता, समन्वय बैठकें, व्यवस्थाओं का निरीक्षण—सब कुछ व्यवस्थित दिखाया गया, प्रेस नोटों में “सफल आयोजन” का श्रेय प्रशासन ने स्वयं लिया, लेकिन जब टूटी पट्टिकाओं का वीडियो वायरल हुआ, तब यही प्रशासन “कार्रवाई मोड” में आ गया, अब श्रेय की जगह संतुलन साधने की कोशिश शुरू हुई, व्यंग्य यही कहता है—”सफलता की तस्वीर सामूहिक, गलती की फाइल व्यक्तिगत।”
अनुविभागीय स्तर (एसडीएम) : निरीक्षण या निष्कि्रयता?- आयोजन स्थल संबंधित अनुविभाग के अधिकार क्षेत्र में आता है, एसडीएम स्तर पर निरीक्षण और पर्यवेक्षण की जिम्मेदारी स्वाभाविक मानी जाती है, क्या आयोजन के समापन के बाद स्थल का निरीक्षण हुआ? क्या नगरपालिका और अन्य विभागों के साथ समन्वय हुआ? यदि हुआ, तो चूक कैसे हुई? और यदि नहीं हुआ, तो जिम्मेदारी किसकी मानी जाए?
नगरपालिका: मंच पर अग्रणी, मैदान में मौन?- नगरपालिका को आयोजन में प्रमुख भूमिका दी गई थी, मंचीय प्रतिनिधित्व से लेकर स्थल व्यवस्था तक उसकी भागीदारी बताई गई, तो फिर शिलान्यास पट्टिकाओं की सुरक्षा और रखरखाव की जिम्मेदारी किसके हिस्से आई? क्या यह केवल जनपद पंचायत का दायित्व था?
जनपद सीईओ: “बलि का बकरा” या वास्तविक दोषी?- अब चर्चा का केंद्र जनपद सीईओ हैं, सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि उन्हें लापरवाही का दोषी मानते हुए हटाने की तैयारी है, लेकिन सवाल यह है, क्या पूरे आयोजन की कमान उनके पास थी? क्या कार्य विभाजन स्पष्ट था? क्या अन्य जिम्मेदारों पर समान स्तर की कार्रवाई हुई? जिले में यह भी चर्चा है कि पहले से प्रशासनिक असहमति थी और अवसर मिलते ही कार्रवाई की गई, यदि ऐसा है, तो यह चूक नहीं, “चाल” कहलाएगी।
सोशल मीडिया: नया लोकपाल- मैदान में पड़ी पट्टिकाओं का वीडियो वायरल हुआ, जिस उपलब्धि को प्रेस नोटों में सजाया गया था, उसे जनता ने मोबाइल कैमरे से परखा, अब डिजिटल दौर में न तो श्रेय छिपता है, न चूक, सोशल मीडिया ने इस बार “उत्सव” को “उपहास” में बदल दिया।
प्रशासनिक गणित: श्रेय ऊपर, सजा नीचे?- इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा प्रश्न यही है, क्या कार्रवाई का पैमाना समान है? यदि आयोजन सामूहिक था, तो समीक्षा भी सामूहिक क्यों नहीं? यदि शीर्ष स्तर पर निगरानी थी, तो जवाबदेही भी वहीं से क्यों न शुरू हो? व्यंग्य यही कह रहा है—”जब मंच पर माला पहननी हो तो सब आगे, जब जवाब देना हो तो फाइल नीचे भेज दो।”
क्या यह पहले से तय पटकथा थी?– जिले में यह चर्चा भी है कि नियमित अधिकारियों को किनारे कर प्रभारी व्यवस्था को आगे लाने की रणनीति पहले से तैयार थी, अब दोनों प्रमुख स्थानों पर नियमित की जगह प्रभारी की कमान की संभावना बताई जा रही है, विडंबना देखिए— नियमित अधिकारी “संलग्न” और प्रभारी “सक्रिय”। यह प्रशासनिक पुनर्संरचना है या अवसरवाद—यह समय बताएगा।
पट्टिका टूटी या व्यवस्था?- कोरिया का यह मामला केवल टूटी शिलान्यास पट्टिकाओं का नहीं है, यह उस सोच का आईना है जिसमें सफलता का मंच साझा होता है, लेकिन असफलता का कटघरा एकतरफा, जनता की मांग सरल है, कार्रवाई हो तो निष्पक्ष हो, जवाबदेही तय हो तो ऊपर से शुरू हो, क्योंकि विकास केवल घोषणा से नहीं, व्यवस्था से चलता है, और व्यवस्था तभी मजबूत होती है जब—”मोहरा नहीं, मापदंड बदले जाएं।”


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